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जेएनयू छात्र आंदोलन पर लदी जिम्मेदारियां-1

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जेएनयू छात्र आंदोलन पर जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारियां लद गयी हैं।

किसी भी आंदोलन को तोड़ने, उसके प्रभावों को रोकने की कोशिशों के तहत यदि हम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन को देखें तो विवादहीन रूप से उसने देश के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया है।

देश के प्रगतिशील, जनवादी, वामपंथी रचनाकारों, इतिहासकारों, वैज्ञानिक, समाजसेवी एवं बुद्धिजीवियों ने समाज में बढ़ती हुई असहिष्णुता के जिस मुद्दे का खड़ा किया था, जेएनयू के छात्र आंदोलन ने उन्हें अपनी बात रखने का बड़ा प्लेटफॉम दिया। न सिर्फ संवाद की स्थितियां बनीं, बल्कि आपसी एकजुटता की अनिवार्यता को नयी जमीन दी। राष्ट्रवाद पर लम्बी बहस हुई।

शिक्षा के अधिकार के तहत केंद्र की मौजूदा सरकार की बाजारवादी आर्थिक नीतियों पर नयी बहस की शुरूआत हुई। यह बात खुल कर सामने आयी कि सरकार वैश्विक वित्तीय ताकतों के दबाव में, विश्व व्यापार संगठन और निजी कम्पनियों के निर्देशों का पालन कर रही है। केंद्रिय विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमला और ‘टैक्स पेयर‘ के पैसों से पढ़ने की बात को सही संदर्भां से जुड़ने का मौका मिला। यह स्पष्ट हुआ कि नव उदारवादी-बाजारपरक अर्थव्यवस्था आम जनता के हितों के विरूद्ध है। सरकार की नीतियां जन विरोधी हैं।

संसदीय लोकतंत्र में वामपंथी राजनीतिक दलों के पांव के नीचे से खिसकी हुई जमीन को, अपने संदर्भित होने का नया आधार मिला। विश्वविद्यालय परिसर की वाम एकजुटता ने जेएनयू कैम्पस के बाहर न सिर्फ वाम एकजुटता की अनिवार्यता को बढ़ाने का काम किया, बल्कि दलित, आदिवासी एवं पिछड़े वर्गों की एकजुटता तथा किसानों एवं मजदूर ट्रेड यूनियनों की एकजुटता को सड़कों पर उतारने का काम भी किया। गैर वामपंथी राजनीतिक दलों से भी संवाद की स्थितियां बनीं। उस प्रक्रिया की शुरूआत हुई जो थम सी गयी थी।

राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिला जन समर्थन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की अपनी शाख है, जिसे केंद्र की मोदी सरकार, भारतीय जनता पार्टी और हिंदू राष्ट्रवाद के पक्षधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित प्रतिक्रियावादी ताकतें देशद्रोहियों का गढ़ बताने पर तुली थी। दिल्ली पुलिस ने छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को अपना पहला निशाना बनाया। कई छात्रों पर ‘देशद्रोह‘ का आरोप रखा गया। उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य के ‘सरेण्डर‘ के साथ ही, बाकी लोगों की तलाश और गिरफ्तारियां थम गयीं। अफजल गुरू और पाकिस्तान के पक्ष में लगाये गये नारों के वीडियो की बखिया उधड़ गयी। कन्हैया कुमार पर न्याय परिसर में हुए हमले और हो रहे हमलों ने लोगों को चौंका दिया। ऐसा लगा जैसे गुण्डे, बदमाश और दंगाई मवालियों के हाथों में ‘देश का ध्वज‘ है और ‘भारत माता‘ (की जय) फंस गयी है।

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी पहल की, जिसकी उम्मीद सरकार को भी नहीं थी।

जेएनयू की एकजुटता एडमिन ब्लॉक पर ही नहीं दिखी, दिल्ली की सड़कों पर भी नयी इबारतें लिखी। छात्रसंघ उपाध्यक्ष शेहला राशिद उभर कर सामने आयी। ‘नेतृत्व के बिना छात्रों का प्रतिरोध सामने नहीं आयेगा‘ की संघी सोच यह समझने में नाकाम रही कि कम्युनिस्ट विचारों से संचालित होता है।

एक लम्बी लड़ाई की बड़ी शुरूआत हो गयी, किंतु जेएनयू छात्रों ने विश्वविद्यालय परिसर और रोहित वेमुला के मुद्दे को नहीं बदला। कैम्पस की लड़ाई का विस्तार हो गया।

हिंदू राष्ट्रवाद

देशद्रोह बनाम देशभक्ति

शिक्षा का अधिकार और उसे बेचने के तौरतरीके,

और फासीवाद के विरूद्ध समाजवादी लोकतंत्र को उसने देश के मौजूदा संविधान के दायरे में खड़ा कर दिया।

और जिम्मेदारियां भी बढ़ गयीं।

ऐसी जिम्मेदारियां बढ़ गयीं, जिनके बारे में सोचा नहीं गया था, तैयारियां नहीं की गयी थी। कार्यनीति और कोई संगठनात्मक ढांचा तक नहीं था।

जेएनयू ने सोचा तक नहीं होगा कि 9 फरवरी, उसके इतिहास का निर्णायक दिन बन रहा है।

हिरासत में होने से पहले कन्हैया कुमार ने सोचा तक नहीं होगा कि वो राष्ट्रीय मुद्दा बनने वाले हैं।

