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र्इरान का मुददा दुनिया के 6 बड़े देशों के बीच है

iran-historic-nuclear-deal.siर्इरान का मुददा अमेरिका, यूरोपीय संघ और इस्त्राइल की हदों से बाहर निकल कर दुनिया के 6 बड़े देशों के बीच आ गया है, जिसमें अमेरिका, बि्रटेन, फ्रांस और जर्मनी ही नहीं रूस और चीन भी हैं। और यह बड़ी बात है। 4 दिनों तक चली लम्बी वार्ता के बाद 24 नवम्बर को समझौता हुआ। इस समझौते से सीरिया के मुददे पर रूस और अमेरिका के विदेश मंत्रियों की मास्को वार्ता की याद को ताजा कर दिया, जिसमें अमेरिका को कूटनीतिक पराजय का सामना करना पड़ा और सीरिया पर हमले के लिये पगलाये बराक ओबामा को कोर्इ ऐसा महत्वपूर्ण साथ नहीं मिला, जो हमले में साथ दे और सीरिया के युद्ध को विस्तार पाने से रोक सके। सीरिया का मुददा अभी पूरी तरह हल नहीं हुआ है, मगर ‘रसायनिक हथियारों’ के उपयोग को हमले का आधार नहीं बनाया जा सका, क्योंकि सीरिया की बशर-अल-असद सरकार रसायनिक हथियारों का उपयोग करना नहीं चाहती थी। यही कारण है कि अमेरिकी बयानबाजी और पशिचमी मीडिया के हाय-तौबा को कोर्इ जगह नहीं मिली। र्इरान के परमाणु कार्यक्रम का मसला भी कुछ ऐसा ही है।

र्इरान की सरकार ने इस बात को कभी भी स्वीकार नहीं किया, कि वह परमाणु हथियार बनाना चाहती है। उसने अपने परमाणु कार्यक्रमों को शांतिपूर्ण विकास कार्यों के प्रति प्रतिबद्ध बताया और इस बात के सैकड़ों प्रमाण भी हमारे सामने आये, यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी भी यह प्रमाणित नहीं कर सकी, कि र्इरान परमाणु हथियार बनाने में सक्षम है। मगर अमेरिकी सरकार और पशिचमी देश परमाणु हथियारों के जखीरे पर बैठ कर, परमाणु हथियार के खतरे का डर र्इरान सरकार के मत्थे मढ़ते रहे और आर्थिक प्रतिबंधों की झड़ी लगा दी। उसकी अर्थव्यवस्था को तोड़ने के लिये अपनी पूरी ताकत झोंक दी। इस्त्राइल सैन्य कार्यवाही के लिये दबाव बढ़ाता रहा। सीरिया की तरह र्इरान के परमाणु संयत्रों पर हमले की पेशकश करता रहा।

सीरिया और र्इरान के मुददे भले ही अलग हैं, मगर उनकी जड़ें आपस में जुड़ी हुर्इ हैं। र्इरान रूस और चीन की तरह हमेशा बशर-अल-असद सरकार के पक्ष में रहा है, उसने सीरिया पर हमले की सिथति में अपनी सेना उतारने की घोषणा भी की थी। इराक और लीबिया के पतन के बाद अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय ताकतों ने उनकी वित्त व्यवस्था पर कब्जा कर लिया और उन्हें दुनिया की सेण्ट्रल बैंक से जोड़ने का काम किया। जिसका मकसद दुनिया में एक ही वित्तीय प्रणाली की स्थापना करना है। र्इरान की वित्त व्यवस्था उत्तर कोरिया और क्यूबा की तरह आज भी इन वित्तीय ताकतों और सेण्ट्रल बैंक से अलग है। र्इरान पर हमले की मूल वजह और आर्थिक प्रतिबंधों से उसे तोड़ने की नीति का मकसद यही है। सोवियत संघ और दुनिया में समाजवादी देशों के पतन के बाद क्यूबा जैसे चंद देश ही सेण्ट्रल बैंक की वित्तीय श्रृंखला से बाहर है। जिन्हें तोड़ना ही अमेरिकी नीति है।

