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अमेरिकी फेडरल रिजर्व के 100 साल

7nDcNco100 साल पहले, 23 दिसम्बर 1913 को अमेरिकी फेड़रल रिजर्व की स्थापना हुर्इ थी, जो आज भी आम अमेरिकी और दुनिया के आम आदमी के लिये एक ऐसी पहेली है, जिसे हल नहीं किया जा सका है। वह एक शताब्दी से घट रही दूर्घटनाओं का केंद्र और ऐसा चक्रव्यूह है, जिसके बारे में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि ”अमेरिकी फेडरल रिजर्व एक वित्त व्यवस्था है, जिसे अपने लाभ के लिये बैंकरों द्वारा बनाया गया और आज भी वो ही इसे चला रहे हैं।” उन्हीं के नियंत्रण में अमेरिकी वित्त व्यवस्था और वित्तीय बाजार है।

जिसकी स्थापना अमेरिकी वित्त व्यवस्था को मजबूत करने और अमेरिकी मुद्रा प्रणाली को सुव्यवसिथत करने के लिये की गयी थी। आम अमेरिकी और अमेरिकी संघ के राज्यों को यही समझाया गया था। आज भी आम अमेरिकी यही मानता है कि वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था है और फेडरल रिजर्व अमेरिकी सरकार का रिजर्व बैंक है, जो मुद्रा और मुद्रा बाजार को नियंत्रित करता है। मगर सच यह है, कि फेडरल रिजर्व एक निजी सेण्ट्रल बैंक है, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजार को अपने नियंत्रण में चलाता है। जिसकी पकड़ अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इतनी मजबूत है, कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने देश की वित्त व्यवस्था के बारे में कुछ बोलते हैं, तो वित्तीय बाजार में बड़ी मुशिकल से थोड़ी सी हलचल होती है, मगर फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बेन बर्नानकी अपना मुंह खोलते हैं, तो पूरी व्यवस्था हिल जाती है।

जिन घोषित उददेश्यों के लिये फेडरल रिजर्व की स्थापना की गयी, उन घोषित उददेश्यों का अंत हो गया है। अमेरिकी सरकार की वित्त व्यवस्था लड़खड़ा रही है, और अमेरिकी डालर की शाख गिर गयी है, विश्व बाजार में उसके सामने गहरी चुनौती है, वह खतरे में है। अधिकारिक आंकड़ों के अनुसार- ”फेडरल रिजर्व की स्थापना के सौ सालों के अंदर-अंदर अमेरिकी डालर का मूल्य 95 प्रतिशत से ज्यादा घट गयी है।” वह संदेहों के दायरे में असुरक्षित है। और अमेरिकी सरकार उसे संभालने की सिथति में भी नहीं है।

फेडरल रिजर्व की स्थापना की योजना पर काम करने के लिये नवम्बर 1910 में हुर्इ पहली बैठक ही गुप्त थी। जार्जिया के जैकल द्वीप में हुर्इ बैठक में उस समय के अमेरिकी सीनेटर नेल्सन डब्ल्यू एलडरिण, असिस्टेंट सेक्रेटरी आफ द ट्रेजरी डिपार्टमेण्ट के ए0पी0 एनड्रयूस और वालस्ट्रीट के सभी प्रमुख बैंकर्स, बैंकिंग वल्र्ड के लोगों ने भाग लिया था। सीनेटर एलडरिण मार्गन के निजी दोस्त थे और उनके बेटी की शादी जान डी0 राकफेलर जूनियर से हुर्इ थी।

अमेरिकी सीनेटर आज जो कर रहे हैं, उसकी मजबूत शुरूआत सौ साल पहले ही हुर्इ, कि वो अमेरिकी सरकार और आम अमेरिकी के हितों से ज्यादा उन लोगों के हितों से संचालित होते हैं, जिन्होंने अमेरिकी सरकार और उसकी वित्तव्यवस्था पर अपनी पकड़ बना ली है। आज अमेरिकी सरकार जिनकी राजनीतिक इकार्इ बन कर रह गयी है, जिसे तमाम विरोधों का सामना करना पड़ रहा है। जिसके हाथ में वास्तव में अब कुछ नहीं है।

