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स्मृति जी खुश हैं

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मोदी जी ने अपने मंत्री मंडल में विस्तार किया। फेर बदल किये। क्षमता का आंकलन किया गया और अपनी क्षमता के आगे लोगों को नत्मस्तक कर दिया। चुनाव है तो यह सब करना ही पड़ेगा।

उन्होंने स्मृति जी को लोगों को पढ़ाने और बढ़ाने के काम से हटा कर कपड़ा बनाने के काम में लगा दिया।

वजह जायज है या नाजायज पता नहीं। मगर वजह है। एचसीयू हो या जेएनयू के छात्रों ने स्मृति से पढ़ने और बढ़ने से इंकार कर दिया। बेचारी ‘‘मेरा बच्चा! मेरा बच्चा!‘‘ करती रहीं। संसद में नौटंकी की। वाह वाही लूटी। सत्यमेव जयते का खिताब मिला। सड़क पर भद्द हो गयी।

उन्होंने समझा ही नहीं, देश की राजनीति में अम्मा जया जी हैं। बहन जी मायावती जी हैं, और दीदी, ममता जी हैं। सास-बहू कोई नहीं।

जमाना खराब है, आज कल के बच्चे सीरियल देखते तो हैं, मगर समझते नहीं कि, अम्मा जो भी करती है, बच्चों के भले के लिये करती है।

अब लोगों को पढ़ाने और बढ़ाने का काम जावडेकर जी को सौंप दिया गया। खूब पढ़ाओ, खूब बढ़ाओ!

जावडेकर जी ने स्मृति जी से सियासत की घरेलू मुलाकात के बाद कहा- ‘‘स्मृति ईरानी मेरी छोटी बहन जैसी है।‘‘

उन्होंने स्मृति जी के दो साल के अच्छे कामों(?) को आगे बढ़ाने का आश्वासन भी दिया।

‘‘बच्चों! मां के बाद अब मामा है।‘‘

आप तो जानते ही हैं, कि मामाओं का इतिहास खास अच्छा नहीं रहा है। चर्चा में कंस मामा और शकुनी मामा ही रहे हैं।

कंस मामा कृष्ण को खलास करने के फिराक में रहे। न जाने कितनी पूतना और बकासुर को सोपाड़ियां दी। मगर कृष्ण को तो महाभारत मचाना था।

महाभारत के शकुनी मामा अपने भांजे के साम्राज्य को ही ले डूबे। वो भांजाओं को लड़ाने में पिट गये।

(कृष्ण) कन्हैया कुमार जी कहते हैं- ‘‘स्मृति जी बाॅय-बाॅय।‘‘ जिन्होंने देशद्रोह के खिताब को सुगम बनाया।

अब अम्मा जी क्या करें?

महंगाई बढ़ने से मानेगी नहीं, तो कटौतियां तो होंगी है। लड़ने पर तो जान जाती ही है।

पढ़ो-लिखो बाबू! पिटने का काम काहे करते हो। खाली समय में खेलने के लिये खो-खो, कबड्डी है। राजनीति का खेल काहे खेलते हो। यह तो बड़े-बुजुर्गों का खेल है। घाघ-दिग्गजों का खेल है, उन्हें उनके लिये छोड़ दो।

माना वोट डालने का अधिकार है, तो वोट डालो। बच्चों के लिये राजनीति बुरा खेल है।

मगर हमारे कृष्ण-कन्हैया जी बात नहीं मानते। घूम-घूम कर जुलूस जलसा कर रहे हैं। मोदी जी को कांटों में घसीट रहे हैं। जो पहले से ही कीचड़ सने हैं। कीचड़ में ही न कमल खिलता है। अब मोदी जी खिल गये, तो खिल गये। ‘कनई-कनई‘ भी तो वही न हुए थे। अब वो शिक्षा को, क्षमता को, सम्पदा को बेच रहे हैं, तो बेचने दें। काहे लंगी मारते हैं? अब सरकार तो हटपटा कर गिरेगी नहीं, जिसे गिरना है, वही न गिरेगा। आप काहे टंगरी तोड़वा रहे हैं? सरकार से लड़-भिड़ कर ‘विकलांग‘ बनेंगे तो ‘दिव्यांग‘ का लाभ भी नहीं मिलेगा। लेकिन छात्रों ने लंगी मार दिया। माता जी ‘हपट‘ गयीं।

लोग कह रहे हैं- ‘‘आज फिर एक बेटी के हाथ से किताब छीन कर सिलाई मशीन थमा दी गयी।‘‘

जिसे थामने के बाद उन्होंने मोदी जी को धन्यवाद दिया कि ‘‘पढ़ाई-लिखाई के झंझट से बचा लिया आपने।‘‘ अब वो कांट-छांट के लिये कैंची ढूंढ रही हैं। कटर मशीन का टेंडर भी जल्दी ही निकलेगा।

मैं नहीं जानता, वहां कौन कटेगा? स्मृति जी खुश हैं, मां गयी तो क्या हुआ मा-मा तो है।

-आलोकवर्द्धन

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