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अफ्रीका में अमेरिकी लोकतंत्र का धोखा

troops-e1380493975744अफ्रीका महाद्वीप को उपनिवेश बनाने वाली यूरोपीय ताकतों ने काले लोगों को आदमी न समझने की सोच पहले विकसित की। उनका शिकार किया, उन्हें गुलामों की मण्डी दी। उनके श्रम और सम्पदा को लूटने से पहले ही उन्होंने एक ऐसी समाज व्यवस्था विकसित की, जहां एक वर्ग के द्वारा दूसरे वर्ग को और एक देश के द्वारा दूसरे देश को लूटने को सम्मान का दर्जा दिया गया। बदले संदभोर्ं में आज भी यूरोपीय देश और अमेरिकी सरकार यही कर रही है। विकास के नाम पर शोषण और प्राकृतिक सम्पदा का अबाध दोहन कर रही है। उन्होंने एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली विकसित की है, जिसमें बाजारवादी हितों के लिये सरकारें काम करती हैं। राजनीतिक असिथरता और साम्राज्यवादी हस्तक्षेपों का अंत अभी दूर है।

टयूनीसिया से शुरू हुए ‘अरब क्रांति’ का सच हमारे सामने है, कहीं लीबिया है और कहीं मिस्त्र है। जिसे सैनिक तानाशाही के खिलाफ जनतंत्र के लिये संघर्ष करार दिया गया। आज लीबिया में अमेरिकी समर्थक आतंकवादियों का जनतंत्र है, और मिस्त्र में सैन्य परिषद की अंतरिम सरकार है। और तीसरी दुनिया के देशों के लिये यही अमेरिकी जनतंत्र है। जिसका परचम अमेरिकी और नाटो सेना और अमेरिकी एवं पशिचमी देशों की सरकारें लहराते हुए चल रही हैं। जहां पूंजीवादी जनतंत्र की सरकारों का दम पहले से ही उखड़ा हुआ है। उनकी उखड़ी हुर्इ सांसों को कर्ज के कोरामिन से वित्तीय ताकतें चला रही हैं, ताकि मुक्त बाजार के क्षेत्रों का विस्तार होता रहे, और दुनिया भर में लड़ार्इयां चलती रहें।

दो साल पहले अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने लीबिया में लोकतंत्र लाने की लड़ार्इयां नाटो सेना और टीएनसी विद्रोहियों को साथ लेकर लड़ी। लीबिया हवार्इ हमलों से तबाह हुआ और आतंकियों ने कर्नल गददाफी की हत्या की। संयुक्त राष्ट्रसंघ, मानवाधिकारवादी संगठन और दुनिया लीबिया की आम जनता के लम्बे संघर्ष का तमाशा देखती रही। और अफ्रीकी महाद्वीप के विकास की योजनाओं को गोलियां मार दी गयीं। सदियों के दमन और शोषण के खिलाफ गददाफी की महाद्वीपीय सोच की हत्या कर दी गयी। लीबिया में अमेरिकी पद्धति का जनतंत्र स्थापित हुआ। एक ऐसी सरकार बनी जिसकी हुकूमत त्रिपोली पर भी नहीं है, और मिलिसियायी गुटों का संघर्ष जारी है। जो कल तक अमेरिकी सरकार समर्थित टीएनसी का साथ दे रहे थे, आज वो उसी के खिलाफ अपनी चलती चाहते हैं। एक समृद्ध और आम जनता की फिक्र करने वाली गददाफी की सरकार का पतन, आम जनता के पक्ष में खड़ी सरकार के पतन की घिनौनी दास्तां है।

आज लीबिया में ऐसी सरकार है, जिसके आदेशों की पूछ कहीं नहीं है। वह वास्तविक सरकार बन ही नहीं सकी। वह एक ऐसी कठपुतली सरकार है, जिसे कारपोरेट जगत ने अपने हितों को पूरा करने के लिये बनाया और जो हथियारबद्ध मिलिसिया के रहम-ओ-करम पर है। जो आतंक का पर्याय बने मिलिसिया गुटों को न तो हथियार रखने के लिये विवश कर सकी, ना ही वह अपने वायदों को पूरा करने की सिथति में है। वह अमेरिकी सरकार की चापलूसी ठीक उसी तरह करती है, जैसे अमेरिकी सरकार कारपोरेट जगत की चापलूसी करती है, उनके हितों के लिये लड़ती-भिड़ती और दुनिया के लिये खतरा बनी रहती है।

