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मोदी जी नमस्कार! (मेरा देश बदल रहा है)

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‘मेरा देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है।’

यह कुछ-कुछ राजीव गांधी के ‘मेरा देश महान’ की तरह ही है। जिसके साथ यह स्लोगन भी था कि ‘हम 21वीं सदी की ओर बढ़ रहे हैं।’

मतलब, ‘मैं’ के साथ ‘हम’ भी था। जबकि मोदी जी ‘मैं और मेरा’ से पीड़ित हैं।

पहली आपत्ति तो यही है, कि देश मेरा नहीं हमारा होता है।

चलिये मोदी जी आप ‘मैं-मैं’ और ‘मेरा-मेरा’ करते रहिये, देश हमारा है, हमारा ही रहेगा। हमारे बिना न आपका काम चलेगा, ना उन आकाओं का जिनसे प्राकृतिक एवं हमारी श्रम सम्पदा का सौदा हो रहा है। जिन्हें बेचने और बाजार बनने को ‘आगे बढ़ना’ और ‘बदलना’ आप कहते हैं।

अपनी अपनी समझ है।

किसी की समझ पर पत्थर पड़ा रहता है,

तो किसी की सोहबत से पत्थर को भी समझ आ जाती है।

आप अपनी सोच लें, कम से कम हमारी समझ पर तो पत्थर नहीं पड़ा है। हम आपके या आकाओं के बंहकावे में नहीं हैं, क्योंकि हम प्रायोजित नहीं हैं। इस देश पर हमें किसी ने थोपा नहीं है।

वैसे, ‘देश बदल रहा है’, हम यह मानते हैं। दो साल में आपकी उपलब्धियां बड़ी हैं, जिन्हें बताने के लिये आपने 1,000 करोड़ रूपये एक दिन में फूंक दिये। आपने क्या बताया, और देश आगे कैसे बढ़ रहा है? इसकी चर्चा तो हम बाद में करेंगे, ‘देश कैसे बदल रहा है?’ इसकी चर्चा हम पहले कर लें।

कहने का तरीका- ‘थोड़ा लिखा, ज्यादा समझों’ की है।

2014 में केन्द्र की सरकार एक व्यक्ति की सरकार बन गयी। देश के संवैधानिक इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ। संसद का कद घटा, बहुमत दल के नेता को प्रधान मंत्री चुनने के अधिकार का अघोषित अपहरण हो गया। एक व्यक्ति के नाम से एक ऐसी सरकार बनी जिसे काॅरपोरेट ने तय किया। और यह तय-तमाम चुनाव से पहले ही हो गया था। संसदात्मक व्यवस्था में सरकार का स्वरूप बदल गया। मंत्री-सांसद एक नायक के पीछे चलने वाला प्यादा बन गये।

2015 में निजी कम्पनियों और काॅरपोरेट घरानों को खुली छूट दी गयी। देखते ही देखते उनकी तादाद बढ़ गयी। उनका मुनाफा, उनकी औकात बढ़ गयी। मिश्रित अर्थव्यवस्था का टूटता हुआ ढ़ांचा टूट कर बिखर सा गया। वह पनपे नहीं, इसकी तैयारी भी कर ली गयी। सरकार बिचैलिया बनी और राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों के बीच वह दलालों की तरह पसर गयी।

2016 राजनीतिक एकाधिकार और वित्तीय पूंजी की तानाशाही के हवाले है। जो भी सरकार की नीतियों के खिलाफ है, वह देशद्रोही है। सामाजिक असहिष्णुता को बढ़ाने के पक्ष में खड़ी सरकार ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ का प्रवक्ता बन गयी।

इन्हीं दो सालों के दौरान-

श्रम कानूनों में संशोधन के जरिये मजदूरों पर घातक हमले हुए।

भूमि अधिग्रहण विधेयक को पारित कराने की कवायतें हुईं और किसानों-आदिवासियों के हितों को राज्य सरकारों के हवाले कर दिया गया, कि ‘जहां भी खनिज सम्पदा है, और जहां भी निजी कम्पनियों से सरकार के करार हैं, वह जगह खाली हो।’ जमीन से बेदखल करने का अभियान जारी है।

वस्तु एवं सेवा कर विधेयक को पारित कराने का जोड़-तोड़ चल रहा है।

विश्व व्यापार संगठन से हुए समझौतों के तहत विश्वविद्यालयों पर हमले हो रहे हैं। शारीरिक श्रम की तरह सस्ते में मानसिक श्रम को बेचने की तैयारी हो रही है। शिक्षा का निजीकरण हो रहा है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय -जेएनयू- का मुद्दा राष्ट्रीय हो गया है।

ईंधन से लेकर राशन तक और परिवहन से लेकर खनिज तेल तक महंगा हुआ है। विकास दर के आंकड़ों के आगे महंगाई दर चल रही है। वो तमाम विसंगतियां चल रही हैं, जहां जन समस्याओं के समाधान से हाथ खींचती हुई सरकार है। बाजार से सरकार की साझेदारी उसके जन-विरोधी होने का खुला प्रमाण है, हालांकि सरकार का यह दावा है कि उसे जनादेश प्राप्त है।

तमाम वायदे टूटे हुए हैं, मगर सरकार वायदों के पूरा होने का ढ़ोल-नगाड़ा बजा रही है।

मोदी का ‘आगे बढ़ना’ और ‘देश का बदलना’ आम आदमी की ऐसी परेशानी है, जिसे वह नहीं जानती। और सरकार चाहती भी नहीं कि देश की आम जनता जाने।

‘देश बदल रहा है’ का वास्तविक अर्थ भी यही है, कि देश के विधि विधान को, देश की आर्थिक बुनावट को, देश की राजनीतिक संरचना को और देश के आम लोगों को, मुक्त बाजारवादी व्यवस्था के लिये तैयार किया जा रहा है, जहां उनका हित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों का हित है।

‘देश बदल रहा है’ का मतलब उग्र राष्ट्रवाद का चोला, समाज के सबसे बड़े हिन्दु समुदाय को, पहनाया जा रहा है।

मोदी जी यूरोप, अमेरिका और बाजारवादी ताकतों से कहते हैं, ‘हम बदलने के लिये तैयार हैं।’ इस बदलने का मतलब जरूरत से ज्यादा खतरनाक है। जिसे ‘हमने’ देश में पैदा किया है। जो दुनिया भर के खतरे को देश में घुसा रही है। जिन ताकतों ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लोकतांत्रिक सिद्धांतों को दासता, असमानता और नस्लवादी सिद्धांतों में बदल कर पूंजीवादी लोकतंत्र को पंगू बना दिया। जिन्होंने तीसरी दुनिया के देशों की समृद्धि को लूट कर यूरोप और अमेरिकी समृद्धि का आधार बनाया और अब उन्होंने अपनी निजी समृद्धि के लिये यूरोप और अमेरिका को भी दीवालिया बना दिया, उन्हीं निजी कम्पनियों, काॅरपोरेशनों और वित्तीय इकाईयों के लिये देश को बदला जा रहा हैं देश बदल रहा है मोदी जी, इसी बदलाव के आप अग्रदूत हैं।

-आलोकवर्द्धन

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