जिस साल फेडरल रिजर्व एक्ट कांग्रेस में पास हुआ, उसी साल स्थायी इन्कम टैक्स की भी शुरूआत हुर्इ, जो वास्तव में आम जनता की समृद्धि को फेडरल सरकार के जेब में, और फेडरल सरकार की जेब से, बैंकों की जेब में जमा करने की योजना थी। बड़े पैमाने पर यह पाकेटमारी शुरू की गयी, और आज भी जारी है। जोे धीरे-धीरे लूट में बदल गयी है। यह लूट अब इतनी बढ़ गयी है, कि संयुक्त राज्य की स्टेट और फेडरल सरकार भी लुट रही है। उसकी वित्तीय शकितयां लगातार घटी हैं। और वित्तीय संकट लगातार बढ़ा है। जबकि फेडरल रिजर्व बनाने की वजह अमेरिकी वित्त व्यवस्था को मजबूत करना था। मुद्रा बाजार को सुनिशिचत एवं सुरक्षित करना था। जोकि नहीं हुआ। और होना भी नहीं था।

फेडरल रिजर्व की स्थापना के 20 साल भी नहीं हुए थे, कि अमेरिका 1929-30 के वित्तीय महामंदी के संकट में फंस गया। कर्इ मंदी के दौर से गुजरते हुए सात दशक बाद वह अब तक के सबसे बड़े वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहा है। जिसका व्यापक आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभाव सारी दुनिया पर पड़ा है। यूरोप दिवालिया होता जा रहा है, और अमेरिकी सरकार की सिथति ऐसी है कि उसका दिवालिया होना भी तय है। जिन वित्तीय ताकताें ने अमेरिकी साझेदारी से फेडरल रिजर्व की स्थापना की वो अमेरिकी सरकार से ज्यादा मजबूत हो चुके हैं, और वैशिवक अर्थव्यवस्था उनकी पकड़ में है। उन्होंने दुनिया में फेडरल रिजर्व और सेण्ट्रल बैंकों एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों का जाल बिछा लिया है। और यह प्रचारित कर रखा है कि ”वो इतने बड़े हैं, कि असफल हो ही नहीं सकते।”

मगर, सिथतियां बदल रही हैं, और जो इतने बड़े हैं, कि असफल नहीं हो सकते, ऐसे बड़े बैंको को फेडरल रिजर्व ने 1 दिसम्बर 2007 से 21 जुलार्इ 2010 के बीच, ना के बराबर ब्याज दर पर कर्इ टि्रलियन डालर ‘बेलआउट’ के रूप में दिया है, ताकि वो अपनी शाख और अपने को दिवालिया होने से बचा सके। इस जानकारी को गुप्त रखने के लिये फेडरल रिजर्व ने कर्इ सालों तक लम्बी लड़ार्इयां कोर्ट में लड़ी। फ्रीडम आफ इन्फारमेशन एक्ट के तहत, जब ब्लोमबर्ग ने फेडरल रिजर्व से इस बारे में जानकारी मांगी तो खुले तौर पर कहा गया कि ”फेडरल रिजर्व अमेरिका के सरकार की कोर्इ इकार्इ (एजेन्सी)नहीं है, वह निजी स्वामित्व के तहत है, इसलिये उस पर फ्रीडम आफ इन्फारमेशन एक्ट लागू नहीं होता है।” और कोर्ट को भी इस बात की जानकारी नहीं दी गयी। यह बेलआउट अलग-अलग बैंकों को दिया गया, जिनमें से कुछ बैंक अमेरिका के थे, और कुछ बैंक यूरोप और एशिया के। लगभग 3.08 टि्रलियन डालर का बेल आउट फेडरल रिजर्व ने यूरोप और एशिया के बंैकाें को दिया है। जो इस बात का प्रमाण है, कि पूंजीवादी वित्त व्यवस्था अपने ही बोझ से चरमरा रही है, वह अपना बोझ उठाने के लायक नहीं है।

