Home / साहित्य / कविता / सीमा संगसार की पांच कविताएँ

सीमा संगसार की पांच कविताएँ

सीमा1.बाल दिवस

ठिठूरते गुलाबी जाड़ा में
नन्हे हथेलियों से
धोते हुए
झूठे चाय के गिलास में
वह ढूंढता है,
गर्म चाय की उष्मा
काश—-
थोड़ी गर्माहट मिल जाती
इस कंपकंपाते हाथों को
बूढा मालिक जब चिल्लाता है
उस पर
तेज तेज हाथ चला
वह देख रहा होता है
टी0 वी0 पर
बाल दिवस का मनाया जाना |

 

2. सरकारी स्कूल के बच्चे

फटी जेबों में
संभाल कर रखी
कुछ रेजगारियों की,
खनक
आश्वस्त करता है इन्हें
अपनी छोटी छोटी
ख्वाहिशें पूरी होने की !!!
चंद सिक्कों में ही
ये खरीद लेना चाहते हैं
अपने सारे सपने—-

छलांगे लगाते
इनका बचपन
हिलोरें मारता हुआ
तेजी से बढ़ता है
अभावों को पैवंद में
छिपाते हुए
बहुत जल्दी सयाने हो जाते हैं
सरकारी स्कूल के बच्चे |

 

3. पाषाणी संस्कूति

पाषाण युग के लोग
हो रहे थे परिचित पत्थरों से
आज हम होते जा रहे हैं
खुद ही पाषाण मूर्ति
हमारी संवेदनाओं पर पड़ते रहे
चाहे लाख हथौड़े
पिघलती नहीं है
हमारी आत्माएं—-
उनके बच्चे पलते हैं
एयरकंडीसंड कमरे में
ये तोड़ती हैं पत्थरें
उनके संगमरमरी महलों में
रहने के खातिर
ताकि उनके स्तनों में
बहता रहे दूध अनवरत |

 

4. वो चार दिन

बचपन की जमीन पर
अट्ठा गोटी खेलती लड़कियाँ
अन्जान होती है
उन चार दिनों की
मानसिक यंत्रणाओं से—-

जब उसे
अछूत मान लिया जाएगा
सच है
सवर्ण होते हैं पुरूष
और
नारी सदियों से दलित है !

 

5. बुरा वक्त

ऐसे समय में जब
लाशें बिछ रही है
तर्कों कुतर्कों के बीच
मायने नहीं रखता
हमारा जिंदा होना
समय की मांग है कि
हम जिंदा रहें
अपने विचारों के साथ—

जब आजादी की मांग
देशद्रोहीयों की मांग कहलाने लगे
समझो
वह राष्ट्र मर गया है
जहाँ जिंदा रहना बेमानी है
क्योंकि तब हर रोज एक “वेमुला”
अभिशप्त होगा आत्महत्या को
और
आजादी की जंग लड़ने वाले
सलाखों में बंद होते रहेंगे
हर रोज एक”कन्हैया”—-
ऐसे बुरे वक्त में
जिंदा लाश की तरह
एक मात्र विकल्प मौन ही है |

-सीमा संगसार

कवि परिचय :

सहायक शिक्षिका म0 वि0 मसनदपुर, बीहट बरौनी (बेगूसराय)

प्रस्तुति : नित्यानन्द गायेन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top