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सरकारें सबसे बड़ा खतरा बन गयी हैं

Narendra Modi

किसी भी देश के लिये सरकार उसकी सम्प्रभुसत्ता का प्रतीक होती हैं। जिसे बनाने का अधिकार उस देश की आम जनता को होता है, इसलिये सैद्धांतिक रूप से देश की सम्प्रभुसत्त उस दे के लोगों में नीहित होती है, जिसे वह सरकार के माध्यम से व्यक्त करती है। इसलिये, सरकार के अधिकर क्षेत्र के भीतर जो भी है- प्रकृति, भू-खण्ड और उस में निवास करने वाले लोग- उस पर उस देश की आम जनता का अधिकार होता है।

सैद्धांतिक रूप से यह बात आज भी मान्य है।

सरकारें अपने देश की आम जनता के प्रति जिम्मेदार होती हैं।

किंतु यह स्वाभाविक स्थिति बदल सी गयी है। साम्राज्यवादी हस्तक्षेप और निजी वित्तीय पूंजी की बढ़ती हुई ताकत ने सरकारों को न सिर्फ जनविरोधी बना दिया है, बल्कि किसी भी देश के लिये सरकारें सबसे बड़ा खतरा बन गयी है। लोकतंत्र की भावनाओं के विपरीत सरकार यह मानने लगी है, कि देश और देश में रहने वाले उनके अधीन हैं।

मतलब?

जहां भी सरकारें हैं, वहां व्यक्ति स्वतंत्र नहीं। समाज पर सरकार का नियंत्रण है। उसके स्वाभाविक विकास की दिशा अवरूद्ध हो गयी है।

आप चाहें तो सोच सकते हैं, कि मैं यह कह रहा हूं कि सरकारें समाज के विकस की सही एवं स्वाभाविक दिशा को रोक कर खड़ी है। किंतु आप यदि यह सोच रहे हैं, कि मैं ‘अराजक‘ हूं। तो आप गलत सोच रहे हैं।

हम उस सरकार के विरूद्ध हैं- जो जन विरोधी है।

हम उस सरकार के विरूद्ध हैं, जो व्यक्ति और समाज को अपनी सम्पत्ति समझते हैं और समझते हैं, कि देश की सम्पदा -जो वहां के लोगों की सम्पदा है, उसका वो सौदा कर सकती हैं, उसे अपनी और निजी कम्पनियों के हितों के लिये बेच सकती है। उनके पास  देश और देशवासियों की प्राकृतिक एवं श्रम सम्पदा को बेचने का अधिकार है।

देश की चुनी हुई सरकारें इसे पांच साल के लिये अपना अधिकार मान लेती हैं। उनका लोकतंत्र सिर्फ इतना ही होता है, कि वो पांच साल के मालिक हैं। पांच साल में एक बार मालिकाना हक लिखवाने वो आम जनता के बीच आ जाती है। और मालिकाना हक लिखना हमारी जिम्मेदारी है। हम चाह कर भी अपना मालिकाना हक अपने पास नहीं रख सकते। हमें अपना यह मालिकाना हक उन्हें देना ही होगा। नहीं, देने का कोई संवैधानिक विकल्प नहीं है।

यह विकल्पहीनता समाज के सबसे कमजोर और बहुसंख्यक वर्ग के लिये है, और राज्य की सरकारों की वजह से है, उन ताकतों की वजह से है, जिन्होंने सरकारों पर अपना कब्जा जमा लिया है। जबकि लोकतंत्र की सरकारें आज भी हमारे नाम से बनाई जाती हैं, ‘आम लोगों के हितों से संचालित होती है‘, यह बताई जाती है, यह भी कहा जाता है, कि सरकारें हमारी बेहतरी के लिये, हमारे विकास के लिये काम कर रही है।