इसके बाद भी सच यह है, कि फेडरल रिजर्व का तिलस्म अभी टूटा नहीं है। गुप्त वार्ताओं और साजिशों का अंत नहीं हुआ। वह दुनिया से छुपा कर ऐसा बहुत कुछ कर रही है, जिसके घातक प्रभाव का पड़ना तय है। उसकी जन विरोधी नीतियां वैशिवक मंदी को लाभ कमाने का जरिया बनाने में लगी है, वह दुनिया की आम जनता और तीसरी दुनिया के देशों पर अपनी मंदी का बोझ लादती जा रही है। अमेरिका के 6 बड़े बैंकों की कुल सम्पतितयों में, सितम्बर 2006 से 30 सितम्बर 2011 के बीच, 39 प्रतिशत की वृद्धि हुर्इ है।

ओबामा सरकार ने भी बैंको, वित्तीय इकार्इयों और उधोग जगत को बचाने के लिये ही बेल आउट पैकेज की घोषणां की थी। और यही किया भी गया, जबकि 2011 में अमेरिकी सरकार ने 454 बिलियन डालर का भुगतान अपने राष्ट्रीय कर्ज के ब्याज के रूप में किया। इस तरह, आम अमेरिकी की जेब काट कर निजी वित्तीय ताकतों एवं विदेशी सरकारों की जेबें भर दी गयी। 1914 में अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज 2.9 बिलियन डालर था, मगर आज वह 17 टि्रलियन डालर से अधिक हो गया है। यह वृद्धि दर, एक शताब्दी में 5000 गुणा से ज्यादा है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में एक ऐसी समाज व्यवस्था और एक ऐसी सरकार की स्थापना की गयी जिसमें वित्तीय पूंजी के लिये बड़ी जगह थी, और जिसके विस्तार के लिये बैंकों और वित्तीय इकार्इयों को इतनी छूट दी गयी, कि आम अमेरिकी का हित सिमटता चला गया। अब तो आम आदमी की तरह फेडरल एवं स्टेट की सरकारें भी वित्तीय इकार्इयों पर निर्भर है। 2008 के इमरजेन्सी इकोनामी स्टेबलार्इजेशन एक्ट की धारा 128 के अनुसार ”फेडरल रिजर्व ने अपने यहां एक्सेस रिजर्व -अतिरिक्त धन- को जमा करने वाले अमेरिकी बैंकों को ब्याज देगी।”

सरसरी तौर पर देखने से, इस नीति में कोर्इ बुरार्इ नजर नहीं आयेगी, ऐसा लगेगा कि आर्थिक असुरक्षा और अनिश्चयता के बीच यह बैंकों की सिथरता एवं सुरक्षा के लिये उठाया गया कदम है, ताकि बैकों को बचाया जा सके। मगर ऐसा नहीं है। फेडरल रिजर्व की इस नीतिक का परिणाम यह हुआ, कि अमेरिकी बैंक अपने पैसे को फेडरल रिजर्व में जमा करने पर जोर डालने लगें, क्योंकि वहां उनकी सम्पदा न सिर्फ सुरक्षित थी, बलिक उस पर ब्याज भी मिल रहा था। जिसका घातक परिणाम यह हुआ, कि बैंकों में जमा लोगों की धन राशि बाजार में आने के बजाये फेडरल रिजर्व के स्ट्रांग रूम में पहुंच गया। बाजार में डालर की स्वाभाविक कमी हो गयी, जिन डालरों से मंदी के दौर में बैंकों के द्वारा आम लोगाें की मदद की जा सकती थी, उन्हें काम दिया जा सकता था, वह फेडरल रिजर्व में जमा हो गया। 2008 से अब तक 1.5 टि्रलियन डालर से ज्यादा बड़ी धनराशि बैंकों के द्वारा फेडरल रिजर्व में जमा हुआ।

