Home / सवाल-दर-सवाल / बद्जुबानी और सेंधमारी का मसला

बद्जुबानी और सेंधमारी का मसला

37977-yhxcdyeulk-1469083941

मायावती के खिलाफ भाजपा ने जहर उगल दिया। अच्छा किया। मोहतरमा दलित समाज के लिये राजनीतिक बहन जी थीं, अब बकौल उनके ‘देवी‘ बन गयीं।

बसपा के जिन छत्रपों के खिसकने से मायावती के पांव के नीचे से जमीन खिसक रही थी, वह लौट आयी। भाजपा के निष्कासित नेता और उत्तर प्रदेश के मनोनित उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह ने जमीन वापस ही नहीं किया, चुनावी समर में भाजपा के लिये दलित समाज में बन रही जमीन को, पांव के नीचे से खींच भी लिया। अब भाजपा असहज है। दलितों के घर भजिया पकौड़ी खा कर मतपत्रों की जमीन बनाने की अमित शाह की कोशिशें नाकाम सी हो गयी हैं। मोदी को लग सकता है, कि 2017 में 2019 का टिकट पाने का सपना संकटग्रस्त है। अरूण जेटली हलकान हो रहे हैं, कि जीएसटी अंटक न जाये। उन्होंने माफी मांग लिया, दुख जता लिया, दया महोदय को बाहर का रास्ता दिखा दिया। पुलिस गिरफ्तारी के लिये छापेमारी कर रही है। बसपायी गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं। मुद्दा गरमा गया है। सभी की खिचड़ी दलित मुद्दे के चूल्हे पर पक रही है।

बसपा के नेता और पार्षद नवेद अयाज और जन्नत जहां दयाशंकर सिंह की जुबान काट कर लाने वाले के लिये 50-50 लाख का इनाम घोषित कर रहे हैं। हमारा खयाल है, यह सब भाजपा और संघ का कमाल है, जिसके शिकार जेएनयूू के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार हो चुके हैं। उमर खालिद भी।

‘जान ले लो।‘ ‘जुबान काट दो।‘ जनाब यह सब हो क्या रहा है?

मायावती ने राज्य सभा में बस एक अच्छी बात कही- ‘‘हर सत्र में दलित उत्पीड़न पर चर्चा होती है, लेकिन जमीन पर इसे रोकने के लिये कुछ नहीं होता। पहले गो हत्या के नाम पर मुसलमानों पर हमले हो रहे थे, अब दलितों को निशाना बनाया जा रहा है।‘‘

चंद महीने पहले झारखण्ड के लातेहार में -जहां भाजपा की सरकार है- दो मुसलमानों को इसलिये मार कर पेड़ से टांग दिया गया क्योंकि उन पर आरोप लगाया गया शक के आधार पर, कि वो गायों को बेचने वाले व्यापारी हैं।

हल्ला हुआ। सवाल भी खड़े हुए। मगर जवाब…? नहीं है। कह सकते हैं- ‘‘भीड़ ने ऐसा किया।‘‘ मगर जिस भीड़ को कल तक मतलब नहीं था, वह भीड़ ऐसी क्यों हो गयी? किसने उसे खतरनाक बनाया? किसने उसका उपयोग हथियार की तरह किया?

जवाब तो हैं, यदि आप देना चाहें, सुनना चाहें, जानना चाहें कि बकरे का गोश्त, जांच में गाय का गोश्त कैसे बन जाता है?

आज जिनकी सरकार है, और जिनके समर्थक लोग हैं, वो नहीं थे, तो वारदातें नहीं थीं। मतलब तो निकलता है, यदि आप निकालना चाहें।

भीड़ को उन्मादी बनाया जाता है, मुद्दों को खड़ा करने के लिये और मुद्दों को बरगलाने के लिये।

भाजपा यही करती रही है। रोहित वेमुला के मुद्दे को बरगलाने के लिये ही जेएनयू को ‘देशद्रोहियों का गढ़‘ बताया गया। छात्रों पर ‘देशद्रोह‘ का आरोप मढ़ा गया।

दयाशंकर सिंह उत्तर प्रदेश का चुनावी मुद्दा खड़ा करने के जोश में मायावती के लिये अभद्रता के चरम पर पहुंच गये। भाजपा उन्हें उपाध्यक्ष पद से निरस्त करने और पार्टी से निष्कासित करने और उनकी आलोचना करके अपने को बचाना चाहती है, लगे हाथ अपने दलित नेताओं को काट के रूप में उतार भी रही है, लेकिन यह भाजपा की सोच और उसके नेता-कार्यकर्ताओं की समझ पर सवाल है।

जिस गुजरात को नरेंद्र मोदी भारत के विकास का माॅडल बना रहे हैं। वहीं गाय की खाल के लिये दलितों को बड़ी बेरहमी से पीटा जाता है। गो-रक्षा समिति के लोग जहां हैं, वहां वो यही कर रहे हैं। गाय के लिये लोगों को मार रहे हैं। गो-मांस का व्यापार करने वाली सरकार उन्हें नजर नहीं आती। उनकी हरकतें ऐसी हैं, कि गाय हिंदुओं को अपनी झोली में रखने का मुद्दा है। इस नजरिये से देखें तो गोवध और राम मंदिर के मुद्दे में गहरी समानता है। सवर्णों को खुली छूट, दलितों पर बंदिशें हैं, शोषकों के लिये देश की सरकार, शोषितों के लिये कानून है, व्यवस्था है, सब कुछ मानने का आदेश है।

मायावती के अपमान के साथ हमने दलितों का उल्लेख किया है, मगर मायावती दलितों का पर्याय नहीं हैं। राजनीति में वो दलितों की सूरत बनी हुई हैं, -कुछ वैसे ही, जैसे कभी जगजीवन राम थे, जैसे कभी रामबिलास पासवान थे। उत्तर प्रदेश के चुनावी समर में जिनके मतों का प्रतिशत 20 प्रतिशत से ज्यादा है। भाजपा और बसपा के बीच का मुद्दा भी यही है। बद्जुबानी और सेंधमारी की वजह भी यही है। दलित समाज का मुद्दा सिर्फ राजनीतिक नहीं सामाजिक और आर्थिक है। जेएनयू के लोग ‘जय भीम! लाल सलाम!‘ कहते हैं। वास्तव में यह मुद्दा शोषकों के खिलाफ शोषितों का है। समाज व्यवस्था और सरकार के वर्ग चरित्र का है।

-आलोकवर्द्धन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top