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मोदी के मुखौटे का भरम

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भाजपा की फिक्र मोदी के भरम को बना कर रखने की है। उस छवि को टूटने से बचाने की है, जो वास्तव में टूट रही है। पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव परिणामों से यह बात बिल्कुल साफ हो गयी है, कि मतदाताओं के सामने जहां भी कांग्रेस और भाजपा का विकल्प रहा है, उन्होंने उसे अपनी मंजूरी दी है।

कांग्रेस को उन्होंने केरल, पश्चिम बंगाल में खारिज किय।

भाजपा को उन्होंने तमिलनाडू मे पूरी तरह खारिज किया। 232 सीटों के विधानसभा में, भाजपा ने 232 उम्मीदवार खड़े किये थे, मगर उसे वहां एक भी सीट नहीं मिली। मात्र 2.8 प्रतिशत वोट वह हासिल कर सकी। वहां के स्थानीय चैनल ‘सन न्यूज‘ से मिली जानकारी के अनुसार 230 सीटों पर भाजपा की जमानत जप्त हो गयी।

पांडुचेरी में कांग्रेस की सरकार बनी।

असम की जीत को भाजपा अमित शाह की चुनावी रणनीति और नरेंद्र मोदी के सम्मोहन के रूप में भुना रही है। कांग्रेस का विकल्प बनने का दावा पेश कर रही है। वह इस बात को छुपाने में लगी है, कि दो राज्यों में उसका खाता तक नहीं खुला और दो राज्यों में दहाई के आंकड़े को छूने के लायक भी नहीं है। कि असम में पिछले तीन बार से कांग्रेस की सरकार थी और यह परिवर्तन स्वाभाविक भी है। इसलिये यदि कांग्रेस और भाजपा की बात करें तो केंद्र हो या विधानसभा, एक बाजारवादी जनविरोधी भ्रष्ट सरकार के बाद दूसरी बाजारवादी जनविरोधी भ्रष्ट सरकार के दौर का, अभी अंत नहीं हुआ है। और यह अंत होगा भी नहीं। कांग्रेस की मनमोहन सरकार ने जिसे शुरू किया भाजपा की मोदी सरकार उसे ही खुलेआम कर रही है। और राष्ट्रीय स्तर पर आम जनता के सामने कोई विकल्प नहीं है।

‘‘कांग्रेस मुक्त भारत‘‘ भाजपा का अभियान है। उसे नहीं पता कि यह होने वाला नहीं है, और यदि हुआ तो ‘‘भाजपा मुक्त भारत‘‘ का होना भी तय है। देश की आम जनता के लिये ‘‘वन गेट, वन फ्री‘‘ और आप तो जानते हैं, कि बाजारवादी ताकतें ऐसा ऑफर तब तक नहीं देंगी, जब तक तीसरी दुकान की व्यवस्था नहीं हो जाती। वैसे बाजार में आम आदमी पार्टी, बसपा, सपा, तृणमूल, डीएमके, एडीएमके जैसी दुकानें पहले से खुली हैं, और दुकानें चल भी रही हैं। बिहार को नहीं भूलना चाहिये, नीतीश कुमार तो तीसरे मोर्चे का न्योता भी बांट चुके हैं।

आप कहेंगे, बात मोदी के भरम की हो रही थी, जिसे हमने विधानसभा चुनाव परिणामों में घुसा दिया, और अब ये दुकानें कहां से खुल गयीं?

राजनीति में भी छोटी-बड़ी दुकानें हैं बंधु! जैसे-जैसे वहां बाजार बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे दुकानें खुलती जा रही हैं। खुली हुई दुकानें आपस में जुड़ती जा रही हैं। अब ‘चेन स्टोर्स‘ का जमाना आ गया है। भाजपा की दुकान में पुरानी चीजें नये कलेवर में बिक रही हैं। इसलिये दुनिया भर में जहां भी ऐसी दुकानें हैं, वो अपना सामान भाजपा के दुकानों तक पहुंचा रही हैं। यही उनका वैश्वीकरण है। इसे आप बाजारीकरण भी कह सकते हैं। यूरोप और अमेरिका का डेमोक्रेटिक मास्क और उसके पीछे की वित्तीय तानाशाही की सूरतें भाजपा के दुकान में है। उसने नकल की अक्ल को बढ़ावा दे कर हिंदू राष्ट्रवाद और सामंती फासीवाद का अपना प्रोडक्ट भी बना लिया है। उसने यह जान लिया है, कि ऐसी सूरतें लोकतंत्र और देशभक्ति के मुखौटों में बिकती हैं।

इसलिये जहां समझदार हैं, वहां न तो मोदी की सूरत बिकी, ना ही मुखौटा बिका। केरल, तमिलनाडू, पांडुचेरी और पश्चिम बंगाल के माल गोदामों में मोदी जी धरे के धरे रह गये। कोई खरीददार नहीं मिला। मुफ्त में या उपहार दे कर थमाने की राजनीति भी नहीं चली। केरल में मोदी जी पर तरस खा लिया गया कि ‘‘बंदा परले दर्जे का है, अक्ल और आंख दोनों से हाथ धो बैठा है, केरल में सोमालिया नजर आ रहा है।‘‘

