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चे और वानी का खेमा

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उमर खालिद पर बहस की जरूरत नहीं

कई बार ऐसा होता है, कि पांव जमा कर चलने वाला आदमी भी फिसलन का शिकार हो जाता है। वैसे भी, फिसलन है। ढ़लान है। सोच के सामने सवाल है। इस देश में जो भी सोचता है, उसके सामने सवाल है।

बुरहान वानी भी एक सवाल है,

और चे ग्वेरा भी एक सवाल हैं,

और उमर खालिद को भी हमें एक सवाल मान लेना चाहिये। गणित के सवाल को हल करने के लिये जैसे किसी अंक को मान लेना पड़ता है, वैसा ही माना हुआ सवाल, ताकि चे और बुरहान के हासिल को हम दो अलग सोच और संघर्ष की शक्ल में देख सकें।

चे बंदूक या बंदूक की नाल से निकली हुई गोली नहीं हैं, यह तो हमें मानना ही होगा। उन्होंने लातिनी अमेरिकी देशों में समाजवादी क्रांति को पहुंचाने की जल्दबाजी की। उन्होंने यह जरूर कहा कि ‘‘मेरे गिरने के बाद यदि कोई मेरी बंदूक उठा ले और गोली चलाना जारी रखे तो मुझे कोई परवाह नहीं।‘‘ मगर चे सिर्फ गुरिल्ला- छापामार नहीं थे। उन्होंने आम जनता पर यकीन किया। और यह बात क्यूबा की समाजवादी क्रांति और उसके बाद भी प्रमाणित हुई कि सोच से बड़ा कोई हथियार नहीं है। 21वीं सदी के समाजवाद की बुनियाद भी यही है। जिसका मकसद राजसत्ता को आम जनता के पक्ष में खड़ा करना है। चे राॅबिनहुड या खुदाई खिदमतगार नहीं। मजबह उनकी सोच में नहीं है।

शोषितों का धर्म और नस्ल कुछ भी हो सकता है। वह सिर्फ मुसलमान नहीं। उमर खालिद भी रोजा और नमाज के पाबंद सिर्फ मुसलमान नहीं। मगर, बुरहान वानी के लिये तो यह नहीं कहा जा सकता। सोच की कमी ही तो वहां है। कश्मीर की आजादी देश की आजादी के मसले से जुड़ी हुई है। बकौल कन्हैया कुमार ‘देश से नहीं, देश में आजादी‘ के मसले से जुड़ी है। आज कश्मीर में जो हो रहा है, वह भारत में कहीं और नहीं हो रहा है, हम यह नहीं कह सकते। कहीं संदर्भ बदला हुआ है, कहीं मुद्दे और हैं, तो कहीं वित्तीय ताकतों के हितों को थोपने का तरीका अलग है, मगर प्रतिक्रियावादी फाॅसिस्ट ताकतें पूरे देश में बढ़ रही है। धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर कट्टरता चारो ओर बढ़ रही है। इसे सुनियोजित तरीके से बढ़ाया जाता रहा है। सरकारें मुद्दों को थकानें की नीतियों पर चल रही हैं। प्रतिरोध, प्रदर्शन और जन असंतोष को थकाने के लिये ही दमन और सख्ती है। आज कश्मीर के मुद्दे को जिस अलगाव से जोड़ा जा रहा है, वह लोकतंत्र का नहीं सैनिक छावनी का तर्क है, जिसे सीमा पार और कश्मीरी आतंकवादी मजबूत कर रहे हैं।

अब सोचिये, चे कहां हैं और बुरहान वानी किस खेमें में हैं। चे ने क्रांतिकारी महाद्वीपीय एकजुटता की लड़ाई लड़ी, जबकि कश्मीर की आजादी को उपमहाद्वीपीय एकजुट आजादी की लड़ाई से जुड़ना है। जो करार नेहरू की संघ सरकार ने कश्मीर से और कश्मीर की आवाम से किया था, उस करार को संघ की मोदी सरकार कभी पूरा नहीं करेगी। वह भी मुद्दे को थकायेगी, टांग कर रखेगी अैर राष्ट्रवादी एकजुटता के नाम पर, जो कर रही है, वहीं करेगी। यह समझिये तो सही कि फासीवाद और आतंकवाद अलग-अलग देश में अलग-अलग सरकार और अलग-अलग आतंकी संगठन का आतंक है, साम्राज्यवादी सिक्के के दो पहलू हैं। और जहां भी साम्राज्यवाद है, वहां वित्तीय ताकतों का हित है, फासीवाद है, आतंकवाद है। राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और दमन है। आम जनता का घायल हित है।

कश्मीर में सात से दस लाख सेना और अर्धसैनिक बलों के होने का सरकारी तर्क भी तो यही है, कि वहां आतंकवाद है। जिसके खिलाफ आम कश्मीरी है। जो आतंकी हमलों में भी मारा जाता है, और सैन्य कार्यवाही में भी। वह तो अपने सहज और सामान्य जिंदगी से भी हाथ धो बैठा है।

परिवेश बड़ा कीजिये, दुश्मन साफ-साफ नजर आने लगेगा। जिन साम्राज्यवादी ताकतों ने देश में काॅरपोरेट सरकार बनाया है, उन्हीं ताकतों ने इस्लामी आतंकवाद को पैदा किया है। और दोनों ही उन्हीं वित्तीय ताकतों के हितों के लिये काम करते हैं। इराक हो या अफगानिस्तान, लीबिया हो या सीरिया का संकट साम्राज्यवादी हितों के लिये ही आतंकी संगठनों ने काम किया है। अलकायदा हो या बोको हरम, या इस्लामिक स्टेट, सभी के पीछे साम्राज्यवादी ताकतें हैं। हिजबुल मुजाहिदीन इनसे अलग तो नहीं। पाकिस्तान को आतंकियों का बसेरा भी अमेरिकी साम्राज्य ने बनाया, दुनिया के ज्यादातर आतंकी संगठन अमेरिका, यूरोपीय देश और उसके सहयोगी खाड़ी के देशों के आर्थिक सहयोग, कूटनीतिक समर्थन और हथियारों की आपूर्ति से चलते हैं, जिनके खिलाफ आतंकवाद विरोधी सैन्य अभियान के नाम पर तीसरी दुनिया के देशों पर सैन्य कार्यवाहियां हो रही हैं। लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों को अस्थिर करने के लिये अर्थिक एवं कूटनीतिक हमले हो रहे हैं। दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी ताकतों के जरिये वैधानिक तख्तापलट की परिस्थितियां बनायी जा रही हैं। जिसका लक्ष्य अमेरिकी सहयोग एवं समर्थन से फाॅसिस्ट (नवउदारवादी) सरकार की स्थापना है। नवउदारवादी अर्थव्यवस्था और फाॅसिस्ट सरकारें राज्य (सरकार) के आतंक का पर्याय हैं। भारत को उभरती हुई अर्थव्यवस्था का दर्जा भी इन्हीं बाजारवादी ताकतों ने दे रखा है। चे और वानी का खेमा एक नहीं। चे ग्वेरा को दुश्मनों की पहचान थी, जबकि बुरहान वानी मोहरे की तरह पिटा।

-आलोकवर्द्धन

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