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पतन के ढ़लान पर खड़ी यूरोपीय व्यवस्था

a575ea6b4ffebdb0c8f59e129ec5यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों की अर्थव्यवस्था के संभलने की संभावनायें खत्म सी हो गयी हैं।

इन देशों का क्या होगा? यह बताना मुशिकल है।

यूरोपीय संघ का टूटना तो तय है, मगर उसके पीछे खड़ी वित्तीय ताकतों ने जिस तरह देश और उनकी सरकारों को अपने कब्जे में कर लिया है, उसे देखते हुए इस बात की उम्मीदें नहीं बनती, कि सामाजिक पतन के ढ़लान पर बिखरा-बिखरा सा जनअसंतोष जनक्रांति का रूप ले पायेगा।

इसके बाद भी यह तय है, कि जन विरोधी सरकारें अपनी मुशिकलें रोज बढ़ाती जा रही हैं, वो जन असंतोष और अपने क्रमिक पतन को रोक नहीं पा रही हैं। वो ना तो यूरोपीय संघ से अलग हो कर अपने को बचा सकती है, ना ही यूरोपीय संघ में रह कर सुरक्षित है। वो ऐसे कर्ज में डूबी हुर्इ है जिससे निकलने की राहें यूरोप की मौजूदा समाज व्यवस्था में नहीं हैं।

फोब्स मैगजिन द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार बि्रटेन का विदेशी कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद का 436 प्रतिशत के बराबर हो गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ”बि्रटेन का विदेशी कर्ज स्पेन (284 प्रतिशत), फ्रांस (225 प्रतिशत) और जर्मनी (176 प्रतिशत) से भी ज्यादा है।” इटली की हालत भी खराब है, उसकी अर्थव्यवस्था भी गहरे गोते लगा रही है।

ये यूरोप की पांच ऐसी बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिनके होने से यूरोप का बाजार बनता है। जो यूरोपीय संघ का प्रतिनिधित्व करते हैं।

26 नवम्बर को लंदन में 6 बड़ी एनर्जी कम्पनियों के द्वारा ऊर्जा के मूल्यों में की गयी वृद्धि के खिलाफ भारी प्रदर्शन हुआ। इन कम्पनियों के द्वारा ऊर्जा और र्इंधन में मूल्य वृद्धि का कोर्इ आधार नहीं है, क्योंकि पिछले 4 सालों में इनके मुनाफे में 5 गुणा वृद्धि हुर्इ है, जिसकी घोषणा इन्होंने ही की है। दूसरी ओर आम जनता की हालत यह है कि साल 2012 में ठण्ड से मरने वालों की संख्या 30,000 थी। जिसकी मूल वजह ऊर्जा एवं र्इधन के मूल्य में की जा रही वृद्धि है।

पूरे यूरोप की हालत कम-ओ-बेश यही है, कि निजी कम्पनियों का मुनाफा लगातार बढ़ रहा है, मगर आम जनता की हालत बद से बदत्तर होती जा रही है। उनके पास न तो खाना-कपड़ा है, ना आवास है, ना ही उनके पास करने को कोर्इ काम है। एक ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित हो गयी है, जिसे बचाने के लिये वहां की सरकारें आम जनता पर ऐसे कर्ज का बोझ लादती जा रही हैं, जो नये कर्ज के लिये कटौतियों के प्रस्ताव को मानती है, और उससे पुराने कर्ज का ब्याज जमा करती है, और अपनी राजनीतिक इकार्इयों को चलाने के लिये खर्च करती है। काम, वेतन, पेंशन और सामजिक मद में कटौतियां लगातार जारी हैं।

यूरो स्टैट डाटा एजेन्सी द्वारा जारी किये गये नये आंकड़ों के अनुसार सितम्बर में 17 देशों के यूरोजोन में बेरोजगारी दर अपने चरम पर, 12.2 प्रतिशत पहुंच गयी है। इस तरह यूरोजोन में 19.5 मिलियन लोग बेरोजगार हैं। ग्रीस और स्पेन में सरकारी तौर पर अभी भी बेरोजगारी दर 25 प्रतिशत से ज्यादा है। फ्रांस में 11.1 प्रतिशत और इटली में 12.5 प्रतिशत बेरोजगारी दर है। जोकि वस्तुसिथति की सही तस्वीर नहीं है।

यूरोपीय संघ का बेरोगारी दर पिछले 4 महीने से 11 प्रतिशत पर सिथर है, क्योंकि उन लोगों को इन आंकड़ों में शामिल नहीं किया गया है, जिन्होंने थक कर काम ढूंढना बंद कर दिया है। यूरो स्टैट के अनुसार ग्रीस में सितम्बर में युवा बेरोजगारी दर 57 प्रतिशत थी, जबकि, ‘हैलेनिक स्टेटिसटिक्स अथारिटी’ के अनुसार मर्इ में ही यह बेरोजगारी दर 64.9 प्रतिशत हो गयी थी। इतनी बुरी सिथति होने के बाद भी ग्रीस के बजट में कटौतियाें का प्रस्ताव है।

बोसिनया, मैसिडोनिया और क्रोएसिया में भी युवा बेरोजगारी दर 50 प्रतिशत से ऊपर है। यह कहा जा सकता है, कि काम करने लायक आधी से अधिक युवा आबादी यूरोप में बेरोजगार है, उसके पास कोर्इ काम नहीं है। वह न तो पढ़ती है, न काम करती है, ना ही कहीं प्रशिक्षण ले रही है, कि आने वाले कल की उम्मीदें बची रहें। वह सामाजिक अराजकता और हताशा का शिकार होती जा रही है।

