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जेएनयू छात्र आंदोलन पर लदी जिम्मेदारियां-2

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(सरकार का फॉसिस्ट एवं कॉरपोरेट समर्थक होना तो प्रमाणित होता जा रहा है, मगर फासीवाद और कॉरपोरेट के खिलाफ हम कितने हैं? यह गंभीर सवाल है।

कह सकते हैं- वर्गगत सामाजिक एकजुटता नहीं है।

कह सकते हैं- राजनीतिक मोर्चा नहीं है।

कह सकते हैं- बाजारवादी अर्थव्यवस्था के खिलाफ संगठित जनमोर्चा नहीं है।

किसी भी छात्र आंदोलन से आप कितनी अपेक्षायें पाल सकते हैं? कितनी जिम्मेदारियां लादी जा सकती हैं, उस पर? जबकि उस पर चौतरफा हमले हो रहे हों, और फासीवाद तथा कॉरपोरेट के खिलाफ जिन मोर्चों पर लड़ाईयां लड़ी जाती हैं, वे मोर्चे या तो हैं नहीं, या कमजोर हैं।)

आगे-

राजनीतिक मोर्चे पर- ‘लाल सलाम!‘, ‘इंकलाब जिन्दाबाद‘ कहां है? वो राजनीतिक दल कहां है, जो फासीवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ते हैं? इसी से जुड़ा एक सवाल यह भी है, कि क्या संसदीय वामपंथी राजनीतिक दल फासीवाद के खिलाफ जारी संघर्ष को समाजवादी सर्वहारा क्रांति में बदलने की सोच एवं समझ और ताकत रखती है? जनतंत्र के पक्ष में होना तो लाजमी है, मगर ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ के सामने लातिनी अमेरिकी देशों में, जो सवाल एवं चुनौतियां खड़ी की गयी हैं, उन प्रतिक्रियावादी-साम्राज्यवादी हमलों का जवाब क्या है?

फासीवाद के खिलाफ वर्गगत राजनीतिक चेतना एवं जन एकजुटता कहां है?

मजदूरों में कितनी वर्गगत राजनीतिक चेतना है? हरावल बनने के काबलियकत से अभी वह कितना दूर है?

किसानों तक हमारी या किसान संगठनों और वामपंथी राजनीतिक दलों की पहुंच कितनी है?

बुद्धिजीवियों -वामपंथी रचनाकारों- की एकजुटता तो जेएनयू विश्वविद्यालय परिसर में नजर आ रही है मगर उनकी एकजुटता कितनी कारगर है? समाज में उनकी क्या निर्णायक हिस्सेदारी है?

भारत 6 दशक से ज्यादा पुराना, चाहे जितना भी बड़ा लोकतंत्र हो, ‘जन लोकतंत्र‘ की समझदारी उसमें नहीं है। उदार पूंजीवादी लोकतंत्र ने ही देश में चुनावी तरीके से फासीवादी-कॉरपोरेट सरकार को जमीन दी है। जिसकी वजह से राजसत्ता का वैधानिक अपहरण हुआ और केंद्र में मोदी सरकार है। पहली बार ऐसा हुआ कि वैश्विक एवं राष्ट्रीय वित्तीय ताकतों ने भारत में फॉसिस्ट ताकतों का खुला उपयोग किया। उन्होंने अपने ही बनाये पूंजीवादी लोकतंत्र की परवाह नहीं की।

उपनिवेशवाद से छुटकारा पाने के बाद भी तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों को वास्तविक आजादी कभी नहीं मिली। लोकतंत्र का उनका राजनीतिक ढांचा यूरोपीय देशों के पूंजीवादी लोकतांत्रिक ढांचे सा बना। उनकी अर्थव्यवस्था यूरो-अमेरिकी साम्राज्य और पूंजीवादी वैश्विक वित्तीय इकाईयों, बैंको और व्यापार संगठनों पर निर्भर रही है। उनके सामाजिक ढांचे में पूंजीवादी सांस्कृतिक ढांचे का संक्रमण हुआ। भारत में यह कुछ ज्यादा ही हुआ। विभाजन से ही उसकी शुरूआत हुई। जिस विद्वेष और कूट-नीति ने देश को विभाजित किया राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ उसी विद्वेष और कूट-नीति का वारिस है, जिसकी राजनीतिक इकाई आज की भाजपा है और छात्रों के बीच अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद है।

हम यह हमेशा से मानते रहे हैं, कि सामंती अवशेषों से विकसित फासीवाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है, जिसकी राजनीतिक इकाई ने वैश्विक वित्तीय संकट के दौर में वैश्विक वित्तीय इकाईयों- निजी कम्पनियों और कॉरपोरेशनों, से अपने सम्बंधों को बढ़ा कर, देश को मुक्त व्यापार का क्षेत्र बनाने की साजिशें रची है। उन्हीं के सहयेग से केंद्र की मोदी सरकार बनी है। मोदी बाजारवादी अर्थव्यवस्था के निर्मम कारीगर हैं। जिनके लिये देश और देशवासी सौदे की शर्तें हैं। सत्ता पर बने रहने के लिये जिसे पूरा करना मोदी सरकार की नीति है।

अब इस बात को आसानी से समझा जा सकता है, कि जेएनयू ने सरकार के सामने अस्तित्व की कैसी चुनौती रख दी है।(?)