सीरिया में राजनीतिक असिथरता पैदा कर, गृहयुद्ध के जरिये उसे लीबिया नहीं बनाया जा सका, ना ही र्इरान को इराक की तरह नेस्तनाबूद करने की अमेरिकी नीतियां अब तक सफल हो सकी हैं। अमेरिकी सरकार, पशिचमी देशाें पर अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय ताकतों का गहरा दबाव है। यह बात किसी से छुपी नहीं है, कि चीन और रूस मुक्त बाजारवादी वित्त व्यवस्था के बीच अमेरिका से अलग मुक्त बाजार के नये क्षेत्रों की रचना कर रहे हैं। और रूस के लिये सीरिया जितना महत्व रखता है, चीन के लिये र्इरान का महत्व भी उतना ही है। वैसे भी चीन र्इरानी तेल का सबसे बड़ा खरीददार है। अमेरिकी पेट्रो डालर के विरूद्ध उसकी योजना में र्इरान के विशाल तेल भण्डार का बड़ा महत्व है। उसने अमेरिकी एवं यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के आर्थिक प्रतिबंधों के दौरान भी र्इरान से अपने तेल की खरीदी को कम नहीं किया, बलिक अपनी एवं र्इरानी मुद्रा में न सिर्फ तेल व्यापार को बढ़ावा दिया, बलिक र्इरान को वित्तीय सुविधा दी, विनिमय के जरिये वित्तीय सहयोग दिया और रूस के साथ मिलकर र्इरान पर हमले की सिथतियों को टालने का काम किया।

र्इरान के मुददे पर रूस और चीन की सम्बद्धता अमेरिकी नीति को मिली गहरी मात है। पशिचमी मीडिया और भारत की मीडिया भी र्इरान से हुए समझौते को मध्य-पूर्व में अमेरिकी नीति की सफलता करार दे रही है। बराक ओबामा को सफलता का ताज पहनाया जा रहा है। ऐसा करना पशिचमी देशों और उनके समर्थक देशों की कितनी बड़ी विवशता है? इसे समझा जा सकता है। इस्त्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे ऐतिहासिक भूल करार दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इस्त्राइल को अपने सही होने का सबक सिखाने में लगे हैं। यह सीख समझदारी के किस मुकाम पर पहुंचेगी, वो खुद नहीं जानते, मगर इतना तय है कि सीरिया पर हमला न कर पाने से नाराज सऊदी अरब से अलग इस्त्राइल की प्रतिक्रिया नहीं होगी। जिसके लिये अरब जगत में बने रहना, अमेरिकी समर्थन के बिना संभव नहीं है।

6 महीने के अस्थायी समझौते के बारे में कहा यह जा रहा है कि ”र्इरान के एटमी हथियार का डर अब खत्म हुआ।” जो कि था ही नहीं। बराक ओबामा ने कहा- ”यह र्इरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने की दिशा में उठाया गया अहम कदम है।” जिसके तहत 1. र्इरान सात अरब डालर के प्रतिबंध रियासत के एवज में संवद्र्धित यूरेनियम के भण्डार को कम करेगा। 2. र्इरान के परमाणु संयत्रों की अंतर्राष्ट्रीय निगरानी पर प्रतिबंध नहीं लगायेगा। 3. र्इरान को प्रतिबंध में आंशिक रियायत मिलेगी और कोर्इ नया प्रतिबंध नहीं लगाया जायेगा। शर्त यह भी है कि- 4. र्इरान 5 प्रतिशत से ज्याद यूरोनियम संवर्धन नहीं करेगा। 5. ज्यादा संवर्धन के लिये बनाये गये तकनीकी ढांचे को नष्ट किया जायेगा। 6. कर्इ इकार्इयां बंद होंगी और नये रिएक्टर नहीं बनाये जायेंगे। 7. रिएक्टरों का वीडियो फुटेज आर्इएर्इए को प्रतिदिन भेजा जायेगा।

