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बीएचयू गेट पर जेएनयू, जय भीम, लाल सलाम

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कुछ लोगों ने मान लिया है, कि ‘‘यदि हम दूसरों को नहीं बोलने देंगे तो हमारी बात सुनी जायेगी।‘‘

मूर्खों के सींग नहीं होते।

7 जून 2016 को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सिंह द्वार और लंका चैराहे पर यह नजारा खुले आम देखने को मिला। एबीवीपी के लोगों ने मालवीय जी को भी माला पहना कर और आंखों में अंगुलियां डाल कर यह नजारा दिखाया।

उन्हें शर्म नहीं आयी, अच्छा लगा, कि सभी के सहयोग से बने विश्वविद्यालय पर उन्होंने कब्जा कर लिया है। नये उप-कुलपति ने विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को संघ और सरकार की स्वायत्तता के हवाले कर दिया है।

  • अब साइबर लायब्रेरी 24 घण्टे नहीं खुलेगी।
  • जो भी विरोध करेगा, भूख हड़ताल या आंदोलन खड़ा करेगा, उसे काॅलर पकड़ कर विश्वविद्यालय से बाहर निकाला जायेगा।

यह तुगगलकी नहीं, संघी फरमान है।

जैसे देश के प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी को यह मुगालता हो गया है, कि उनकी आवाज इस देश की आवाज है, वैसे ही उनके तमाम सिपहसालारों को यह मुगालता हो गया है, कि तमाम बिगड़े हुए लोगों -खास कर श्रमिकों, कर्मचारियों और छात्रों- को संघ के सही राह पर लाना उनकी जिम्मेदारी है।

वो अपने बारे में सोचते नहीं, उन्हें अपने सही होने का पक्का यकीन है। इसलिये जो भी उनके खिलाफ है, वह गलत है, उनकी संस्कृति के खिलाफ है, देशद्रोही है, जेएनयू के प्रभाव में है।

और जहां जेएनयू है, वहां देशद्रोही हैं। कन्हैया कुमार की आजादी का भूत है। जिनसे निपटने के लिये संघ प्रमुख का आदेश है ‘‘ऐसे लोगों से सरकार सख्ती से पेश आये।‘‘

सरकार सख्ती से पेश आ रही है।

उसके सिपहसालार सख्ती से पेश आ रहे हैं।

सख्ती है, कि सभायें न हों, सम्मेलन न हों, आंदोलन न हों। सख्ती है, कि जुबान बंद हो।

रोहित वेमुला से लेकर जेएनयू मामले में, और जेएनयू मामले से लेकर केंद्रीय विश्वविद्यालयों के मामलों तक, जब सरकार की नीतियों, आरोपों और गलत बयानबाजी का तर्क संगत जवाब मिलने लगा, तब सरकार सेंसर, ब्लैक आउट और छात्रों की बोलती बंद करने की लिये दमन पर उतर आयी है।

लोगों की जुबान बंद करने की तैयारियां बड़ी हैं साजिशें बड़ी हैं।

‘सुरक्षा‘ और ‘विकास‘ को धारदार हथियार बना लिया गया है। बीएचयू गेट और लंका चैराहे पर भी यही हुआ।

पुलिस ‘हमारी सुरक्षा‘ के लिये हमें सभा करने से रोकती है, वहां से हटा देती है। वह शांतिपूर्ण प्रदर्शन और शांति पूर्ण सभाओं को रोकती है। वह उन्हें नहीं रोकती जो हमलावर हैं, तोड़-फोड़ करते हैं, पत्थरबाजी और हैण्ड ग्रेनेड फेंकते हैं। जो पुलिस से प्रदर्शन और सभा को भंग करने की मांग करते हैं, इस दबाव के साथ कि पुलिस ऐसा नहीं की तो वो ऐसा करेंगे।

सभा नहीं होने देंगे।

जेएनयू छात्रसंघ उपाध्यक्ष शेहला राशिद को बोलने नहीं देंगे। बड़ी नालायक हैं शेहला राशिद सच से डराती हैं, संघ और वीसी साहब के गठबंधन पर भारी पड़ जाती हैं।

