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एक राजनीतिक कविता

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एक राजनीतिक कविता
झूठ के गंभीर पेशे को समझने की
नाकाम कोशिश है।
आज कल, मैं यही कर रहा हूं।

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देख रहा हूं-
कबाड़ी को
कबाड़ बेचता हुआ।
उसके पास
समय को थाम कर घूमता हुआ
एक पहिया है।
रक्त से भीगे, मांस चपिके पहिये को
चुनावी समर से उभरता हुआ देख रहा हूं।
देख रहा हूं
वायदों के उछलते सिक्कों को।

2014 के आम चुनाव में
वायदों के सिक्के उछाले गये-
‘अच्छे दिन, आने वाले हैं‘
हमने सुना।
‘सबका साथ, सबका विकास‘
हमने सुना।
‘अबकी बार, मोदी सरकार‘
हमने सुना। …..और मान लिया कि ऐसा होगा।
पिछले दो सालों से
देश में मोदी सरकार है।

‘अच्छे दिन‘
अच्छे लोगों में बंट रहे हैं
‘सबका साथ‘
जहां छूटना था, वहीं छूट गया है,
‘अबकी बार‘
मोदी सरकार बनाने की कवायतें
अभी से शुरू हो गयी हैं,
वायदों के सिक्के
अब सरकारी टकसाल से निकल रहे हैं
उछल रहे हैं, सरकार बने लोग
झूठ का परचम उठाये।

कि अब की बार
‘महिलाओं को खुशियां अपार,
अबकी बार
जन-जन का उद्धार,
अबकी बार
युवाओं को अवसर अपार,
अबकी बार
मिटा भ्रष्टाचार,
अबकी बार
विकास ने पकड़ी रफ्तार
अबकी बार
किसान विकास के हिस्सेदार।
अबकी बार- बाजार… बाजार… बाजार।

बाजार में
मोदी की सूरत उठाये
करोड़ों-करोड़ के विज्ञापन घूमने लगे हैं,
सूट-बूट डटाये मीडिया
सवाल पूछ रही है- ‘2019 में
मोदी का मुकाबला किससे होगा?‘
गोया, अखाड़े में
पहलवान तो एक ही है-
उघारे बदन (मैं नंगा नहीं कहुंगा)
केसरिया लंगोट में।
जिसकी उपलब्धियां कारनामों से कम नहीं।

मिशन-2014
एक चेहरे की सरकार,
मिशन 2015
कामगरों-बुद्धिजीवियों पर हमले बार-बार,
मिशन 2016
किसान-आदिवासियों के जमीन पर दखल का करार,
मिशन 2017
राज्य सरकारों पर मोदी का अधिकार
मिशन 2018
राजसत्ता का नहीं बचे दावेदार,
मिशन 2019
अखाड़े में इकलौता पहलवान।

अबकी बार
बस इतना ही कहना है यार
कि ‘फासीवाद अपने पांव पर नहीं,
हमारे कंधों पर चढ़ कर आता है।‘
समय के घूमते पहिये पर
रक्त और मांस के टुकड़े चिपकाता है,
उछालता है-
वायदे के खोटे सिक्के को।
अबकी बार
सिक्के पर गांधी नही
शिकागो स्कूल का मशीनी बाघ है।

यह उसके पंजों का ही कमाल है
कि जमीन, उजड़ती जा रही है
बुनियादें लोकतंत्र की उखड़ती जा रही हैं।
एक दल,
एक नेता,
एक राष्ट्र का झूठ
रक्त और लौह की नीतियां रच रहा है
यह सच है,
कि झूठ की नयी पहचान
मोदी सरकार का मुखौटा है।

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एक राजनीतिक कविता
झूठ के गंभीर पेशे को समझने की
नाकाम कोशिश है।
आज कल, मैं यही कर रहा हूं।

-आलोकवर्द्धन

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