यदि सरकारें सचमुच आम लोगों के हितों के लिये काम करती सामाजिक विकास एवं बेहतरी के लिये काम करतीं, तो आज दुनिया जैसी है, युद्ध, आतंक, शोषण और दमन से भरपूर- न सिर्फ उससे बेहतर होती, बल्कि युद्ध, आतंक, शोषण और दमन जैसी कोई चीज नहीं होती। न तो प्रकृति इनती नाराज होती, ना ही सामाजिक संकट इतना गहराया हुआ होता, कि आने वाले कल की संभावनायें ही खत्म हो जाती। लोकतंत्र में पांच साल के इन मालिकों ने ऐसी स्थितियां बना दी है कि किसी भी देश की आम जनता को अपनी सरकार चुनने और उसे बनाने आधिकार ही खत्म हो गया है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय ताकतों से शोषित राजनीतिक दलों की स्थितियां ऐसी होती हैं, कि वो हमारे सामने एक सरकार केे बाद दूसरी सरकार का विकल्प रखती है, जिन्हें चुनने की विवशता होती है। संवैधानिक अधिकार होता है, अपने देश की सरकार बनाने का ऐसा अधिकार जिससे जन समर्थक सरकार बनाने की संभावनायें नहीं बनती।

हम राज्य की वरियता और सरकार के विरूद्ध नहीं हैं।

हमारा विरोध सरकार के जरिये राज्य एवं समाज को नियंत्रित करके उसे शोषण एवं दमन की इकाई में बदलने से है। हम चाहते हैं, कि सरकारें अपने देश की और दुनिया की आम जनता के प्रति जिम्मेदार हों। लेकिन स्थितियां इसके बिल्कुल विपरीत हैं। सरकार एवं बाजार की साझेदारी ने समाजिक विकास की दिशा को पलट दिया है। राज्य एवं सरकार की उत्पत्ति जिन कारणों से हुई थी, उन्होंने उस कारणों को ही मार दिया है। उसे शोषण एवं दमन का सबसे बड़ा जरिया बना लिया है। उन्हें आम जनता के विरूद्ध खड़ा कर दिया है। हमसे हमारा सब कुछ छीन लिया गया है। हमसे हमारी प्राकृतिक, समाजिक और निजी सम्पदा छीन ली गयी है, जिसे सुरक्षित रखने की और जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य की सरकारों की है।

यदि हम अपने देश की मौजूदा सरकार को लें, जो एक राष्ट्र, एक दल और एक नेता की सोच से संचालित हो रही है, जिसके इस छवि को सम्मोहक बनाने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकाईयों ने संभाल ली है, सरकार देश और देश की आम जनता के लिये सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है।

उसने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण को खुले तौर पर अर्थव्यवस्था के निजीकरण में बदल दिया हैं वह एक ऐसी वित्तीय इकाई, विश्व व्यापार संगठन और वाॅल स्ट्रीट के दैत्याकार बैंकों की नीतियों का पालन कर रही है। उसने देश की सरकार को ऐसा बौना उस्ताद बना दिया है, जो मुक्त व्यापार के लिये बाजारवादी ताकतों की अंगुलियां पकड़ कर चल रहा है। उसने निजी वित्तीय पूंजी को खुली छूट दे रखी है, और निजी पूंजी निवेश के लिय सभी दरवाजे खोल दिये हैं।

मीडिया के सहयोग से -एक राष्ट्र, एक दल, एक नेता की सोच और निजी पूंजी निवेश के लिये आर्थिक सुधारों के लिये उस वातावरण का निर्माण कर लिया गया जिसकी दिशा- राजनीतिक रूप से फाॅसिस्ट तानाशाही और आर्थिक रूप से वित्तीय तानाशाही है।

इस तरह देश की चुनी हुई सरकार ही उदार लोकतंत्र और मिश्रित अर्थव्यवस्था के विरूद्ध है, वह राजनीतिक एकाधिकार और आर्थिक एकाधिकारवाद की पक्षधर बन गयी है। जिससे देश की राजनीतिक संरचना ही नहीं टूट जायेगी, आर्थिक एवं सामाजिक ढांचा भी टूट जायेगा। देश और देश की आम जनता उस खतरे की ओर बढ़ रही है, आजादी के बाद, जिसका अनुभव उसे नहीं है। भले ही देश की मोदी सरकार ने इस खतरे को बढ़ाया है, मगर मनमोहन सरकार ने इसकी शुरूआत की, और अब इसका सम्बन्ध मोदी सरकार के होने या न होने से नहीं रह गया है। लातिनी अमेरिकी देश नवउदारवाद के जिस शोषण, दमन और सैनिक एवं वित्तीय तानाशाही के गलियारे से निकलने की लड़ाई लड़ रहे हैं, भारत उसी गलियारे में घुसता जा रहा है। यह दशकों का मामला है। सरकारें, वैश्विक वित्तीय ताकतों के लिये अपने देश और देश की आम जनता को खतरे में डाल रही हैं।

-आलोकवर्द्धन

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