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सउदी अरब और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव

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17 मई को, अमेरिकी कांग्रेस के उच्च सदन -सीनेट- ने ‘जस्टिस अगेंस्ट स्पॉन्सर ऑफ टेरेरिज्म एक्ट‘ को बिना किसी विरोध के पारित कर दिया। जिसे अब कांग्रेस के निम्न सदन -हाउस ऑफ रिप्रसेन्टेटिव- में भेजा जायेगा। माना यही जा रहा है, कि निचली सदन भी इसे पास कर देगी।

इस बिल के पास होने के बाद 9/11 के पीड़ित लोगों को सउदी अरब की सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर करने और सउदी अरब की सरकार से मुआवजा मांगने का अधिकार मिल जायेगा। वे सउदी अरब की सरकार से मुआवजे की मांग कर सकते हैं।

सउदी अरब अमेरिका का मित्र देश रहा है। वह अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिये ही नहीं आतंकवाद के खिलाफ जारी अमेरिकी साम्राज्यवादी सैन्य अभियानों का भी सहयोगी है। इराक, सीरिया और अफ्रीकी देशों पर हो रहे यूरो-अमेरिकी हमलों एवं सैन्य अभियानों में उसकी भूमिका बड़ी रही है। खाड़ी के देशों और तेल उत्पादक देशों पर अमेरिका सउदी अरब के माध्यम से भी अपनी पकड़ बना कर रखता है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को घटाने और बढ़ाने का जो खेल अमेरिकी सरकार दशकों से खेलती रही है, सउदी अरब के बिना वह संभव नहीं है। इस बात को ओबामा सरकार अच्छी तरह जानती है, कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर तेल उत्पादक देशों के सहयोग के बिना टिक नहीं सकता है, जबकि विश्व मुद्रा बाजार में चीनी मुद्रा -युआन- की चुनौतियां भी उसे मिल रही हैं।

सउदी अरब सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने चेतावनी देते हुए कहा है, कि ‘‘‘जस्टिस अगेंस्ट स्पॉन्सर ऑफ टेरेरिज्म एक्ट‘ पारित होने पर सउदी सरकार अमेरिकी निवेश से अपना हाथ खींच सकती है।‘‘

मार्च में वाशिंगटन के दौरे पर आये सउदी अरब के विदेश मंत्री अबेल-अल-जुबीर ने कहा था, कि ‘‘सउदी अरब अमेरिकी ट्रेजरी सिक्यूरिटी और अन्य एसेट्स से, इससे पहले कि न्यायालयीन कार्यवाही या मुकदमा उन्हें खतरे में डाले, 750 बिलियन डॉलर निकाल लेगा।‘‘

16 मई को अमेरिकी ट्रेजरी डिपॉर्टमेंट ने खुलासा किया है, कि ‘‘सउदी अरब मार्च तक में, 116.8 बिलियन डॉलर सिक्यूरिटी का स्वामित्व रखता है।‘‘

कर्ज और डॉलर और विदेश निवेश पर टिकी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिये, यह कोई खास अच्छी स्थिति नहीं है। वैसे भी अमेरिकी डॉलर बिना किसी ठोस ‘गोल्ड सिक्यूरिटी‘ मुद्रा में बदल गयी है। जिसे पीछे साम्राज्यवादी सेना के अलावा कुछ भी नहीं है। सच यह है, कि अघोषित रूप से अमेरिकी अर्थव्यवस्था दीवालिया हो चुकी है। वह वॉल स्ट्रीट के कब्जें में है।

सउदी अरब से अच्छे सम्बंधों के हिमायती रहे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने साफ कर दिया है, कि ‘‘वो सीनेट के द्वारा पारित बिल और हाउस ऑफ रिप्रजेन्टेटिव में विचाराधीन बिल यदि पारित हो जाता है, तो व्हाईट हाउस इस बिल को रोकने के लिये वीटो पॉवर का इस्तेमाल करेगा।‘‘ यह भी स्पष्ट है, कि यह स्थिति अमेरिका के घरेलू राजनीति में डेमोक्रेट्स के लिये अच्छी नहीं होगी। यही कारण है, कि एक डेमोक्रेट्स सांसद ने बीबीसी से कहा है, कि ‘‘इस मामले में राष्ट्रपति ओबामा को वीटो पॉवर का उपयोग नहीं करने दिया जायेगा।‘‘ किंतु व्हाईट हाउस के प्रवक्ता के अनुसार- ‘‘ओबामा इस बिल को लेकर काफी चिंतित हैं और इस बात की पूरी उम्मीद है, कि वो इस बिल पर दस्तखत नहीं करेंगे।‘‘

2001 में हुए 9/11 के आतंकी हमले के लिये अमेरिका अलकायदा को दोषी मानता है। इस हमले में जिन 19 लोगों ने अमेरिकी विमानों का अपहरण किया था उनमें से 15 लोग सउदी अरब के नागरिक हैं, 2 यूनाईटेड अरब अमिरात और 1 लेबनान और 1 मिस्त्र के नागरिक हैं। वैसे 2004 में बने जांच आयोग ने इस हमले में सउदी अरब की भूमिका से इंकार किया है। इसके बाद भी, ‘जस्टिस अगेन्स्ट स्पान्सर ऑफ टेरेरिज्म एक्ट‘ के पारित होने से उसके प्रावधानों के तहत सउदी अरब सरकार का आना तय है।

हम यह हमेशा से मानते रहे हैं, कि 9/11 अमेरिका की अपनी कारस्तानी है, और सउदी अरब अमेरिका की तरह ही अघोषित रूप से आतंकी देश है। अलकायदा को अमेरिका ने ही खड़ा किया और ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड सीरिया‘ भी अमेरिका और सउदी अरब की देन है। इसलिये आतंकवादी हमले को लेकर दोनों देशों के बीच बढ़ता तनाव वास्तव में आतंकवाद विरोधी साम्राज्यवादी युद्ध की ऐसी विसंगतियां है, जो एक ही खेमें के दो देशों के बीच उभर आयी है। इस बात की संभावना कम ही है, कि अमेरिकी सरकार सउदी अरब से अपने सम्बंधों की अनदेखी कर सकती है।

-अनुकृति, आलोकवर्द्धन

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