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अमेरिकी खेमें में घुसने की जल्दबाजी

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मोदी जी को अमेरिकी खेमें में घुसने की बड़ी जल्दी है।

दो साल में चार बार ओबामा से मिलने, हाथ मिलाने, गले लगाने और हम आपके हैं, कि कसमें खाने का रिकार्ड बनाया। वो जानते हैं, कि अमेकिरा से उनकी नजदीकी रूस-चीन और ब्रिक्स देशों से उनकी दूरी बना सकती है, गुटनिर्पेक्ष आंदोलन की भोथरी धार पर जंग लगा सकती है। और वो यही कर रहे हैं। न जाने भारतीय मीडिया को क्यों यह लगता है, कि मोदी जी की विदेश नीति सफल हो रही है? जबकि पड़ोसी देश हमसे दूर हुए हैं, और एशिया-प्रशांत महासागर का खतरा हिंद महासागर में घुस आया है। भारत अब तटस्थ देश नहीं बल्कि आर्थिक गलियारों से होता हुआ, समर भूमि की ओर बढने वाला देश बनता जा रहा है। जिसकी पक्षधरता यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद की ओर बढ़ गयी है।

मोदी जी भारत के लिये ‘अमेरिका का वैश्विक, रणनीतिक एवं रक्षा भागीदार का दर्जा चाहते हैं, जो नाटो सैन्य संगठन के सदस्य देशों को हासिल है। लेकिन मोदी के 45 मिनट में 40 बार तालियां बजाने वाले अमेरिकी सीनेट ने ‘नेशनल डिफेन्स आॅथराइजेशन एक्ट-2017‘ को अपनी मंजूरी नहीं दी। जाॅन मैकेन के प्रस्ताव को उसने खारिज कर दिया।

मोदी जी को सदमा लगा या नहीं?

‘अमेरिका का सामरिक मित्र बनने‘ की सोच रखने वालों को समझ आयी या नहीं?

आंख में पट्टी बांध कर तारीफ करने वाली मीडिया को शर्म आयी या नहीं आयी?

संघ और सरकार की सेहत पर इतराने वालों की सेहत में सुधार हुआ या नहीं?

यह हम उन्हीं पर छोड़ते हैं। उनके लिये यही काफी है, कि अमेरिकी सीनेट में भारत के साथ सैन्य सहयोग को अपनी मंजूरी दे दी है।

वैसे यह कम शर्मनाक नहीं है, कि नरेंद्र मोदी भारत को युद्ध के मैदान की ओर ले कर चल रहे हैं। अमेरिका के पक्ष में एशिया को युद्ध भूमि बनाने के सहयोगी बन गये हैं। अब अमेरिकी सेना को भारतीय धरती का उपयोग करने का अधिकार है। वह आतंकवाद के खिलाफ शांति के लिये भारत के सैनिक हवाई अड्डों का उपयोग कर सकती है। फिर यह कौन नहीं जानता कि अमेरिकी व्हाईट हाउस, सीनेट और वाॅल स्ट्रीट में बैठे लोग आतंकवाद के सफल उत्पादक हैं?

अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने तालिबानियों को पैदा किया। जाॅर्ज डब्ल्यू बुश ने अल्-कायदा को जन्म दिया और बराक ओबामा आईएसआईएस के जन्मदाता हैं। आज दुनिया के 90 प्रतिशत आतंकी संगठन अमेरिका और नाटो देशों के सहयोग से, उन्हीं के प्रशिक्षण और हंथियारों से दुनिया में अफगानिस्तान, इराक, लीबिया और सीरिया बना रहे हैं। वो अमेरिकी हितों के लिये आतंकी हमले करते हैं। अमेरिका के हमलों की राह बनाते चल रहे हैं।

हां, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, संघ प्रमुख जी, उनके रणनीतिकार और आला दिमाग थिंक टैंक यह सब नहीं जानते। उन्होंने एशिया -दक्षिण एशिया और एशिया प्रशांत क्षेत्र- की शांति एवं स्थिरता को ताक पर उठा कर रख दिया है। उन्हें भारत में हो रहे आतंकी हमलों के पीछे पाकिस्तान तो नजर आता है, मगर पाकिस्तान को आतंकवाद का ठिकाना बनाने वाला अमेरिका नजर नहीं आता। उन्हें नजर नहीं आता कि हमने डियागो गार्सिया में अमेरिकी नौसैनिक अड्डे का विरोध किया था, हमने हिंद महासागर में अमेरिकी मौजूदगी को देश के लिये खतरा माना था, हमारे खिलाफ अमेरिका ने सातवां बेड़ा भेजा था, उस समय सोवियत संघ से हमारी दोस्ती ही काम आयी थी। हमारी नीतियां गुट निर्पेक्षता की रही है। भारत ब्रिक्स देश है। रूस और चीन ब्रिक्स देश हैं। तीसरी दुनिया के देशों के लिये आर्थिक एवं सामरिक सुरक्षा की गारण्टी। जबकि अमेरिका जहां भी है, वहां सिर्फ और सिर्फ तबाही है। आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और फासीवाद है। जन विरोधी सरकार और वित्तीय तानाशाही है। लोकतंत्र सैनिक छावनी है।

मगर आप क्या कर सकते हैं? देश को बाजार बनायें। तालियां बजवायें। भारत माता की जय बोलें। हम अमेरिका की जय सुन लेंगे। आपके सपने भारत के लिये दुःस्वप्न हैं, आने वाले कल की समझ पर आप यकीन रखें।

-आलोकवर्द्धन

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