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एफडीआई – ताबूत पर आखिरी कील

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जिस घर की खिड़कियां पहले से खुली थीं,

उस घर का अब, दरवाजा भी खुल गया है,

भारत एक खुला देश है।

जिन्होंने नरेंद्र मोदी की सरकार बनवायी, उन्होंने एक निर्णायक मुकाम हासिल कर लिया है। केंद्र की मोदी सरकार ने 20 जून 2016 को रक्षा, नागरिक, उड्डयन, रिटेल, फार्मा जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश को मंजूरी दे दी है। नरेंद्र मोदी ने अपने ट्वीट में कहा- ‘‘एडडीआई सुधारों के साथ ही भारत विश्व की सबसे खुली अर्थव्यवस्था बन गया है।‘‘ उनकी तस्वीरें ऐसे छपी हैं, जैसे ‘मुक्तिदाता‘ फूले नहीं समा रहे हैं। उन्होंने लिखा है- ‘‘नई नीति से देश में कारोबार करना और आसान होगा।‘‘ …कारोबार को बढ़ावा मिलेगा।

उद्योग जगत तो बे-वजह की खुशियां मना रहा है, हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं- ‘‘सरकार ने देश में रोजगार में बढ़ोत्तरी और नौकरियों को बढ़ाने के लिये एफडीआई कानूनों में व्यापक बदलाव किये हैं।‘‘ मगर बाॅम्बे स्टाॅक एक्सचेंज से लेकर वाॅलस्ट्रीट के चेहरे पर मुस्कान है। खबर है- बाजार झूम रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर रघुराम राजन के विदाई की खबर से जो बाजार गिर गया था, वह बाजार सिर उठा लिया है, और ‘मुक्तिदाता‘ न सिर्फ योग कर रहे हैं, बल्कि लोगों से योग करा भी रहे हैं। दूसरे योग दिवस के अवसर पर यह समझा रहे हैं, कि ‘‘योग को धर्म से जोड़ कर देखना गलत है।‘‘ जिन्होंने धर्म का राजनीतिक कारोबार किया, वो कारोबार के मुनाफा को छुपाने के लिये, वो आंख मूंद कर संदेश दे रहे हैं- ‘‘प्रजा जनों आंख मूंद लो।‘‘

ज्यादातर मीडिया स्वप्निल सपने दिखा रही है। लोगों ने आंख मूंद लिया है। जिनकी नजरें खुली हैं, वो एफडीआई के पक्ष में नहीं, नरेंद्र मोदी सरकार के विरोधी हैं, जाहिर है- ‘देशद्रोही‘ हैं। और देशद्रोहियों के विरोध के लिये इस देश में खबरों का सन्नाटा है। जब सन्नाटा टूटेगा, आंख खुलेगी, देर हो चुकी होगी। भारत ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप‘ का सदस्य देश नहीं, मगर अमेरिकी नेतृत्व में दुनिया की वित्तीय ताकतों ने एक माॅडल बना लिया है, कि साझेदारी में शामिल देशों में सरकारों के बदलने से साझेदारी की शर्तें नहीं बदलेंगी। उस देश की सरकार के पास पार्टनरशिप से अलग होने का अधिकार नहीं है। निजी वित्तीय ताकतों के पास सभी आर्थिक विवादों को सुलझाने का आधिकर होगा।

भारत के श्रम कानूनों में संशोधन हो चुका है।

भूमि-अधिग्रहण के लिये सरकार अघोषित रूप से मिशन-2016 चला रही है। आदिवासी-किसानों से उनकी जमीन छीनी जा रही है। निजी कम्पनियों के लिये उन्हें अपनी जमीन से जबरन बेदखल किया जा रहा है।

वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम को संसद से पारित कराने की राहें निकाल ली गयी हैं।

प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश के द्वार खुल गये हैं। विपक्ष में बैठी जो भाजपा, सड़कों पर कांग्रेस की मनमोहन सरकार के जिस एफडीआई का विरोध कर रही थी; सत्ता तक पहुंचने के लिये उसने वित्तीय ताकतों से उसे ही बढ़चढ़ कर लागू करने, उसे वैधानिक दर्जा दिलाने का समझौता करके सरकार बन चुकी है। उसने भारत को दुनिया की सबसे खुली अर्थव्यवस्था वाला देश बना दिया है। यदि इस बात पर आप यकीन कर लें कि नरेंद्र मोदी वैश्विक वित्तीय ताकतों (निजी वित्तीय पूंजी) की प्रायोजित सरकार है, और उन्हीं के हितों के लिये काम कर रहे हैं, तो नरेंद्र मोदी और मोदी सरकार की नीतियां आपके सामने खुली किताब होगी, सिर खपाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

अब वैश्विक वित्तीय ताकतों को पूंजी निवेश की खुली छूट होगी। बाजार उनके लिये खुला रहेगा।  सरकार उनके लिये काम करेगी और अपने देश के नागरिकों को सस्ते में काम करने के लिये विवश करेगी। राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकाईयों और निजी वित्तीय पूंजी की मजबूत पकड़ को, देश की अर्थव्यवस्था पर, नरेंद्र मोदी ने आसान बना दिया है। देश की अर्थव्यवस्था अब देश की चुनी हुई सरकार और देश की आम जनता की पकड़ से बाहर, इन ताकतों की गिरफ्त में होगी। जिस पर कर्ज का भारी बोझ होगा। ऐसा बोझ जिसका बढ़ना तो तय है, मगर जिसे उतारना असंभव की सीमा तक कठिन है।

जिसे उतारने की क्षमता दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था संयुक्त राज्य अमेरिका में भी नहीं है। यूरोपीय संघ के सदस्य देशों का वित्तीय संकट भी यही है। विश्व का मौजूदा आर्थिक संकट भी यही है।

निजी वित्तीय पूंजी के जिस अमानवीय अर्थव्यवस्था ने सरकारों को जनविरोधी बना दिया है, और वैश्विक संकट को स्थायी, उसी अर्थव्यवस्था से भारत को जोड़ कर नरेंद्र मोदी ने देश और देशवासियों को स्थायी संकट में डाल दिया है। उसकी प्राकृतिक एवं खनिज सम्पदा और मानव श्रम शक्ति का देश और समाज के हितों के विरूद्ध, वैश्विक वित्तीय ताकतों से सौदा किया है। देशभक्तों की यह सरकार, इस देश में पूंजीवाद का सबसे बड़़ा धोखा है। ताबूत पर आखिरी कील है।

-आलोकवर्द्धन

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