यूरोजोन के जीडीपी का 95 प्रतिशत से ऊपर, उस पर कर्ज है। अर्थशासित्रयों का मानना है, कि ”ऐसी सिथति में ज्यादा समय तक अपने को बना कर नहीं रखा जा सकता।” यदि सुधार नहीं होगा तो असिथरता बढ़ती चली जायेगी।

एक तरफ यूरोपीय संघ और यूरोजोन के सदस्य देशों और आम लोगों की हालत इतनी खराब है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका की तरह ही जर्मनी के शेयर बाजार (डी0ए0ऐक्स0) ने 9,000 के आंकड़े की ऊंचार्इ को पार कर लिया। ऐसा इतिहास में पहली बार हुआ। इस आंकड़े को छूने की वजह भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के स्टाक मार्केट का आत्मघाती फण्डा है। जिसके तहत यूरोपी सेण्ट्रल बैंक के द्वारा लगभग ब्याज मुक्त कर्ज बैंकों को दिया जा रहा है। जिससे बाजार में भले ही उभार नजर आ रहा है, मगर वस्तु सिथति पहले से ज्यादा बिगड़ती जा रही है।

जिस समय यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक यूरोपीय देशों के बैंकों को कर्ज दे रही है, उसी समय वह दुनिया के अन्य सेण्ट्रल बैंकों के निवेशकों को भी काफी मात्रा में पैसे उपलब्ध करा रही है। वो एक नये संभावित वित्तीय बुलबुले को जन्म दे रही है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि पिछले पांच सालों में बैंकों और सटटेबाजों पर लगाम कसने के लिये कोर्इ भी गंभीर कदम नहीं उठाया गया। एक ऐसी वित्तीय प्रक्रिया को छूट दी गयी, जो वित्त व्यवस्था के लिये गंभीर संकट पैदा कर रहा है।

वित्तीय वार्ताकार वोल्फगैंग मुन्छाओ ने देर स्पीगल में अपने कालम का निष्कर्ष कुछ इस तरह किया- ”एक बार फिर कम ब्याज दर, गलत वित्तीय उत्पाद, के साथ वित्तीय सक्रियता और बैंकों तथा सटटेबाजों पर लगाम कसने की राजनीतिक अनिच्छा एक दूसरे से मिल गये हैं, और हम एक बार फिर कैसिनो में पहुंच गये हैं। और हम सब जानते हैं, कि इसका अंत कैसे होता है।”

जुआघर, सटटा बाजार और स्टाक मार्केट पर टिकी अर्थव्यवस्था यूरोप में अपने विकास के चरम पर है। जहां आम आदमी के सुरक्षा की कोर्इ गारण्टी नहीं है। यही नहीं यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा की भी कोेर्इ गारण्टी लेने की सिथति में नहीं है। यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने पूरे यूरोप पर अपना अधिकार जमा लिया है। बैंकों और वित्तीय इकार्इयों के माध्यम से यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था पर उनका आधिपत्य हो गया है, और सदस्य देश की सरकारें उनके राजनीतिक हितों के लिये काम कर रही है। उनकी सेनायें अमेरिकी सेना और नाटो सेना का हिस्सा बन गयी है, और पुलिस प्रशासन तथा गुप्तचर इकार्इयां आम जनता का दमन करने का काम कर रही है।

यूरोपीय महाद्वीप का कोर्इ भी ऐसा देश नहीं है, जहां जनविरोधी सरकारें और उनके खिलाफ जनप्रदर्शन न हो रहे हों।

आर्थिक बदहाली और निजी कम्पनियों-कारपोरेशनों का बेरोक-टोक मुनाफा

सामाजिक हताशा और असंतोष

राजनीतिक अनास्था और पूरी व्यवस्था को बदलने की सोच

यूरोप की तह और सतह में फैल गयी है।

भूख, गरीबी, बेकारी और अभाव आम जनता के होने पर फैला हुआ है। यह कहा जा सकता है, कि यूरोपीय देशों में ऐसी एक भी सरकार नहीं है, जो आम जनता की फिक्र करती हो और जनसमस्याओं का समाधान करना जिनका मकसद हो। सरकारें यूरोपीय संघ के ‘आदेशों’ का पालन कर रही है। जिस पर जर्मनी और फ्रांस का वर्चस्व है। जो खुद भी आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहे हैं और जिन पर उनके सकल घरेलू उत्पादन से सैंकड़ों गुणा विदेशी कर्ज है। सरकारें रोज दिवालिया होने की ओर बढ़ रही हैं।

इसके बाद भी, यह चौंकाने वाला सच है कि

जर्मनी के 10 प्रतिशत लोगों के पास राष्ट्रीय सम्पतित का 67 प्रतिशत जमा है। और फ्रांस के 10 प्रतिशत लोगों के पास उसके राष्ट्रीय सम्पतित का 62 प्रतिशत सम्पतित जमा है। पूरे यूरोपीय देशों की सिथति कुछ ऐसी है। आम आदमी बदहाल है, और सरकारें इसलिये भी दिवालिया हो रही हैं कि निजी कम्पनियों और कारपोरेट जगत ने वित्तीय पंूजी का विस्तार कर लिया है। जिनके हाथ में यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां है।

यूरोपीय देशों की आम जनता अपने देश की सरकार, यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों और उनकी मुक्त बाजारवादी आर्थिक नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रही है। जिनके पीछे सात परदों में छुपी ऐसी वित्तीय ताकतें हैं, जिसकी पहचान खुले आम नहीं है। जो यूरोप ही नहीं, अमेरिकी साम्राज्य और तीसरी दुनिया के लिये भी सबसे बड़ा खतरा है। और यह खतरा यूरोपीय संघ और अमेरिकी साम्राज्य के माध्यम से सारी दुनिया में फैल गया है। पतन के ढ़लान पर खड़ी यूरोपीय व्यवस्था अकेली नहीं है।

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