शेहला राशिद ने सोचा तक नहीं होगा, कि उन्हें नेतृत्व की कैसी जिम्मेदारियां उठानी पड़ेंगी।

उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य के सामने जो आया उसकी उन्होंने कल्पना तक नहीं की होगी।

रामा नागा से लेकर भूतपूर्व छात्र अध्यक्षों ने भी नहीं सोचा होगा कि ऐसी लड़ाई सामने है।

जेएनयू टीचर्स एशोसियेशन अध्यक्ष- अजय पटनायक से लेकर कर्मचारियों ने भी नहीं सोचा होगा।

लेकिन लड़ाईयां लड़ी गयीं, लड़ी जा रही हैं, और जीत की विभाजन रेखा भी खींची जा चुकी है।

यह विभाजन रेख झूठ और सच के बीच की विभाजन रेखा है।

यह विभाजन रेखा निर्णायक जीत और निर्णायक हार के बीच की विभाजन रेखा है।

लेकिन निर्णायक जीत और निर्णायक हार के बीच लम्बी लड़ाई है।

सरकार संसद से लेकर सड़क तक झूठ बोलती रही है।

डॉक्टर्ड वीडियो,

मीडिया ट्रॉयल,

नकली देशभक्ति का भगवा प्रदर्शन,

हिंदूवादी संगठनों का उत्पात,

जनभावनाओं का गलत इस्तेमाल,

संसद में मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की नौटंकी। गृहमंत्री, वित्त मंत्री की गलत बयानी। यहां तक कि झूठ के पुलंदा को प्रधानमंत्री मोदी ने कहा- ‘‘सत्यमेव जयते!‘‘

सामाजिक असुरक्षा फैलाने के लिये भगवा जुनून। कन्हैया कुमार और उमर खालिद की हत्या का कौल। कन्हैया कुमार पर हमले आज भी हो रहे हैं।

सरकार ने दुषप्रचार को अपना हंथियार बनाया। वह मीडिया को खरीदती और उनका मुंह बंद करती हुई नजर आयी। 16 दिन के भूख हड़ताल के खिलाफ ब्लैक आउट।

आंदोलन के पक्ष में जहां भी सही खबरें छप और दिख रही थीं, केंद्र की मोदी सरकार वहां अपनी फॉसिस्ट और कॉरपोरेट के साथ खड़ी नजर आयी।

इसके बाद भी, वह जेएनयू के विस्तार को रोकने में नाकाम रही।

श्रम कानूनों में हुए संशोधन (मजदूर विरोधी)

भूमि अधिग्रहण विधेयक के प्रस्ताव (किसान एवं आदिवासी विरोध)

वास्तु एवं सेवा कर पर खेमेबाजी

आर्थिक विकास (निजीकरण) को सामाजिक विकास में बदलने की साजिश,

भावनात्मक (राष्ट्रवाद-देशभक्ति) मुद्दों को खड़ा कर, जनविरोधी नीतियों को पार लगाने की नीतियां,

बिना रोक-टोक और सीमित प्रतिरोध के साथ चलती हुई, ‘एक राष्ट्र, एक दल और एक नेता‘ की अनिवार्यता जिस तरह बनायी जा रही थी, जेएनयू छात्र आंदोलन -देशभर में केंद्रिय विश्वविद्यालयों में खड़ा हुआ प्रतिरोध- ने रूकावटें पैदा कर दी है। सोशल मीडिया ने बड़ी भूमिका अदा की और कर रही है। ‘स्टैण्ड विथ जेएनयू‘ और ‘वी आर जेएनयू‘ ने सरकार और भाजपा के ‘आईटी सेल‘ के खिलाफ न सिर्फ अपनी विश्वसनियता हासिल की, बल्कि महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को भी पूरा कर रही है। उसके पक्षधरों ने प्रमाणित कर दिया है, कि ‘जनशक्ति‘ से बड़ी कोई ताकत नहीं है।

मीडिया विभाजित हुई है।

न्यायालयों ने अपनी विश्वसनियता प्रमाणित की है। शोषकों का कानून शोषकों के हित में होने के बाद भी, जेएनयू और जनसंघर्षों की पक्षधर बनी है। उसने सरकार विरोधी कई फैसले दिये हैं। मोदी सरकार न्यायालयों को अब तक अपनी गिरफ्त में नहीं ले पायी है। संघ, भाजपा और सरकार सवालों के दायरे में है।

इसके बाद भी,

खबरों की सामाजिक पहुंच नहीं है, और ब्लैक आउट है।

सरकार का फॉसिस्ट एवं कॉरपोरेट समर्थक होना तो प्रमाणित होता जा रहा है, मगर फासीवाद और कॉरपोरेट के खिलाफ हम कितने हैं? यह एक गंभीर सवाल है।

कह सकते हैं- वर्गगत सामाजिक एकजुटता नहीं है।

कह सकते हैं- राजनीतिक मोर्चा नहीं है।

कह सकते हैं- बाजारवादी अर्थव्यवस्था के खिलाफ संगठित जनमोर्चे नहीं हैं।

किसी भी छात्र आंदोलन से आप कितनी अपेक्षायें पाल सकते हैं? कितनी जिम्मेदारियां लादी जा सकती हैं उस पर? जबकि उस पर चौतरफा हमले हो रहे हों, और फासीवाद तथा कॉरपोरेट के खिलाफ जिन मोर्चों पर लड़ाईयां लड़ी जाती हैं, वे मोर्चे या तो हैं नहीं या कमजोर हैं।

(जारी)

-आलोकवर्द्धन

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