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ब्रिटेन का यूरोपीय संघ में होना, न होना?

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1 नवम्बर 1993 में स्थापित, 28 देशों के यूरोपीय संघ से, ब्रिटेन की आम जनता ने अलग होने का निर्णय लिया।

पहले से लड़खड़ाती यूरोप की अर्थव्यवस्था के सामने गंभीर संकट पैदा होगा।

ब्रिटेन और यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था से जुड़ी निजी कम्पनियों को भारी नुक्सान उठाना पड़ा।

विश्व बाजार और उसकी अर्थव्यवस्था गोते लगा रही है।

दुनिया के स्टाॅक मार्केट में भारी गिरावट दर्ज की गयी।

मुद्रा बाजार में ब्रिटिश मुद्रा पाउण्ड में 30 साल की सबसे बड़ी गिरावट नजर आयी, मगर अमेरिकी डाॅलर की कीमतें बढ़ गयीं।

यूरोप में राजनीतिक अस्थिरता के नये दौर की शुरूआत हो गयी। कुछ लोगों को लग रहा है, कि ‘‘यूरोपीय एकता का सपना टूट गया।‘‘ बहस जारी है।

टूटे हुए सपनों को जोड़ने के लिये यह मांग भी उठने लगी है, कि ‘‘जनमत संग्रह फिर से हो।‘‘

छोटा घाटा दिखा कर बड़ा मुनाफा कमाने की विश्व काॅरपोरेट की यह चालबाजी भी हो सकती है, जिसने वैश्विक मंदी के दौर में यूरोप, अमेरिका और विश्व अर्थव्यवस्था पर अपनी निर्णायक पकड़ बना ली है।

इस आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि यूरोपीय संघ को टूटने से बचाने के लिये, खेला गया यह राजनीतिक दांव हो। क्योंकि वैश्विक मंदी के शुरूआत से ही सरकारों के द्वारा की जा रही कटौतियों के खिलाफ जो विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ अब वह यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में ‘ट्रोइका‘ (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष- विश्व बैंक, यूरोपीय सेंण्ट्रल बैंक एवं यूरोपीय संघ) के खिलाफ जन प्रतिरोध आौर जन प्रदर्शनों में बदल गया है। ‘‘वी आर ग्रीक‘‘ के नारों के साथ ही यूरोपीय जन एकजुटता ने, इन वित्तीय ताकतों को सतर्क कर दिया था। ब्रिटेन के आर्थिक एवं राजनीतिक परिदृश्य से जिस बात को निष्कर्ष की तरह सामने लाया जा रहा है, वह यह है, कि ‘‘यूरोपीय संघ से अलग होना किसी भी सदस्य देश के लिये घाटे का सौदा है। जनहित भी सुरक्षित नहीं है।‘‘

यह सच खुली किताब है, कि ग्रीस, स्पेन, इटली, फ्रांस, निदरलैण्ड और पूर्वी यूरोप के देशों सहित यूरोप के पशुपालन (मांस उत्पादक) और कृषि से जुड़ अर्थव्यवस्था वाले देशों में यदि जनमत संग्रह हो तो यूरोपीय संघ से अलग होने का ‘जनादेश‘ ही सामने आयेगा। रूप पर लगाये गये यूरो-अमेरिकी प्रतिबंधों का इन देशों की अर्थव्यवस्था पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ा है।

यूरोप और अमेरिका अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिये, और विश्व काॅरपोरेट अपनी पकड़ की मजबूती के लिये, यह खेल खेल सकता है। ‘जनमत संग्रह‘ के बाद यूरोपीय संघ जिस तरह से ब्रिटेन के जल्द से जल्द अलग करने का जो ऊपरी दबाव बना रहा है, और जिस तरह पुनः जनमत संग्रह कराने की मांग को समर्थन दिया जा रहा है, वह अपने आप में इस बात का प्रमाण है, कि जो नजर नहीं आ रहा है, वह खेल खेला जा रहा है। वैसे भी, अमेरिका नहीं चाहेगा कि यूरोपीय संघ पर उसकी पकड़ ढ़ीली हो और ब्रिटेन उसकी गिरफ्त से बाहर निकल जाये।

अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रस्तावित ‘ट्रांस अटलांटिक ट्रेड एण्ड इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप‘ है। जिसके खिलाफ ज्यादातर यूरोपीय देशों में विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। अमेरिका इस बात को अच्छी तरह जनता है, कि ब्रिटेन यदि यूरोपीय संघ से अलग होता है, तो वह इस पार्टनरशिप से भी अलग हो जायेगा। ब्रिटेन अपनी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये रूस और चीन से सहयोग ले सकता है। विश्लेषक इस बात का अनुमान लगाते भी रहे हैं, कि यूरोपीय संघ के टूटने से रूस और चीन की स्थिति मजबूत होगी। वैसे भी अमेरिकी विरोध के बाद भी चीन के द्वारा स्थापित ‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्मेंट बैंक‘ में ब्रिटेन ने शामिल होने की पहल की, और फिर यूरोप के सभी महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था -जर्मनी, फ्रांस, इटली, जैसे देश- एआईआईबी में शामिल हो गये।

इसलिये, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ‘जनादेश‘ प्राप्त होने के बाद भी ब्रिटिश संसद अपने वैधानिक प्रक्रिया का सहारा ले कर और पुर्न मतदान को अपनी स्वीकृति प्रदान कर, यूरोपीय संघ में बने रहने की राह निकाल ले। वैसे भी, यूरोपीय संघ से अलग होने की वैधानिक प्रक्रिया में दो साल का समय लगता है।

ब्रिटेन दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, और यूरोपीय संघ की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इस निर्णय से ब्रिटेन ही नहीं, यूरोप की अर्थव्यवस्था भी लड़खड़ायेगी। यूरोप के अलावा एशिया और अमेरिकी बाजार में गिरावट देखने को मिली। ‘वाॅलस्ट्रीट जनरल‘ ने चेतावना दी है, कि ‘‘यूरोपीय संघ से ब्रिटेन का बाहर होना, अनिश्चिता का अग्रदूत बन सकता है।‘‘ वाॅल स्ट्रीट जनरल का सोचना है, कि ‘‘इससे राजनीति के उस सिद्धांत को तो बढ़ावा मिलेगा, जिसमें आम जनता की शक्ति एवं अधिकारों के लिये समाज के अभिजात्य वर्ग से संघर्ष है, किंतु यह मुक्त व्यापार के लिये गहरा आघात बन सकता है।‘‘

सीधे तौर पर यह बात कही जा सकती है, कि यूरोपीय संघ जिस मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा अमेरिकी सहयोगी है, उसके बिखरने का खतरा उसके सामने है।

‘‘क्या यह खतरा वास्तव में है?‘‘ यह सवाल है।

हमारा सीधा सा जवाब है- यह खतरा वैश्विक मंदी के दौर में मुनाफा कमाने की तरह ही प्रायोजित है। ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर नहीं हो रहा है। यह यूरोप की आम जनता के हितों को गलब दिशा देने और उनके जन प्रतिरोधों, प्रदर्शनों एवं आंदोलनों को आधारहीन बनाने की चालबाजी है। यह अपने देश में जन समर्थक सरकार की मांग के विरूद्ध जन विरोधी सरकारों को स्थायित्व देने की योजना है।