पुलिस प्रशासन आम जनता की सुरक्षा के लिये, शांति और व्यवस्था को बनाये रखने के लिये हमेशा तत्पर रहती है। वह उन्हें नहीं हटाती जो बवाल मचाते हैं, अपनी बात को कहने से रोकती है, लोगों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करतते हैं, इण्डियन पैनल कोड की धाराओं की धज्जियां उड़ाते हैं। बेचारी विवश है। सरकार समर्थक संगठनों के पीछे सरकार और उसके सिपहसालार हैं, और सरकार के पीछे संघ और वित्तीय ताकतों का समर्थन है।

संघ सभी को चड्डी पहनाने पर तुली हुई है, और वित्तीय ताकतें ‘आर्थिक विकास‘ चाहती हैं। इस आर्थिक विकास में कामगर, किसान और आदिवासियों को उनके श्रम और जमीन से बेदखल कर रही है, और इसी आर्थिक विकास का शिकार अब छात्र हो रहे हैं। सरकार विश्व बैंक जैसी वित्तीय इकाई और विश्व व्यापार संगठन के आदेशों का पालन कर रही है। जिनकी पकड़ में मुख्य धारा की मीडिया भी है। जिस पर सरकारी खबरों को फैलाने और सही खबरों को रोकने की जिम्मेदारी है।

लोगों की सोच को बदलने और कुचलने की गंभीर पहल हो चुकी है। सरकार ने जनविरोधी ताकतों को आपस में जोड़ लिया है। पिछले दो सालों में, इस मामले में सरकार बड़ी सफलता हासिल की है। आर्थिक एवं राजनीतिक एकाधिकार कायम करने की लम्बी छलांगे मारी है। सामान्य रूप से सोच बदलने की नीति के तहत सरकार के भगवाकरण के नीति की चर्चा होती है, लेकिन चर्चा इस बात की भी होनी चाहिये कि उसने अर्थव्यवस्था के निजीकरण, आर्थिक विकास के लिये निजी कम्पनियों एवं निजी काॅरपोरशनों की अनिवार्यता का माहौल बनाने का काम किया है।

सरकार के राजनीतिक एकाधिकार की नीतियों के विरूद्ध राजनीतिक विकल्पों की लोकतांत्रिक बातें तो होती हैं, लेकिन आर्थिक एकाधिकार के विरूद्ध विकल्पों की बातें कम होती हैं, जबकि समाजवादी अर्थव्यवस्था को चर्चा के बीच में लाने की अनिवार्यता है। वास्तव में जेएनयू के ऊपर जरूरत से ज्यादा बड़ी जिम्मेदारियां आ गयी हैं। सरकार अपने किसी भी नीति के विरूद्ध चुनौती के खिलाफ है। वह पूंजीवादी लोकतंत्र के ढ़ांचे को भी तोड़ रही है।

सवाल यह है-

  • हम कहां हैं?
  • लोकतांत्रिक तरीके से विरोध यदि संभव नहीं है, तो तरीका क्या है?

इस सवाल का सीधा सा जवाब यह है, कि ‘‘हमें हर स्तर पर लड़ाईयां लड़नी होगीं।‘‘ यह स्वीकार कर के चलना होगा कि फाॅसिस्ट ताकतें यदि एक बार सत्तारूढ़ हो गयीं तो, उन्हें सता से बे-दखल करना आसान नहीं होता। भारत में, वैश्विक वित्तीय ताकतें भी मोदी सरकार के पक्ष में हैं। लोकतंत्र उसके कब्जे में है, और उसे देश की चुनी हुई सरकार का दर्जा हासिल है। उसके कब्जे में हमारा संवैधानिक अधिकार है। जिसका उपयोग वह देश और समाज के नाम से हमारे खिलाफ कर रही है।

सार्वजनिक क्षेत्रों की तरह वह विश्व विद्यालयों की स्वायत्तता को, बाजारवादी ताकतों के हितों में, खत्म करने पर तुली हुई है। वह इस सोच से संचालित हो रही है, कि ‘‘एक बार बोतल से जिन्न बाहर आ जाये तो, 20 साल के लिये जिन्न की आजादी पक्की हो जायेगी।‘‘ वो जिन्न की आजादी को पक्का करने में लगे हैं। 7 जून को बीएचयू गेट पर जिन्न के कारिंदे खड़े थे, हाथ में तिरंगा, जेहन में उत्पात लिये। उनकी मोर्चा बंदी मालवयी प्रतिमा के पीछे थी। खाखी वर्दी की लकीरें खिंची थीं। लोगों ने यह नजारा खुलेआम देखा।

