Home / विश्व परिदृश्य / यूरोपीय संघ – ब्रिटेन….. वैश्विक वित्तीय ताकतों का हित

यूरोपीय संघ – ब्रिटेन….. वैश्विक वित्तीय ताकतों का हित

????????

दुनिया में घट रही किसी भी घटना को अपने नियंत्रण में रखने का हुनर वैश्विक वित्तीय ताकतों ने हासिल कर लिया है। उन्होंने एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था विकसित कर ली है, कि किसी भी देश की सरकार उनके सहयोग एवं समर्थन के बिना टिक नहीं सकती। आज तीसरी दुनिया की अस्थिरत के मूल में इन्हीं ताकतों का हित है। वो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को संकटग्रस्त कर सकती हैं, यूरोपीय देशों पर कर्ज का बोझ लाद सकती हैं, और जब चाहें किस भी देश की सरकार को सत्ता से बेदखल कर सकती हैं। वो अपने से असहमत किसी भी अर्थव्यवस्था, किसी भी सरकार के खिलाफ है।

ऐसे में सवाल यह है, कि जिस यूरोपीय संघ का निर्माण उन्होंने किया, उनकी सहमति के बिना ब्रिटेन कैसे अलग हो सकता है? जिस घाटे का प्रचार किया जा रहा है, वह किस मुनाफे के लिये है?

‘ब्लोमबर्ग बिलेनियर इण्डेक्स‘ ने कहा है, कि यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने की खबर से ‘बिलेनियरों ने अपनी कुल सम्पत्ति का 3.2 प्रतिशत गवां दिया, जो कि अब लगभग 3.9 ट्रिलियन डाॅलर हो गया है।

यूरोप के बिलेनियरों में सबसे बड़ा नुक्सान -6 बिलियन डाॅलर- ए. ओरटेंगा को हुआ, जो कि यूरोप के सबसे धनवानों में हैं। इसके अलावा भी कई बिलेनियरों को भारी नुक्सान उठाना पड़ा है। बिलगेट और अमेजोन के जेफ बेजोस को एक-एक बिलियन डाॅलर का नुक्सान हुआ। ब्रिटेन के सबसे धनी लोगों में शामिल गेराल्ड कैबण्डिस ग्रासवेनर की सम्पत्ति में भी 1 बिलियन डाॅरल की गिरावट आयी। हालांकि यूरोप के धनपतियों के बजाये ब्रिटेन के धनपतियों की सम्पत्ति में कम गिरावट आयी। सबसे धनवान 15 लोगों ने मात्र 5.5 बिलियन डाॅलर ही गवांये।

ब्रिटिश स्टाॅक ब्रोकर कम्पनी हारग्रीव्स लैन्सडाउन के सह-संस्थापक पीटर हारग्रीव्स को सबसे ज्यादा -19 प्रतिशत का नुक्सान हुआ, लेकिन सबसे चैंकाने वाली और उल्लेखनिय बात यह है, कि ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के लिये उन्होंने 3.2 मिलियन पाउण्ड का आर्थिक सहयोग दिया था। हारग्रीव्स को अपने नुक्सान का अफसोस नहीं है, बल्कि उन्होंने ब्रिटेन की सरकार को साथ में मिल कर देश की अर्थव्यवस्था के पुर्ननिर्माण का प्रस्ताव रखा है। उन्होंने कहा- ‘‘मेरे पास व्यापार का काफी अनुभव है। मोल-भाव और आपसी वार्ता का भी अच्छा अनुभव है। देश की अर्थव्यवस्था को मैं समझता हूं। ब्रिटेन का सबसे सफल व्यापारी मैं हूं।‘‘ उन्होंने खुल कर कहा- ‘‘यदि सरकार अपनी अर्थव्यवस्था के निर्माण में मुझे शामिल नहीं करती है, तो वह पागल है।‘‘ और ऐसी सोच रखने वाले वो आखिरी व्यापारी नहीं होंगे।

ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से अलग होना या न होना, यूरोपीयय और ब्रिटिश काॅरपोरेट के बीच के हितों का आपसी टकराव है, या अतिरिक्त सुविधा और मुनाफा कमाने का आपसी समझौता? यह सोचा जा सकता है।