इस समझौते की समय अवधि मात्र 6 महीने है। जिसमें कर्इ झोल तो हैं, मगर स्थायी समझौते का आधार कम है। र्इरान हैवीवाटर रिएक्टर और यूरेनियम संवर्धन ढांचे को नष्ट करने की अमेरिकी मांग को अस्वीकार कर चुका है। र्इरान के विदेशमंत्री मोहम्मद जावेद जरीफ ने कहा है कि ”र्इरान के पास अब भी परमाणु संवर्धन का अधिकार है।” र्इरान के राष्ट्रपति हसन रोहानी ने भले ही इस समझौते को नयी राह खोलने वाला करार बताया है, लेकिन यह तय है कि ऐसा तब ही संभव है, जब अमेरिकी सरकार और पशिचमी ताकतें गलत मुददों को तूल न दें। र्इरान अपने परमाणु अधिकार को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगा। 84 वर्षों के तनावपूर्ण संम्बंधों के मूल में र्इरानी अर्थव्यवस्था को वैशिवक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाने की वित्तीय ताकतों की नीतियों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने विभाजन के जिन लकीरों को खींच कर र्इरान के इस्लामी क्रांति को जो दिशा दी है, उसे छोड़े बिना यह संभव नहीं है, कि र्इरान की मौजूदा सरकार अमेरिकी हितों से संचालित होने लगे। चीन और रूस भी ऐसा कभी नहीं चाहेंगे।

चीन के अवकास प्राप्त एडमिरल जांग-जुंग हुग ने 7 दिसम्बर 2011 को कहा था ”चीन र्इरान को सुरक्षित करने के लिये हिचकिचायेगा नहीं, चाहे उसे तीसरे विश्व युद्ध का खतरा ही उठाना पड़े।” चीन के पूर्व प्रधानमंत्री हु जिनताओ ने बिजिंग मिनिस्ट्री आफ डिफेन्स बुलेटिन से कहा था कि ” अमेरिका और पशिचमी देशों के हस्तक्षेप को रोकने का एक ही तरीका है- सैन्य कार्यवाही या उसका खौफ।” इसलिये यदि वाशिंगटन र्इरान के खिलाफ वार्ता एवं समझौते की राह छोड़ कर सैन्य विकल्प की ओर कदम बढ़ाता है, तो उसकी मुशिकलों का बढ़ना तय है। पशिचमी देशों के राजनयिक और मीडिया चाहे इसे ओबामा की जितनी बड़ी सफलता करार दे, या लिखे कि तीन दशक बाद व्हार्इट हाउस को मध्य-पूर्व एशिया में पहली राजनीतिक सफलता मिली है। सच यह है कि वह रूस और चीन के गहरे दबाव में है। ओबामा सकरार चीन के खिलाफ अपनी युद्ध योजना को अंजाम देने के लिये भी अपनी उलझनों को घटाने की नीति पर चल रही हो सकती है। जिसकी सफलताओं की संभावनायें ना के बराबर है। क्योंकि युद्ध और युद्ध के खतरों को दिखा कर चीन को वार्ताओं की मेज पर लाना मौजूदा दौर में संभव नहीं है। वैसे भी अब वार्ताओं की मेज पर अकेले बैठने की वकत वह खो चुका है।

र्इरान के मामले में भारत की नीतियां अमेरिकी दबाव में रही हैं। उसने अपने राष्ट्रीय हितों की अनदेखी कर अमेरिकी हितों को वरियता दी। प्रतिबंधों के दौरान र्इरान से तेल आयात को घटाया गया, रूपये और विनिमय के प्रस्ताव को अस्वीकार किया गया, यही नहीं भारत, र्इरान और पाकिस्तान पार्इप लार्इन बिछाने की योजना को भी न सिर्फ ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया, बलिक एक सीमा तक भारत उससे बाहर हो गया। अब अमेरिकी हितों से संचालित भारत की नीतियां अपने बदलाव का ऊपरी संकेत दे रही हैं, वो र्इरान से अपने सम्बंधों को सुधारने की पहल कर रही है। वह र्इरान के निर्माण कार्य से खुद को जोड़ना चाह रहा है, क्योंकि अमेरिका के लिये चीन एक खतरा बन गया है, जिसकी पकड़ र्इरान पर अच्छी है। अमेरिकी सरकार भारत के जरिये र्इरान पर अपनी पकड़ इसलिये बनाना चाह रही है, कि चीन की घेराबंदी की जा सके। वह भारत जैसे देशों को आश्वस्त कर रहा है, कि अब र्इरान पर लगे प्रतिबंधों में छूट दी जा सकती है, इसलिये आने वाले कल में भारत-र्इरान के रिश्तों में कोर्इ नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।

अमेरिकी सरकार की समझ कमजोर है, कि क्षेत्रीय संतुलन उसकी पकड़ से बाहर है, उसके लिये अपने विवादों को वार्ताओं की मेज तक ले जाने के अलावा और कोर्इ रास्ता नहीं है।

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