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इस्लामिक स्टेट का आतंक(?) फ्रांस पर आतंकी हमला

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फ्रांस पर आतंकी हमला(?) ठीक उस दिन हुआ, जिस दिन बास्तिल जेल का पतन हुआ था और 1789 में फ्रांस की राजक्रांति हुई थी। जिसके मूल में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की सोच और फ्रांस में लोकतंत्र है।

15 जुलाई को दहशत का जो माहौल पैदा किया गया, वह अलग बात है।

हम अपनी बात इस सवाल से शुरू करेंगे, कि लोकतंत्र पर हमला कौन कर रहा है?

1789 में लुई-सोलहवां के खिलाफ राजक्रांति हुई। फ्रांस की आम जनता पेरिस की सड़कों पर उतर आयी वार्सा राजप्रसाद, को उन्होंने घेर लिया। वो ‘रोटी की मांग‘ कर रहे थे। लुई सोलहवां और उसकी पत्नी मारिया आन्तवायनेते सहित हजारों लोगों को गिलोतिन पर चढ़ा दिया गया। पेरिस की सड़कें लाल हो गयीं। सामंतवाद का खात्मा हुआ और लोकतंत्र की स्थापना हुई। हाब्स, लाॅक और रूसो के सामाजिक समझौते के सिद्धांतों को मान्यता दी गयी। मगर सामंती ताकतें राजसत्ता की लड़ाई लड़ती रहीं, और अंततः जिस सामंतवाद के गर्भ से पूंजीवाद ने जन्म लिया था, वो उसी का हिस्सा बन गयी।

आज कर्ज का संकट झेल रहे यूरोप में फ्रांस की आम जनता स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और रोटी की लड़ाई लड़ रही है। पूंजीवादी लोकतंत्र के खिलाफ जनसमर्थक सरकार के लिये लड़ रही है। लुई (राजा) का शासन नहीं है, किंतु नवउदारवादी बाजार परक अर्थव्यवस्था ने राज्य पर कब्जा जमा लिया है। लोकतंत्र के खिलाफ वैश्विक वित्तीय ताकतें हैं। अमेरिकी साम्राज्यवाद है। फ्रांस की सरकार जिनका हिस्सा है, और आतंकवादी संगठन सहयोगी हैं। जहां भी आतंकी हमला हो, मरता आम आदमी ही है।

फ्रांस पर आतंकी हमला इन्हीं ताकतों की कारस्तानी है। इस सोच का आधार है।

वैश्विक वित्तीय और साम्राज्यवादी ताकतों ने आतंकवाद को एक सोच में बदल दिया है। अपनी जान देने और लोगों को मारने की सोच। यह बताने की सोच कि, जो भी हो रहा है, हम उसके खिलाफ हैं। यह अपने तरीके से अपने जैसे लोगों को मारने की सोच है। जिसे बढ़ाने का काम भी साम्राज्यवादी ताकतें ही करती हैं, उनके पक्ष में खड़ी सरकारें करती हैं। जिसका लाभ वो दो तरीके से उठाती हैं,- साम्राज्य के आतंक को स्थापित करने के लिये तीसरी दुनिया के देशों पर सैन्य कार्यवाही और अपने देश मे सरकार से असहमत हर विरोध का दमन। जो तुर्की में हो रहा है, वही फ्रांस में हो रहा है। आतंकवाद के खिलाफ कार्यवाही के नाम पर लोगों के हाथ पांव बांध कर उन्हें सलाखों के पीछे डाला जा रहा है, या गोलियां मारी जा रही हैं। जिसका लाभ सिर्फ और सिर्फ वैश्विक वित्तीय ताकतें और जनविरोधी सरकारें उठा रही हैं। जिसके विरूद्ध विश्व समुदाय और विश्व की आम जनता है। जिससे साम्राज्यवादी ताकतों को खतरा है।

फ्रांस पर हुए आतंकी हमले के बाद राष्ट्रपति ओलांदे ने जो कहा और जो किया वह महत्वपूर्ण है। उन्होंने फ्रांस के गमजदा होने की बात कही और-

  •  तीन महीने के लिये आपातकाल को बढ़ाने की घोषणां की,
  • सीरिया और इराक पर हमले तेज करने का एलान किया, और
  • फ्रांस की सुरक्षा के लिये सेना से कठोर कार्यवाही करने का आदेश दिया।

मतलब…? फ्रांस में महीनों से जारी सरकार विरोधी प्रदर्शनों को कुचलने का नया आधार मिला।

क्या आपको नहीं लगता कि इस आतंकी हमले ने ओलांदे सरकार को आम जनता के खिलाफ नया हथियार थमा दिया है?

उन लोगों के ख्लिाफ हथियार थमा दिया है, जो-

  • सरकार और फ्रांस की मौजूदा समाज व्यवस्था के विरूद्ध हैं।
  • जो सरकार को आम जनता के पक्ष में खड़ा करना चाहते हैं।
  • जो आर्थिक असमानता और वर्ग विभाजित समाज के खिलाफ हैं।
  • जो लोकतंत्र के नाम पर यूरोपीय संघ और वित्तीय तानाशाही के खिलाफ हैं।
  • जो सरकार की कटौतियों, राजनीतिक अधिकारों का अपहरण और नये श्रम कानूनों के विरोधी हैं।
  • जो, की जा रही निगरानियों, दमन और बढ़ते हुए फासीवाद के विरूद्ध हैं। जिन्हें रोजी, रोटी, सुरक्षा और काम की गारण्टी चाहिये।
  • जो फ्रांस के राष्ट्रीय हितों को सीरिया, इराक और अफ्रीकी देशों पर हमले, आर्थिक प्रतिबंध और आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अमेरिकी सहयोग के विरूद्ध हैं।

सरकार इन सबके खिलाफ आतंकी हमले से, सुरक्षा के नाम पर कार्यवाही का अधिकार हासिल कर लेती है। जिस ‘इस्लामिक स्टेट‘ को इस आतंकी हमले के लिये जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, वह सीरिया, इराक और मध्यपूर्व में इन्हीं साम्राज्यवादी ताकतों के हितों के लिये काम करने वाला आतंकी संगठन है। यदि यह ‘लोनवुल्फ‘ किस्म का आतंकी हमला है, तो इसके लिये जिम्मेदार भी साम्राज्यवादी ताकतें हैं, और वे ही इसका लाभ आम जनता के खिलाफ उठा रही हैं।

-अनुकृति, आलोकवर्द्धन

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