यह चुनौती किसी भी छात्र आंदोलन की क्षमता से बड़ी चुनौती है।

एडमिन ब्लॉक या फ्रिडम स्क्वॉयर का माहौल चाहे जितना लोकतांत्रिक और क्रांतिकारी हो जेएनयू से बाहर दिल्ली या देश का माहौल उतना लोकतांत्रिक और क्रांतिकारी नहीं है।

इसे कड़वी सच्चाई की तरह ही स्वीकार करना चाहिये कि समाज में वर्गगत राजीनीतिक जनचेतना नहीं है।

मोदी सरकार (संघ और भाजपा) के खिलाफ, जिस राजनीतिक धु्रवीकरण की शुरूआत हुई है, वह पूरी तरह से चुनावी ध्रुवीकरण है। इस बात पर गलत यकीन है, कि ‘‘सरकार के बदलने से समाज व्यवस्था में बदलाव आ जायेगा।‘‘

सच यह है, कि फासीवाद की सही समझ भारत के राजनीतिक माहौल में नहीं है।

सच यह है, कि वित्तीय तानाशाही के खिलाफ कोई सोच नहीं है।

सच यह है, कि सरकार और बाजार के बीच की साझेदारी को देश की आम जनता नहीं जानती है। वह इसे लोकतंत्र और अपने लिये सबसे बड़े खतरे के रूप में नहीं देखती।

जबकि जेएनययू के पास इस बात की सही समझ है। उसने यह भी जाहिर कर दिया है, कि ऐसी ताकतों के खिलाफ जन एकजुटता ही सही रास्ता है। जिस पर अब हमले ही नहीं हो रहे हैं, भितरघात भी हो रहे हैं।

जेएनयू ने एक अच्छी शुरूआत की है, जिसे सहयोग और सक्रिय समर्थन की सख्त जरूरत है।

उसका संघर्ष केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और वहां सरकारी हंस्तक्षेप का मामला बन गया है।

यह मामला सरकार की बाजारवादी नीतियां, विश्व व्यापार संगठन से हुए जन विरोधी समझौते के खिलाफ संघर्ष का मामला बन गया है।

शिक्षा का अधिकार,

शिक्षा का निजीकरण और निजी कम्पनियों को दोहरा मुनाफा पहुंचाने की सरकार की नीतियों के खिलाफ खड़े होने का मामला बन गया है।

सरकार देश की बौद्धिक सम्पदा को महंगा उत्पाद बनाने में लगी है, जिसमें निजी कम्पनियों की बड़ी साझेदारी है और फिर उसी सम्पदा को श्रम बाजार (मानसिक एवं शारीरिक श्रम) में सस्ते में बेच कर निजी कम्पनियों को स्थायी मुनाफा पहुंचाने का मामला बन गया है। यह शिक्षा एवं समाज में सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का मामला है।

एक जन विरोधी सरकार को ऐसा करने से रोकने उसे बदलने और जन समर्थक सरकार के लिये संघर्ष का मामला बन गया है।

लातिनी अमेरिकी देश -चिली में जो लड़ाई गये सालों में, वहां के छात्रों ने लड़ी, यह लड़ाई उससे आगे की लड़ाई का मामला है, इस सबक के साथ कि सरकारें आंदोलन के खिलाफ सिर्फ दमन और भितरघात ही नहीं झूठे वायदों का भी सहारा लेती हैं।

फासीवाद के खिलाफ लोकतंत्र की लड़ाई सिर्फ छात्र नहीं लड़ सकते, लड़ कर निर्णायक जीत हासिल नहीं कर सकते, इस बात को समझने और उनके पक्ष में राजनीतिक एवं सामाजिक मोर्चा बनाने की अनिवार्यता है। बाजारवाद के खिलाफ हर स्तर पर लड़ाई लड़ने की अनिवार्यता हैं

यह सोचने का कोई आधार नहीं है, कि जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हो रहा है, जो भारत में हो रहा है, वह सिर्फ जेएनयू और भारत का मामला है। सच यह है, कि यह तीसरी दुनिया के देशों में सरकारों के जरिये, साम्राज्यवादी हंस्तक्षेप का मामला है।

(जारी)

-आलोकवर्द्धन

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