यूरोपीय संघ से अलग होने के सवाल पर ब्रिटेन की आम जनता विभाजित है। इंग्लैण्ड और वेल्स ने ‘छोड़ने‘ के लिये मतदान किया और स्काॅटलैण्ड तथ उत्तरी आॅयरलैण्ड ने ‘रहने‘ के लिये मतदान किया। छोड़ने के पक्ष में इंग्लैण्ड में 53 प्रतिशत और वेल्स में 52 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि यूरोपीय संघ में बने रहने के पक्ष में स्काॅटलैण्ड में 62 प्रतिशत और उत्तरी आॅयरलैण्ड में 56 प्रतिशत मतदान हुआ। इंग्लैण्ड में सिर्फ लंदन ही है जहां 60 प्रतिशत लोगों ने यूरोपीय संघ की सदस्यता को बनाये रखने के पक्ष में मतदान किया है। इस पूरे मतदान में सबसे उल्लेखनिय अपवाद यह है, कि 24 साल के आयु वाले 75 प्रतिशत लोगों ने ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में रहने के पक्ष में मत डाले।

अब पुर्न जनमत संग्रह कराने का अभियान चल रहा है, जिसमें 30 लाख से अधिक लोगों ने अपना समर्थन दिया है।

जनमत संग्रह का यह खेल, क्या कुछ अजीब सा नहीं लग रहा है?

कंजरवेटिव पार्टी के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा की, यह उनकी तात्कालि प्रतिक्रिया थी, बाद में उन्होंने कहा- ‘‘अक्टूबर में होने वाले पार्टी काॅन्फ्रेन्स तक प्रधानमंत्री बने रहेंगे।‘‘ यूरोपीय संघ से अलग होने की वैधानिक प्रक्रिया -धारा 50- पर कैमरन कोई पहल नहीं करेंगे। अक्टूबर में जब पार्टी अपना नया नेता चुनेगी, तक उन्हीं के द्वारा इस प्रक्रिया की शुरूआत होगी। माना यही जा रहा है, कि यह वैधानिक प्रक्रिया को रोके रखने की सोच-समझी कार्यनीति है।

विवादहीन रूप से इस बीच सारी दुनिया में और विशेष रूप से यूरोप में, राष्ट्रवाद उग्र हुआ है। जिसे उन साम्राज्यवादी ताकतों ने ही बढ़ाया है, जो नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त बाजारवाद की पक्षधर हैं। जिनका मकसद दुनिया की अर्थव्यवस्था को और राजसत्ता को अपने कब्जे में लेना है। जिनका नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ यूरोपीय संघ करता है। वास्तव में वैश्वीकरण के जिस सपने को बोया गया, उसकी फसल युद्ध, आतंक, आर्थिक अनिश्चयता, -संकट- और राजनीतिक अस्थिरता है। दुनिया की आम जनता को अपनी गिरफ्त में ले कर उसे बाजार और उत्पादन का साधन बनाना है। शोषण, दमन और एकाधिकार है। जिसके खिलाफ तीसरी दुनिया की आम जनता रही है, अब यूरोप और अमेरिका की आम जनता भी होती जा रही है।

वैश्विक वित्तीय ताकतें जिस तरह आर्थिक अनिश्चयता का लाभ उठाती हैं, ठीक उसी तरह अपने हितों की पूर्ति के लिये वो सरकारों को जनविरोधी, और आम जनता को उग्रराष्ट्रवादी बना रही हैं। यूरोपीय संघ नवउदारवादी वैश्वीकरण का पक्षधर है, और यूरोपीय संघ से अलग होेने की लड़ाई उग्र राष्ट्रवादी ताकतें लड़ रही हैं।

सोचिये? आम जनता का हित कहां है?

यदि आप यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने का समर्थन करते हैं, तो आप उग्र राष्ट्रवाद (फासीवाद) का समर्थन करते हैं। और यदि आप उसका यूरोपीय संघ में बने रहने का समर्थन करते हैं, तो आप नवउदारवादी बाजारवाद (साम्राज्यवाद) का समर्थन कर रहे हैं। और दोनों ही जन विरोधी हैं, एक ही खेमें की सोच हैं। आम जनता के हितों के लिये कोई जगह नहीं है। जबकि वैश्विक वित्तीय ताकतों का हित हर हाल में सुरक्षित है।

-अनुकृति, आलोकवर्द्धन

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