यही नहीं मुनाफा कमाने के लिये फेडरल रिजर्व ‘अमेरिकी कर्ज’ की खरीददारी भी बड़े पैमाने पर करता है। वह वाल स्ट्रीट के बड़े बैंकों को लगभग ब्याज मुक्त दरों पर बड़ी धनराशि देता है, जिसका उपयोग वो ‘अमेरिकी कर्ज’ खरीदने में करते हैं। परिणाम स्वरूप सरकारी कर्ज और बढ़ जाता है और बैंक बड़ी आसानी से, बिना जोखिम उठाये भारी मुनाफा कमा लेते हैं। पिछले साल फेडरल रिजर्व ने लगभग 2.75 टि्रलियन डालर का निवेश अमेरिकी वित्त व्यवस्था में किया, जिसकी वजह से स्टाक बाजार तेजी पर है, मगर इन्हीं नीतियों की वजह से अमेरिकी वित्त व्यवस्था काफी असुरक्षित हो गयी है, वह वित्तीय बुलबुलों का शिकार हो गयी है। वह उस ओर बढ़ चुकी है, जहां संभलने की संभावना ही नहीं है।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये ‘क्वांटेटिव इजिंग’ को लाया गया। क्यू-र्इ-2 के बाद क्यू-र्इ-3 के तहत फेडरल रिजर्व हर महीने लगभग 85 बिलियन डालर अमेरिकी अर्थव्यवस्था में ‘सरकारी कर्ज’ और मार्टगेज बैक्ड सिक्यूरिटी की खरीदी के रूप में कर रहा है। इस क्यू-र्इ की वजह से स्टाक मार्केट अपनी ऊंचार्इयों पर है, और इससे जुड़े विशिष्ट वर्ग के लोगों का मुनाफा लगातार बढ़ रहा है। दिखाया यह जा रहा है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से उबर गयी है, जो कि वास्तविक नहीं है। फेडरल रिजर्व ने अमेरिकी वित्त व्यवस्था में स्टाक मार्केट बबल को जन्म दे दिया है। ऐसे वित्तीय बुलबुले को जन्म दे दिया है, जिसका फूटना तय है। जिस दिन बाजार में क्यू-र्इ के तहत आने वाले डालर बंद हो जायेंगे, अमेरिकी वित्त व्यवस्था 2008 की मंदी से बड़ी मंदी में फंस जायेगी।

अभी कुछ दिनों पहले ही फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बेन बर्नानकी ने इसे रोकने की सलाह दी थी, तो बाजार में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुर्इ, वाल स्ट्रीट में हड़कम्प मच गया, स्टाक मार्केट गिर गया। यह प्रमाणित हो गया, कि जिस दिन क्यू-र्इ के तहत 85 बिलियन डालर प्रतिमाह स्टाक मार्केट में डालना बंद हो जायेगा, उसी दिन अमेरिका का स्टाक मार्केट मुंह के बल गिर जायेगा और यह 2008 की मंदी से बड़ी एवं भयानक मंदी को जन्म देगी। जिसे फेडरल रिजर्व भी रोक नहीं पायेगा।

2008 की वित्तीय मंदी वास्तव में खत्म नहीं हुर्इ है, ना ही समस्याओं का स्थायी समाधान हुआ है, उसे अस्थायी रूप से टालने के लिये स्टाक मार्केट में क्यू-र्इ के तहत कर्इ टि्रलियन डालर डाल दिया गया है। जिसने स्टाक मार्केट को कृत्रिम ऊंचार्इ और ब्याज दर को निचले दर्जे पर दिखाने का काम किया है। अब फेडरल रिजर्व -जोकि एक बहुत बड़ी निजी वित्त्ीय इकार्इ है- निशिचत रूप से और तेजी से अमेरिकी सरकार के कर्ज को निर्देशित करना, उसे अपने निर्देशों का पालन कराने का काम करना शुरू कर दिया है। वो अमेरिकी कर्ज को खरीद कर, उसे पूरी तरह अपने नियंत्रण में लेता जा रहा है। हालांकि, फेडरल रिजर्व इस सच को नकारते हुए यह विश्वास दिला रहा है, कि जिन सिक्यूरिटी को वह खरीद रहा है, अंतत: वह उसे फिर से बेच देगा। जिस पर विश्वास करने का कोर्इ आधार नहीं है। 1970 में अमेरिका के 5 सबसे बड़े बैंक अमेरिका के बैंकिंग क्षेत्र के 17 प्रतिशत पर अपनी दखल रखते थे, जोकि बढ़ कर अब 52 प्रतिशत हो गया है। मतलब बैंकिंग क्षेत्र अब पूरी तरह उनके कब्जे में है। सारी दुनिया में सेण्ट्रल बैंकों का जाल बिछा दिया गया है। इसके बाद भी अमेरिकी वित्त व्यवस्था के लिये माना यही जा रहा है कि जिस दिन क्यू-र्इ बंद होगा उस दिन ही ब्याज दर बढ़ जायेगा और अमेरिकी खजाने की मांग नाटकीय रूप से गिर जायेगी। यदि फेडरल रिजर्व क्यू-र्इ को अमेरिकी अर्थव्यवस्था का स्थायी हिस्सा बनाना चाहता है, तो उसे अमेरिका के सभी कर्ज की मानिटरिंग करनी होगी। फेडरल रिजर्व की व्हार्इस चेयरमैन जनत एलन ने कहा है कि ”इसे हमेशा जारी नहीं रखा जा सकता।” 14 नवम्बर को उन्होंने स्वीकार किया कि ”अमेरिकी अर्थव्यवस्था अभी नाजुक दौर से गुजर रही है, इसलिये क्यू-र्इ को तेजी से खत्म नहीं किया जा सकता।” मतलब अमेरिकी डालर का छापना जारी रहेगा।