लीबिया की अर्थव्यवस्था का आधार तेल उत्पादन रहा है। आज लीबिया का तेल उत्पादन 110 से भी कम हो गया है। गृहयुद्ध और साम्राज्यवादी हस्तक्षेप से ठीक पहले लीबिया का तेल उत्पादन 1.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन होता था, जोकि आज 1,50,000 बैरल प्रतिदिन रह गया है। उसका तेल निर्यात मात्र 80,000 बैरल प्रतिदिन रह गया है। जिसका घातक प्रभाव न सिर्फ उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, बलिक उसकी अनुपात में काम के अवसर भी घटे हैं और यूरोप में तेल की कमी भी हो गयी है, क्योंकि लीबिया यूरोप का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश था।

दो साल बीतने के बाद भी अमेरिका, यूरोपीय देश और लीबिया की मौजूदा सरकार सिथतियों को सामान्य करने में नाकाम रही है। वो अपने ही साजिशों का अंजाम नहीं दे सकी है। वो उसके प्राकृतिक गैस एवं तेल भण्डार पर अब तक कब्जा नहीं कर सकी है। राजनीतिक असिथरता, मिलिसियायी गुटों के आपसी संघर्षों से बढ़े खतरों की वजह से विदेशी तेल उत्पादक कम्पनियां लीबिया से भाग रही हैं। देश के ज्यादातर तेल उत्पादन प्रतिष्ठानों को हथियारबद्ध मिलिसिया गुटों ने अपने अधिकार में ले लिया है। पूर्वी लीबिया को विद्रोही मिलिसिया गुटों ने अपने अधिकार में ले लिया है। पूर्वी लीबिया के विद्रोही मिलिसिया देश को तीन रिजनल प्रशासनिक क्षेत्रों में बांट देना चाहते हैं। सायरिनेयेका, त्रिपोलितानियो और फिज़ान में, जैसा कि इटली की फासिस्ट सरकार ने लीबिया को बांट कर रखा था।

साम्राज्यवादी साजिशों का शिकार लीबिया भले ही अफ्रीका के मानचित्र पर एकमुस्त नजर आता है, मगर जमीनी रूप में वह कर्इ टुकड़ों मे बंटा है। बेंघाजी -जहां से साम्राज्यवादी साजिशों की शुरूअता हुर्इ- ने अब वहां एक स्वायत्तशासी सरकार की स्थापना कर ली है। उसने त्रिपोली की अनदेखी करते हुए अपने लिये पेट्रोलियम बाजर और सेल्स कम्पनी -लीबिया आयल एण्ड गैस कारपोरेशन के स्थापना की घोषणा की है। लीबिया की गैर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को ‘सेण्ट्रल बैंकों’ की पूंजीवादी वैशिवक संरचना से जोड़ने की कार्यवाही यहीं की गयी थी। लीबिया की वर्तमान सरकार के खिलाफ विद्रोही मिलिसियाओं का आपसी संघर्ष यहीं अपने सर्वोच्च मुकाम पर पहुंचा।

एक अनुमान के अनुसार लीबिया में लगभग 3.5 लाख से ज्यादा हथियारबद्ध ऐसे मिलिसियायी है, जिन्हें लीबिया की सरकार अब वेतन देने के लिये विवश है। जो कटटर इस्लामी और ऐसे लड़ाके हैं, जो किसी भी दण्ड विधान की कार्यवाही के बाहर है, और जो रिज़नल वारलार्डस के निर्देशन में लड़ते हैं। इन पर लीबिया की सरकार का भी नियंत्रण नहीं है। हजारों लीबियायी और उप-सहारा क्षेत्र के ऐसे अफ्रीकी कामगर, जिन्हें कर्नल गददाफी ने आम लीबियावासियों की तरह ही लीबिया में काम करने की सुविधायें दी थी, उन्हें अस्थायी ऐसे जेलों में बंद कर रखा है, जहां ना तो कोर्इ आवश्यक सुविधा है, और ना ही कैदी के रूप में रह रहे लोगों को बोलने या अपने परिवार के लोगों से सम्पर्क करने का अधिकार है। इन अस्थायी कैदखानों पर मिलिसियायी-विद्रोहियों का अधिकार है, जहां कैदियों को यातनायें दी जाती हैं और ये विद्रोही उनकी हत्या तक कर देते हैं।