अच्छी बात यह है, कि मुख्य धारा की मीडिया ‘खबरों का सन्नाटा‘ फैलाने और जो हो रहा है, उससे आंख चुराने से बची।

आज के बारे में उनकी समझ कितनी अच्छी है? हम इस सवाल से बचंेगे। उन्होंने खबरें दी, यह अच्छी बात है। साफ नजरों से उन्होंने देखा होता तो और भी अच्छा होता।

सच यह है, कि जेएनयू के शेहला राशिद, रामा नागा एवं अन्य केंद्रिय विश्वविद्यालय के आये- एफटीआई, स्टूडेंट्स एसोसिएशन, पूणे के पूर्व महासचिव किस्लय, बाबा भीमराम अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, लखनऊ के छात्रनेता श्रेयत बौद्ध, अनुराग अनंत, जेएनयू आंदोलन के दौरान एबीवीपी से इस्तीफा देने वाले प्रदीप नरवाल, जेएनयू के पूर्व उपाध्यक्ष और बीएचयू के पूर्व छात्र अनंत प्रकाश नारायण, पटना विश्वविद्यालय के आकाश कश्यप, कुसुम, आईसा नेता सरिता आदि लोगों को वहां से खदेड़ा नहीं गया, बल्कि पुलिस संरक्षण में दबाव के साथ वहां से हटाया गया और हटते समय अपने शुरूआती दौर में ही वह जुलूस में बदल गयी, जो अस्सी घाट पर जनसभाा में बदली। यदि बीएचयू एबीवीपी के हाथ कुछ लगा तो वह है- गुण्डागर्दी।

कह सकते हैं, कि गये महीने से जारी आंदोलन -24 घण्टे साइबर लायब्रेरी खोलने और आंदोलनरत छात्रों के निष्कासन को वापस लेनेे के पक्ष में आयोजित छात्र युवा सम्मेलन वैसे नहीं हुआ जैसे उसे होना था, लेकिन तमाम विरोध- पत्थरबाजी और बवाल तथा अफरा-तफरी के बीच सम्मेलन अपने मकसद में सफल रहा। लोग आये हुए लोगों को सुनना चाहते थे। बीजेपी, एबीवीपी की पहचान राजनीतिक दल और छात्र संगठन की नहीं बल्कि आरएसएस की बनी- ‘‘वो संघ के गुण्डे हैं‘‘ यही शब्द थे लोगों के। उन लोगों के लिये यह शब्द थे, जिन्होंने आईसा के लाल झण्डे को ‘लाल झण्डी‘ कहा और 24 घण्टे पहले ही इस बात की घोषणा की थी कि ‘‘सम्मेलन हम होने नहीं देंगे।‘‘ ‘‘शेहला राशिद को बोलने नहीं देंगे।‘‘ जिन्हें सुनने के लिये हर वर्ग और हर उम्र के लोग जमा हुए थे, भले ही देखने में उनकी तादाद कम थी। ‘जय भीम‘ और ‘लाल सलाम‘ एक साथ, लोगों के लिये चैंकाने वाला सच था।

‘वंदे मातरम्‘ और ‘भारत माता की जय‘ का असर बनारस के लोगों में भी वह नहीं पड़ा जो है, शायद लोगों की समझ में यह आने लगा है, कि संघ और भाजपा इन नारों का अपहरण कर चुकी है। तिरंगा के राष्ट्रीय ध्वज होने का दर्जा घट गया है।

तमाम अफरा-तफरी के बीच एक खयाल जो जेहन में आया- यदि मालवीय जी की प्रतिमा में जान आ जाये तो वो कहां खड़े होंगे? वहां जहां जुलूस बनते युवा साथियों के बीच मैं खड़ा हूं, या वहां जहां गलत को सच समझने की सोच फैल रही है?

न जाने क्यों मुझे लगता है, तमाम महापुरूषों की सोच में कसमसाहट है। आम लोग भी सहज नहीं हैं।

-आलोकवर्द्धन

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