कर्ज की सीमाओं को बढ़ाने और अमेरिकी शटडाउन का जो खेल पिछले माह खेला गया, उसका प्रभाव गहरे रूप से पड़ा है।

दुनिया के देशों के सामने अब यह सवाल खड़ा हो गया है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिये डालर उपयोग क्यों जरूरी है, और कितना सुरक्षित है? जबकि फेडरल रिजर्व लगातार डालर छाप रहा है, और तेजी से डालर की कीमत घटाता जा रहा है। परिणाम स्वरूप उन डालरों की कीमत भी घटती जा रही है, जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिये दुनिया के देशों ने अपने यहां जमा कर रखा है। सारी दुनिया में इस बात को लेकर गहरी बेचैनी और असुरक्षा की भावना है। यदि फेडरल रिजर्व इस सिथति से उबरने के लिये अमेरिकी डालर की अंधाधुंध छपार्इ बंद नहीं करती है, तो दुनिया दशकों से जारी मुद्रा के इस खेल में हिस्सा लेना बंद कर सकती हैं। जिसकी पहल शुरू हो चुकी है। और चीन नयी चुनौती के रूप में उभर चुका है। उसके वैकलिपक अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में अपनी मुद्रा की दावेदारी भी पेश की है, और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिये अपनी मुद्रा की बैंकिंग व्यवस्था भी कर दी है। द्विपक्षीय संधि एवं समझौते से उसे व्यवहार में लाया जा रहा है। उसने घोषणा की है कि अब वह अमेरिकी डालर की खरीदी, उसे जमा रखना, बंद करेगा। यह उल्लेखनिय है, कि चीन दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक देश है। रूस के राजनयिक का आंकलन है कि ”2017 तक अमेरिकी डालर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिये अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा का दर्जा खो बैठेगा।” यदि ऐसा हुआ, तो फेडरल रिजर्व की पहेली का अंत करीब है। जिसे गुप्त वार्ता और साजिशों से रचा गया है। जिसने विश्व मुद्रा बाजार पर अपना वर्चस्व कायम किया और आज दुनिया को पतन के खतरे के मुहाने पर ला कर खड़ा कर दिया है।

‘यूबीएस एण्ड वेल्थ-एक्स’ की रिपोर्ट है कि ”साल 2009 में जहां 1360 बिलेनियर्स थे, साल 2013 में बढ़ कर वो 2170 हो गये हैं।” और यह सारा कमाल फेडरल रिजर्व और दुनिया के अन्य सेण्ट्रल बैंकर्स की नीतियों की वजह से है। जिन्होंने बाजार में डालर की कमी को भरने के लिये उसे छापने को कारोबार बना दिया है, जिसकी वजह से स्टाक मार्केट अपने चरम पर है। 100 साल का इतिहास पूंजी का वित्तीय पूंजी में बदलने और उसका बैंक पूंजी के रूप में ऐसा विकास है, जिसने दुनिया को वित्तीय कारागार बना दिया है, जिसकी गिरफ्त में विश्व वित्त व्यवस्था है। जिसकी सूरत तो अमेरिका है। मगर उसकी अपनी कोर्इ वकत नहीं है।

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