ब्रिटिश वित्तीय बाजार को विस्तार देने के लिये बैंकों का जोर इस बात पर है, कि ‘‘प्रधानमंत्री कैमरन धारा-50 पर अमल करने पर देरी करें। जिसका सीधा सा मतलब है, कि ब्रिटिश बैंक और काॅरपोरेट अनिश्चयता का फायदा उठाना चाहता है। दुनिया की अर्थव्यवस्था पर उनकी पकड़ जग-जाहिर है, और यह भी खुली सच्चाई है, कि विश्व के तमाम सेण्ट्रल बैंक, रिजर्व बैंक और फेडरल रिजर्व आपस में जुड़े हुए हैं। जिस मुद्रा की गारण्टी सरकारें देती हैं, उसे छापने का अधिकार उन बैंकों को है, जो वैश्विक वित्तीय ताकतों के नियंत्रण में हैं, और सरकारें महज साझीदार हैं। मतलब…? अपनी मुद्रा पर भी सरकारों का पूरा नियंत्रण नहीं है।

अमेरिका की तरह यूरोप का आर्थिक संकट भी इन्हीं ताकतों की देन है। कर्ज और कटौतियां ही ट्रोइका की नीति है, जिसके खिलाफ यूरोपीय देशों में लगातार प्रदर्शन होते रहे हैं। इटली, स्पेन और ग्रीस के बाजार में भारी गिरावटें आयी है। ग्रीस के बाजार में 12 प्रतिशत से भी ज्यादा की गिरावट आई। इटली के दो बड़े बैंकों -सेन पावलो और यूनिक्रेडिट- के शेयर में 23 प्रतिशत की गिरावट हुई और इटली के कुछ बैंकों में तो व्यापार शुरू ही नहीं हुआ।

सिटी ग्रूप का शेयर 9.4 प्रतिशत और जे.पी. माॅर्गन सेज के शेयर मेें 6.9 प्रतिशत की गिरावट आयी।

इस जनमत संग्रह का सबसे बुरा प्रभाव उन कम्पनियों पर पड़ा, जिन्होंने यूरोपीय संघ के अन्य सदस्य देशें के साथ अपने व्यापार और वित्तीय कार्य-व्यापार के लिये ब्रिटेन को अपना प्लेटफाॅर्म बनाया। अपने हितों से संचालित निजी कम्पनियां अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिये, इस स्थिति का लाभ उठाने में लग गयी है। माॅर्गन स्टेनले ने कहा है, कि वो अपने 1/6 प्रतिशत ब्रिटिश वर्कफोर्स को किसी अन्य यूरोपीय देश में स्थानांतरित कर सकते हैं। जे.पी. माॅर्गन के सीईओ जेमी डिमन ने कहा कि, वो भी इसी तरह का स्थानांतरण कर सकते हैं।

ब्रिटेन को आधार बना कर काम करने वाले फाईनेंसियल सर्विसेज -‘ई.टी.एक्स. कैपिटल‘ के एक अधिकारी ने ‘राॅयटर‘ से कहा कि अलग होने की जीत ने बाजार को अब तक का सबसे बड़ा ऐसा सदमा दिया है, जिसके लिये दुखद शब्द भी अपर्याप्त है।

फोर्ड ने कहा है, कि परिणाम को देखते हुए ब्रिटेन में वह नौकरियों में कटौतियां करेगा। उसने घोषणा की है, कि वह अपने लाभ को बढ़ाने के लिये जो भी जरूरी कार्यवाही है, वह करेगा। ‘टोयटा‘ और ‘निशान‘ ने भी ऐसी ही कार्यवाहियों के संकेत दिये हैं। बाजार अपने को संभालने की कोशिशें शुरू कर चुका है। जिसका सीधा दबाव ब्रिटेन और यूरोप की आम जनता पर पड़ेगा।

जिन वित्तीय ताकतों -निजी कम्पनियों- के घाटे और बाजार में आयी गिरावट का जिक्र हो रहा है, वह वास्तविक नहीं है। वित्तीय ताकतें अपना मुनाफा न सिर्फ बटोर लेंगी, बल्कि बढ़ा भी लेंगी। वास्तविक घाटा और मार ब्रिटेन और यूरोप की आम जनता पर पड़ना तय है।

-अनुकृति, आलोकवर्द्धन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top