आज के लीबिया में आम लोगों की सिथति काफी खराब है। लोगों के पास कोर्इ काम नहीं है। 30 प्रतिशत से ज्यादा लोग बेरोजगार हैं। 10 लाख लोग ऐसे हैं, जो पिछली सरकार -कर्नल गददाफी- के समर्थक हैं, और अपने ही देश में विस्थापितों का जीवन जीने के लिये विवश हैं। जिनके जीवन की कोर्इ सुरक्षा नहीं है। अमेरिका और पशिचमी देशों के समर्थन पर टिकी सरकार के पास लीबिया के लिये ऐसी कोर्इ कार्ययोजना नहीं है, जिसे देख कर कहा जा सके कि ”लीबिया का आनेवाला कल कैसा होगा?”

अमेरिका और नाटो सेना द्वारा लीबिया पर थोपे गये युद्ध में 50,000 से ज्यादा लीबियावासी मारे गये, जिसका मकसद कर्नल गददाफी की सरकार का तख्तापलट उसके प्राकृतिक गैस एवं तेल के विशाल भण्डार पर अधिकार करना था। पशिचमी ताकतों के लिये अफ्रीका में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिये भी ऐसा करना जरूर था।

आज के लीबिया को देख कर गददाफी के समृद्ध एवं शानदार लीबिया को सिर्फ गुजरे हुए कल की तस्वीरों में ही देखा जा सकता है। लीबियायी जनतंत्र मिलिसियायी गुटों का ऐसा आतंक है, जिसकी जद से बाहर वहां की सरकार भी नहीं है।

17 नवम्बर को त्रिपोली लगभग थम सी गयी। राजधानी के ज्यादातर व्यावसायिक इकार्इयां, स्कूल और पबिलक सेक्टर के कामगर हड़ताल पर चले गये। उनकी मांग थी- ”मिलिसिया शहर छोड़ दें।”

15 नवम्बर से जारी प्रदर्शनों के विस्तार को देखते हुए 16 नवम्बर को ‘राज्य आपातकाल’ की घोषणा कर दी गयी। दो दिवसीय प्रदर्शन में 45 लोग मारे गये। लोगों का गुस्सा अमेरिकी सरकार समर्थित मिलिसियायी इस्लामी ताकत और नवऔपनिवेशिक सरकार के खिलाफ लगातार बढ़ता जा रहा है। जो अपने निजी हितों के लिये हत्या, बलात्कार, अपहरण और लोगों को हिरासत में लेकर उन्हें यातनायें दे रहे हैं।

15 नवम्बर को मिसराता मिलिसिया ने हजारों प्रदर्शनकारियों -जिसमें महिलायें और बच्चे भी शामिल थे- पर सीधे फायरिंग कर दी। 43 लोगों की घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गयी और 500 से ज्यादा लोग घायल हो गये। प्रदर्शनकारियों ने गारघोर सिथत मिसराता बि्रगेट के मुख्यालय तक प्रदर्शन किया। इस हिंसक घटना के होने के काफी देर बाद लीबिया सरकार की कमजोर सेना घटना स्थल पर पहुंची।

