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कटघरे में आतंकी नहीं, सरकारें हैं

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कश्मीर जल रहा है, और इस बात की सही खबर हिन्दुस्तान के आम लोगों को नहीं है।

सही खबरें उन तक पहुंच ही नहीं रही हैं।

खबरिया चैनल से लेकर रोज निकलने वाले अखबार न जाने क्या कर रहे हैं?

अंधों के पास कान तो है, मगर इन्होंने देखना ही नहीं, सुनना भी बंद कर दिया है।

सरकार जिसे हिजबुल कमाण्डर आतंकी बुरहान वानी कह रही है। जिसके मुठभेड में मारे जाने की खबर को सबसे बड़ी उपलब्धि बताई जा रही है, उसके जनाजे में शामिल होने के लिये, इण्डिया टूडे की रिपोर्ट है, 1 लाख से अधिक लोग जमा हुए।  जबकि इलाके में कर्फ्यू है। मोबाइल इण्टरनेट सेवायें बंद कर दी गयी है। बसों और रेल गाडियों को रोक दिया गया है।

हिंसक वारदातें हैं।

लोगों के मारे जाने की खबर है।

सेना और सुरक्षा बलों की चैकियों पर हमला है।

लोगों में गुस्सा है।

सवाल है- यह क्यों है? आम कश्मीरी और सरकार की सोच मे, उनके दर्द-तकलीफ में, इतना फर्क क्यों है? आतंकवाद को यह समर्थन क्यों है?

आतंकवाद या किसी भी आतंकवादी के पक्ष में हम खड़ा नहीं हो सकते, चाहे वह किसी संगठन का आतंकवाद हो या राज्य की सरकार का आतंकवाद हो। आतंकवाद हर हाल में समाज और आम लोगों के विरूद्ध है। कश्मीर घाटी में, दोनों ही किस्म का आतंकवाद है। आम जनता की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। आतंकी संगठन समाज पर हमला करते हैं- आम आदमी मारा जाता है, और सरकार (सेना-पुसिल प्रशासन) आतंकवादियों को समाज में ढूंढ़ती है- आम आदमी यंत्रणा सहता है, अपमानित होता है, मारा जाता है। आतंकवादियों के लिये समर्थन का सीधा सा मतलब है, कि घाटी में सरकार से उम्मीदें घटी हैं। जिसे सरकारें छुपाती हैं। कश्मीर की आम जनता का प्रतिरोध वास्तव में सेना और सरकार का विरोध है, आतंकवादियों का समर्थन नहीं।

सही खबरों को आम लोगों तक पहुंचने से रोकना गुनाह है, और यह गुनाह सरकार कर रही है। केंद्र में भाजपा गठबंधन की सरकार है। सरकार नहीं कह सकती कि उसे इस बात की खबर नहीं है। वह नहीं जानती कि ऐसा क्यों है? याकि, उसने खबरों को नहीं रोका। जितनी भी खबरें हैं- उसकी जुबान खींची हुई है।

इस सवाल का जवाब तो हमें मिलना ही चाहिये कि ऐसा क्यों है? यह जन समर्थन क्यों है? चूक कहां हो रही है?

और इस सवाल का जवाब सरकार को ही देना चाहिये।

क्या सरकार से असहमत होना अपराध है?

क्या हंथियार उठाना आतंकवाद है?

‘आफ्सपा‘ के खिलाफ अशांत सीमांत राज्यों में असहमति और गहरी नाराजगी है। सुप्रिम कोर्ट भी इस बात को मानती है, कि सेना और अर्ध सैनिक बलों को अधिक बल प्रयाग करने की इजाजत नहीं है। मणीपुर में 1528 फर्जी एनाउन्टर की सुनवाई के बाद जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने कहा- ‘‘अशांत इलाके में यदि कोई व्यक्ति हथियार रखता है, तो उसे दुश्मन नहीं माना जा सकता। सेना या अर्धसैनिक बल को आरोप या संदेह के आधार पर किसी को दुश्मन मान कर, उसे मारने की इजाजत नहीं दी जा सकती। ऐसा न सिर्फ कानून के शासन के लिये बल्कि लोकतंत्र के लिये भी खतरा है।‘‘ उसने इसे ‘घातक‘ करार दिया है। पीठ ने खुले तैर पर यह कहा है, कि ‘‘किसी व्यक्ति को आतंकी या विद्रोही तभी करार दिया जाना चाहिये, जब उसके खिलाफ सबूत मिले। अशांत क्षेत्रों में यदि कोई हथियार रखता है, तो वह नियम के खिलाफ जरूर है, लेकिन उसे आतंकी या विद्रोही करार नहीं दिया जा सकता।‘‘

जम्मू और कश्मीर देश का ऐसा ही अशांत क्षेत्र है और सेना तथा अर्ध सैनिक बलों की तैनाती का विरोध भी इन्हीं कारणों से है। आज जो कश्मीर की हालत है, उसकी वजह सिर्फ पाकिस्तान नहीं है। सीमा पार के आतंकवाद की समस्या है, मगर उसका मूल कारण असंतुलित विकास, शोषण और दमन है। जिसने कश्मीर को और आम कश्मीरी युवा को भविष्यहीन बना दिया है। जहां सेना और अर्ध सैनिक बलों की मौजूदगी को आतंक में बदल दिया है। आम आदमी इस्लामी आतंकवाद और राज्य के आतंक से पीडित है।

हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि आतंकवाद के खिलाफ आम आदमी की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। जिसमें सरकारें अब तक नाकाम रही हैं। आम आदमी का यकीन टूटा है, यदि ऐसा नहीं होता तो सरकार जिसे आतंकी कहती है, मुठभेड़ में जो मारा जाता है, उसकेे लिये तमाम प्रतिबंधों के बाद भी एक लाख लोगों का जन-जमाव नहीं होता। कश्मीर की समस्या पर बुरहान वानी के अब्बा मुजफ्फर अहमद वानी ने जनवरी में दिये अपने एक इंटरव्यू में कहा यह एक पिता की हैसियत से गंभीर सवाल है- जिसके बेटे को आतंकवादी कहा जाता है, और जिसे घाटी में घटी हर वारदात के बाद हिरासत, पूछताछ और यंत्रणा के दौर से गुजरना पड़ता है। जिन्हें सर्चवारण्ट की स्थितियां झेलनी पड़ती हैं। दिल्लीवाले अपने तरीके से हर बात का मतलब निकालते हैं। उन्होंने कहा- हमारी गैरत को रोज कुचला जाता है। सेना और अर्ध सैनिक बल हमारी गैरत को रोज कुचलती है। कोई हथियार उठता है, आतंकी बनता है, या नहीं? यह इस बात पर निर्भर करता है, कि हम अपनी गैरत को मारने में कितना कामयाब होते हैं, और हालात से समझौता कितना कर पाते हैं। यह जानते हुए कि आतंकवादी की उम्र सात साल से अधिक नहीं होती, एक आम कश्मीरी अपने आने वाले कल की उम्र सात साल से अधिक नहीं देख पाता। बुरहान वानी 16 साल की उम्र में आतंकी बना और 22 साल की उम्र में मारा गया। वजह भी गैरत और दमन ही है। घाटी को भविष्यहीन बनाने वाले हालात ही हैं। कटघरे में आतंकी नहीं, सरकारें ही हैं। वैसे भी दुनिया के 90 प्रतिशत आतंकी संगठनों के सरपरस्त साम्राज्यवादी सरकारें हैं। जिन पर बाजारवादी ताकतों का कब्जा है।

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