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‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ का मतलब

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‘‘कांग्रेस मुक्त भारत‘‘ का नारा भाजपा खड़ा कर चुकी है। केंद्र की मोदी सरकार की हरकतें भी ऐसी ही हैं। वह अपने राजनीतिक एकाधिकार के लिये कांग्रेस को ठिकाने लगा देना चाहती है। शायद किसी भी राजनीतिक दल और उसकी सरकार के द्वारा, अपने विरोधियों और अपने से असहमत लोगों तथा राजनीतिक दल से छुटकारा पाने की ऐसी घोषणा, हम अपने लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार देख रहे हैं।

ऐसा पहली बार हो रहा है, कि एक राजनीतिक दल और उसकी सरकार चारो ओर सिर्फ अपनी सूरत चिपकाने पर तुली है। जबकि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां कांग्रेस की मनमोहन सरकार के अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का विस्तार है। यहां तक कि जिस ‘अच्छे दिन आनेवाले हैं‘ का मुहावरा नरेंद्र मोदी के नाम से उछल रहा है, वह मनमोहन सिंह की देन है, जिसे नरेंद्र मोदी ने अपने मुख्यमंत्री काल में सुना था, और लपक लिया। और जिसकी जानकारी अपने टीवी इण्टरव्यू में उन्होंने ही दी थी। यह जानकारी उन्होंने 2014 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद दी थी।

जिस कांग्रेस से भाजपा अपना पीछा छुड़ाना चाहती है, वह उसी कांग्रेस की आर्थिक नीतियों और राजनीतिक ढांचे का उपयोग कर रही है, जिसे कांग्रेस ने बनाया है।

देश की आम जनता, देश के राजनीतिक दल और देश की मीडिया ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ का मतलब क्या सोचती और समझती है? यह उनकी समझ पर, राजनीतिक सवाल है, मगर यह सवाल उनकी सोच और उनकी समझ से बड़ा है।

‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ का मतलब सिर्फ एक राजनीतिक दल से मुक्त होना नहीं है, बल्कि यह उदार पूंजीवाद, उसकी राजनीतिक संसदात्मक संरचना और उदार राष्ट्रवाद से भी मुक्त होना है। यह मुक्त होना, लोकतंत्र और संसदात्मक व्यवस्था से मुक्त होना भी है। और यही खतरे की बात है।

निजी तौर पर हम कांग्रेस के पक्ष में कभी नहीं रहे, उस समय भी नहीं जब कांग्रेस ने समाजवाद की बातें की। उस समय भी नहीं जब कांग्रेस के प्रगतिशली होने की बहस देश के वामपंथी राजनीतिक दलों में चल रही थी। हम उस समय भी कांग्रेस के पक्ष में नहीं थे, जब उसे एक राष्ट्रीय आंदोलन प्रमाणित किया जा रहा था। लेकिन आज, जब भाजपा खुले मंच पर ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ के नारे उछाल रही है, हमारे सामने यह सवाल है, कि इसका मतलब क्या है? क्या कांग्रेस का मतलब सिर्फ कांग्रेस है? या यह लोकतंत्र में विरोध के अधिकार और विपक्ष के अंत की नीति है।

यदि आज भाजपा की तरह कांग्रेय इन नीतियों की पक्षधर होती, तो न तो संघ का हिंदू राष्ट्रवाद होता, न भाजपा होती, न ही नरेंद्र मोदी की सरकार होती।

भाजपा की जड़ें उसे वहां ले कर जाती हैं, जहां राजनीतिक एकाधिकारवाद और उग्रराष्ट्रवाद है। वह हमेशा से सहअस्तित्व और उदार राष्ट्रवाद के विरूद्ध रही है। वह संघ की ‘एक राष्ट्र, एक दल, एक नेता‘ की पक्षधर रही है, जो अब एक वर्दी की सरकार चाहती है। भाजपा साम्राज्वादी वित्तीय ताकतों के साथ मिल कर, यही कर रही है। वह सिर्फ कांग्रेस के विरूद्ध नहीं है, वह लोकतंत्र में विपक्ष के विरूद्ध है। वह अपने एकाधिकार की लड़ाई शुरू कर चुकी है। जिसका सीधा सा अर्थ है, कि संघ, भाजपा और केंद्र की मोदी सरकार से ही भारतीय लोकतंत्र को सबसे बड़ा खतरा है।

सरकार आम जनता के मोहभंग से पहले ही अपने राजनीतिक विकल्प के रूप में हर एक दलगत चुनौती को समाप्त करना चाहती है। उसने फासीवाद को लोकतंत्र का चुनावी मुखौटा पहनाने की नीतियां बना ली है। कह सकते हैं, कि भाजपा के घोषित रूप से ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ के जरिये, अपन अघोषित फासीवाद की गोटियां चल दी है।

हम कांग्रेस को उसकी गल्तियों के लिये क्षमा नहीं कर सकते, मगर ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ के नाम पर हम संघ और भाजपा के एकाधिकार को अपनी मंजूरी नहीं दे सकते। आज भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ जो नारा दिया है, कल क्षेत्रीय दलों सहित वामपंथी और कम्युनिस्टों के विरूद्ध भी वह यह नारा उछाल सकती है। यह तय है। वैसे भी प्रगतिशील, जनवादी, वामपंथी एवं कम्युनिस्टों को वह ‘देशद्रोही‘ करार दे चुकी है। जो लोकतंत्र के पक्ष में उसकी राजनीतिक एकाधिकार और वित्तीय तानाशाही के खिलाफ है।

लोकतंत्र के पक्ष में, भारत के तमाम गैर भाजपायी राजनीतिक दलों को संघ और भाजपा के इस षड़यंत्र को समझना चाहिये। इस बात को समझना चाहिये कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और भारत में लोकतंत्र के निर्माण में संघ और उसके राजनीतिक मंच, पहले जनसंघ और अब भाजपा की भूमिका नकारात्मक ही रही है। यह ऐतिहासिक सत्य है।

-आलोकवर्द्धन

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