इस घटना पर अपनी पहली प्रतिक्रिया देते हुए लीबिया के प्रधानमंत्री जींदान ने कहा- ”प्रदर्शनकारी हथियारबद्ध थे। उन्होंने हिंसक संघर्ष किये। यही कारण है कि सुरक्षा फोर्स ने सिथतियों को और न उलझने से रोकने के लिये, हस्तक्षेप नहीं किया।” उनके इस बयान से लोगों की नाराजगी बढ़ती चली गयी। बाद में जिसे उन्हाेंने बदल दिया। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि ”प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और प्रदर्शनकारी सफेद झण्डा लिये हुए थे, जिन पर एंटी एयरक्राफ्ट हथियार से हमला किया गया।” सादात-अल-बद्री -सिटी काउनिसल के प्रेसिडेण्ट जिन्होंने प्रदर्शन बुलार्इ थी- ने कहा ”प्रदर्शनकारियों के पास कोर्इ हथियार नहीं था, उन पर मिलिसियायी मुख्यालय से फायरिंग की गयी।”

a-tunisian-vendor-hopes-to-earn-some-money-selling-tea-to-the-migrant-laborersइस वारदात के बाद हथियारबद्ध लोग -शिल्ड आफ लीबिया के लोग- वहां पहुंचे और उन्होंने मिसराता बि्रगेड के मुख्यालय एवं परिसर में आग लगा दी। उन्हें वहां से खदेड़ दिया गया।

16 नवम्बर को त्रिपोली के एक सबअर्ब ताजोरा में स्थानीय मिलिसिया और मिसराता बि्रगेड के बीच संघर्ष की शुरूआत हो गयी। क्योंकि शहर के पूर्वी इलाके से मिसराता बि्रगेड ने शहर में घुसने की कोशिश की उसने एक आर्मी बैरक पर हमला किया। जिसमें एक व्यकित मारा गया और 8 लोग जख्मी हुए। इस वारदात के एक सप्ताह पहले से ही मिलिसियायी गुटों के बीच खूनी खेल खेला जा रहा है। जिसमें 3 लोग मारे गये थे और 20 से अधिक लोग घायल हुए थे। ऐसी घटनायें त्रिपोली में आम हो गयी हैं। जहां कहने को अमेरिका और पशिचमी देश समर्थित लीबिया की सरकार है। अमेरिकी लोकतंत्र की जनविरोधी सरकार है। जो आम लोगों की गिरती हुर्इ लाशों को गिन रही है। दमन और दहशत फैला रही है।

अफ्रीका में अमेरिकी लोकतंत्र की चमकती हुर्इ सूरत जहां भी है, वहां लोकतंत्र के नाम पर या तो लीबिया की तरह आतंकवादियों की सरकार है, अमीरों और शाहों की निरंकुशता है, या मिस्त्र की तरह सैनिक तानाशाही है। जहां अमेरिकी समर्थक होस्नी मुबारक अब जेल से बाहर हैं, और अमेरिकी समर्थक रह चुके मुसिलम ब्रदरहुड़ के अपदस्त राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी पर ट्रायल चल रहा है। मिस्त्र की आम जनता धोखा खा चुकी है। यह धोखा उसे दूसरी बार दिया गया। और ‘अरबक्रांति’ मिस्त्र के तहरीर चौक पर अब सैनिक सरकार के घेरे में है। जहां दमन, दहशत और कत्ल आज भी हो रहे हैं। मोहम्मद मुर्सी भले ही मिस्त्र की आम जनता का नेतृत्व नहीं करते और उनके खिलाफ भी जनप्रदर्शन होते रहे हैं। इसके बाद भी यह तय है कि मौजूदा सैन्य परिषद भी मिस्त्र की वैधानिक सरकार नहीं है।

मोहम्मद मुर्सी ने ट्रायल के दौरान कोर्ट में कहा- ”मैं डाक्टर मोहम्मद मुर्सी मिस्त्र का वैधानिक राष्ट्रपति हूं। और इस अदालत को राष्ट्रपति पर अभियोग चलाने का अधिकार नहीं है।” उन्होंने न्यायालय की आपतित को रोकते हुए कहा- ”यह ट्रायल भी तख्तापलट का हिस्सा है और संवैधानिक रूप से तख्तापलट एक अपराध है।”

प्रजातंत्रवादी ताकतों का इस्लामी ताकतों से पीछे धकेला जा रहा है, कि इस्लामी ताकतों को सैनिक तानाशाही से नियंत्रित करने का खेल अमेरिकी सरकार खेल रही है। ओबामा सरकार की परेशानी यह है कि अब सरकारें भी इस खेल को समझने लगी हैं।

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