Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / नेहरू युग के खिलाफ मोदी सरकार

नेहरू युग के खिलाफ मोदी सरकार

nehru-modi

नेहरू युग के खिलाफ केंद्र की मोदी सरकार सक्रिय है। जिसकी शुरूआत भारत में लोकतंत्र की स्थापना के साथ ही हुई। आज राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और कॉरपोरेट समर्थक मोदी सरकार लोकतंत्र के साथ ही, उस युग को समाप्त करना चाहती है। अपने हितों के लिये युग और इतिहास को बदलने की कोशिशें होती रही हैं, मगर भाजपा, संघ और देश की मौजूदा सरकार उसे मिटा देना चाहती है।

राजस्थान की भाजपा सरकार, बच्चों की किताबों से, देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को, बाहर का रास्ता दिखा दी। (उसने ऐसे और भी कई काम किये हैं, साहित्य और इतिहास को बदलने की। कबीर और अकबर जैसों को उनकी जगह से हटाने की।)

केंद्र की मोदी सरकार पंचवर्षीय योजना को खींच कर सप्त वर्षीय योजना में बदलने का निर्णय ले चुकी है। वह भारत के विकास के उन तमाम दिशाओं और योजनाओं को बदलना चाहती है, जो हिंदू राष्ट्रवाद और पूंजी के वर्चस्व के खिलाफ है, या उन्हें नियंत्रित करती है। वह उन तमाम योजनाओं को बदलना चाहती है, जो लोकतंत्र और देश की आम जनता के हितों से जुड़ी है।

ऊपर से देखने पर उसकी यह हरकत नेहरू गांधी परिवार के खिलाफ उसके द्वेष को जाहिर करती सी लगती है, लेकिन बात सिर्फ इनती सी नहीं है।

इस देश में, ब्रिटिश उपनिवेशवाद से समझौते के तहत मिली आजादी के बाद राष्ट्रीय कांग्रेस ने जिस लोकतंत्र की स्थापना की, अपनी तमाम खामियों और अधूरी आजादी के सपनों के बाद भी, देश के सामंती और प्रतिक्रियावादी ताकतों की सोच से बेहतर व्यवस्था थी। आज वे ही हिंदू राष्ट्रवादी प्रतिक्रियावादी ताकतें वैश्विक पूंजीवादी-साम्राज्यवादी ताकतों से मिल कर नेहरू के बहाने उस लोकतंत्र को देश के राजनीतिक ढांचे से हटा रही है।

वह संविधान के संघीय ढांचे और सामाजिक सहिष्णुता की अवधारणां को ही नहीं, उसकी लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणां को भी बदलने पर तुली है। वह संविधान के द्वारा लोगों को दिये गये ‘मौलिक अधिकारों‘ पर ही नहीं राज्य की सरकारों के लिये ‘नीति निर्देशक सिद्धांतों‘ का भी उल्लंघन कर रही है। समन्वय के उन तमाम बिंदुओ को मिटाने में लगी है, जो देश की आम जनता के हितों में निजी क्षेत्रों के विकास को नियंत्रित करती है।

नेहरू की सोच उदार पूंजीवाद और समाजवाद के बीच से गुजरती है। लेकिन, देश की मोदी सरकार ने उसे विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन और निजी कम्पनियो एवं कॉरपोरेशनों के जाल में देश को और उसकी आम जनता को फंसा दिया है। वह उन तमाम राहों को भी रोक रही है, जो उदार पूंजीवादी जनतंत्र की सोच एवं संरचना को मजबूत करती है। मार्क्सवाद या समाजवाद के विरूद्ध वह उन आतंकियों की सोच रखती है, जिनके लिये अपने से असहमत लोगों की हत्या कारगर नीति है।

उसने मजदूरों के हितों, उनके संवैधानिक अधिकारों और उनके संगठित प्रतिरोध पर हमला किया है।

उसने करोड़ों-करोड़ किसानों को दिहाड़ी मजदूर बनाने के लिये उन्हें जमीन से बे-दखल करना शुरू कर दिया है, विस्थापन और पलायन की स्थितियां बना दी है। जहां भी खनिजी सम्पदा है, वहां से आदिवासियों और किसानों को खदेड़ा जा रहा है। झारखण्ड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य आतंक के साये में हैं। सूखाग्रस्त 12 राज्यों में केंद्र सरकार की भूमिका असहयोग की है।

बुद्धिजीवियों पर हमले हो रहे हैं। छात्र एवं युवाओं के खिलाफ सरकार है। वह देश की बौद्धिक सम्पदा को निजी क्षेत्रों के हवाले कर रही है। वह जेएनयू के छात्र आंदोलन के खिलाफ देशद्रोह का आरोप मढ़ चुकी है। अपने से असहमत लोगों को कुचलना ही उसकी नीति है।

पांच साल के लिये, धोखे से चुनी गयी सरकार अपने, दो साल की उपलब्धियां का बखान कर रही है, जिसमें देश की अर्थव्यवस्था के निजीकरण को राष्ट्रीय नीति में बदला गया है। नेहरू ने देश की प्राकृतिक सम्पदा, श्रम सम्पदा एवं बौद्धिक सम्पदा को देश की सम्पदा का दर्जा दिया था, आर्थिक विकास के लिये निजी क्षेत्रों के साथ सार्वजनिक क्षेत्रों को वरियता दी थी। मुक्त बाजार के साथ सरकारी वितरण प्रणाली की व्यवस्था की थी। आज निजी क्षेत्रों के लिये सार्वजनिक क्षेत्रों को मारा जा रहा है, निजी कम्पनियों, कॉरपोरेशनों और निगमों तथा वित्तीय इकाईयों को सरकार के साझेदार एवं निवेशकों का दर्जा मिल गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा एवं रक्षा जैसे क्षेत्रों का निजीकरण हो रहा है। सरकार देश की सम्पदा, संसाधन, क्षमता एवं बाजार को निजी कम्पनियों एवं निवेशकों के पीछे खड़ा कर रही है। जिसकी शुरूआत कांग्रेस-यूपीए की मनमोहन सरकार ने की। मोदी उसी को खुले रूप में कर रहे हैं।

नेहरू को ‘नेहरू-गांधी परिवारवाद‘ के दायरे में नहीं लाया जा सकता। उन्होंने इस देश में लोगों के मन में लोकतंत्र के लिये विश्वास दिया है। जिसे खोते ही कांग्रेस सत्ता से बे-दखल हो गयी। केंद्र की मोदी सरकार नेहरू के इस विरासत को यदि खत्म कर रही है, तो सोचा जा सकता है, कि यदि वह सत्ता में बनी रहती है, तो कैसे बनी रहेगी और बे-दखल होती है, तो कैसे बे-दखल होगीं? नेहरू युग का अंत इस देश में उदार पूंजीवादी लोकतंत्र के युग का अंत है। नेहरू के विरूद्ध मोदी हिंदू उग्र राष्ट्रवाद और वित्तीय तानाशाही का प्रतीक है।

-आलोकवर्द्धन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top