असम में गुलाल पुते चेहरों की खुशी और अमित शाह की गद्देदार हंथेली की दो मोटी अंगुलियों की विक्ट्री का निशान, भले ही चायवाले की दुकान में चाय बगानों से सीधे चाय सप्लाई का पहला समझौता है। और राजनीति गणित बाजों के लिये चायवाले की दुकान पर मोमो के बिकने की उम्मीदें हैं। वो चाय के साथ मोमो का कॉम्बिनेशन उत्तर प्रदेश में बैठा रहे हैं, जहां जलेबी और कचौड़ी है जनाब। लस्सी और चाट धडल्ले से बिकता है। सपा लस्सी बरसा रही है और नीतीश कुमार नये किस्म के चाट का ठेला लगाने में लगे हैं। भाजपा के दुकान में राम जी विकास के बड़े-बड़े दावों के साथ खड़े हैं।

पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा और कांग्रेस को शिकश्त मिली है, और तृणमूल कांग्रेस को बड़ी जीत। शिकश्त भाजपा को भी मिली है। ममता बैनर्जी ‘दीदी‘ की सरकार फिर से बन गयी है। बिहार में लालूवादी सरकार बनाने वाले नीतीश कुमार ने ‘संघ मुक्त भारत‘ के सपने के साथ 2019 की तैयारी में हैं। उन्हें अच्छा लग रहा होगा, कि पश्चिम बंगाल और दीदी जी साथ देंगी। साथ दे सकती हैं। यह तो हवा के रूख पर निर्भर करता है, या उस ऊंट पर निर्भर करता है, कि वह पहाड़ के नीचे आना चाहता है, या नहीं आना चाहता है? यदि पहाड़ सिकुड़ गया और ऊंट बढ़ता चला गया, तो बयार सुखद बह सकती है, और यदि ऐसा नहीं हुआ तो खयाल बुरा नहीं। वाम मोर्चा भी एक सवाल है।

तमिलनाडू में जयललीता की ‘अम्मा सरकार‘ डंट गयी है। साथ दे सकती है। यहां भी ऊंट है। ऊंट किस करवट बैठेगा? सवाल है। सौदा है।

कांग्रेस की मुश्किल उसका अकेला पड़ना है।

जितनी बड़ी सफलता उसके खाते में रही है, और जैसी स्थितियां उसकी बन गयी हैं, उसके लिये अस्तित्व का संकट है। संघ, भाजपा और सरकार समर्थक मीडिया उसके खिलाफ है। मोदी की कद और सूरत इतनी बढ़ाई जा रही है, कि उसके सामने नेतृत्व का संकट पैदा हो गया है। उसके सहयोगी दल पराजय के लिये उसे जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। केरल उसके लिये करैला ही सिद्ध हुआ, जहां वाम मोर्चा की वापसी हुई है। जहां जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार भी चुनाव प्रचार में वाम मोर्चा में शामिल हुए।

कॉमरेड येचुरी पोलित ब्यूरो की मीटिंग बुलाये- आत्म आलोचना के लिये। हो सके तो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यदि मत पत्रों से ही क्रांति होनी है, तो वाम मोर्चा को ही तीसरा मोर्चा बनायें। तीसरे मोर्चे की कवायतें बहुत हुईं। पश्चिम बंगाल के बारे में सोचें, उत्तर भारत के बारे में सोचें और पूरे देश के बारे में सोचें और यह भी सोचें कि जेएनयू का छात्र आंदोलन क्या कह रहा है?

हम यह नहीं कह रहे हैं, कि बाजारवादी, फॉसिस्ट ताकतों के खिलाफ विपक्ष की एकजुटता या राजनीतिक ध्रुवीकरण की नीति गलत है। हम यह कह रहे हैं, कि वामपंथी एकजुटता, जन समस्याओं के समाधान के लिये जनसंघर्ष करें, जुबानी जमा खर्च नहीं, वास्तविक। यदि संसद और विधानसभा चुनावों पर ही आपका जोर है, तो आम मतदाता के सामने ठोस विकल्प की तरह खड़े हों। सरकार बनाने की पक्की दावेदारी पेश करें। संसद में सवाल खड़े करें, मगर सड़कों पर लड़ाईयां लड़ें। मुद्दों की कमी नहीं है। जनविरोधी सरकारें रोज नये मुद्दे देती हैं।

मोदी प्रायोजित सूरत हैं। झूठे गवाहों की तरह, जनता की अदालत में उसे तोड़ना, आसान नहीं होगा। भले ही भरम टूट रहा है।

-आलोकवर्द्धन

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