Home / साहित्य / कविता / स्मिता की पांच कविताएँ

स्मिता की पांच कविताएँ

स्मिता1. संवादहीनता की स्थिति में

अब इसका निर्णय
कौन लेगा
कि तुम सही हो
या गलत
इस विभ्रम की स्थिति में
जब तुम ही प्रेक्षक हो
इस कालचक्र के
जहाँ वक़्त जकड़ा हुआ है
तुम्हारे ही तर्कों में
उस एक वक़्त में जब
तुम्हारा ही एक तर्क
तुम्हें सही साबित करता है
और दूसरा गलत
जब तुम स्तब्ध होते हो
होते हो आशंकित
विवर्तों में घिरे
और
इस निर्लिप्त
संवादहीनता की स्थिति में
जब तर्कों की लड़ाई जारी है
एक संयमित स्पष्ट मौन ही
तुमसे अपेक्षित है
क्योंकि इसके आगे भी
हर परिणाम में तुम ही होगे
जीत में भी तुम
हार में भी तुम….

 

2. सोच –सोच 

दरअसल ये सिर्फ तुम्हारी सोच थी
कि ये लड़ाई उनके बीच की है
और तुम हो निर्णायक भूमिका में
देखा तुमने
कैसे खड़े थे वे आमने सामने
अपने अपने परिकल्पित सच को लेकर
तमाम संदर्भित विमर्शो के साथ
ऐसा सच
जिसके तलुवों से लहू रिस रहा था
और जो लगातार बना रहे थे
सदियों तक अमिट रहने वाले
सैकड़ों रक्तरंजित पदचिन्ह
तुम्हारी नज़रों के सामने
टूट टूटकर बिखरता रहा सच
और तुम बस खामोश देखते रह गये

आज जब वक़्त बेचैन है
और बेबस भी
तुम यूँ नेपथ्य में नहीं रह सकते
क्योंकि शुरू से अंत तक
सिर्फ़ तुम ही अभिमंचित रहे हो
इस कथानक में…………

 

3. बचा रहे प्रेम

हाँ मैंने ही छोड़ा था
वो एक सिरा प्रेम का
तुम तो तब भी तटस्थ थे
पकड़े दूसरे सिरे को मज़बूती से
उन दिनों
शायद मैं ही उलझ उलझ कर रह जाती थी
विवर्तों के जाल में
या फ़िर
हमारे बीच की चुप्पी ने ही
साध लिया था कुछ लम्बा मौन
उन दिनों
जब मैं कर रही होती थी आंकलन
हमारे बीच कहे गये कुछ शब्दों का
जब मैं चाहती थी
तुमसे अपने कुछ सवालों के
सीधे सटीक जवाब
ठीक उसी वक़्त
तुम सहेज रहे होते थे
चाय की प्याली के साथ
ढलती हमारी हर एक शाम
बादलों सी बेफिक्र
कतरा कतरा
हमारी हर एक हँसी
उन्हीं पुराने रास्तों पर
रोज़ साथ चले
हमारे हर एक क़दम

उन दिनों
हमारा प्रेम साझा होकर भी
अलग अलग अर्थों में संदर्भित था
पता नहीं क्यों ?
किंतु इन बीते वर्षों में भी
कुछ तो शेष रह गया था
कि आज मैं लौटी हूँ
वापस तुम्हारे पास
लो एक बार फ़िर
मैं पकड़ती हूँ
वही छूटा हुआ सिरा
इस विश्वास के साथ
कि बस यूँ ही बचा रहे प्रेम
हमारे बीच………….

 

4. कुछ नहीं बदलता

उस रोज़ देखा मैंने
तुम्हें खुद को धोते ,
पोंछते ,चमकाते
करीने से सजाते हुए
कितने व्यस्त थे तुम
खुद को बचाने में
जबकि तुम्हें बचाना था
अपने वक़्त की
कई कई नस्लों को
कुछ नहीं बदलता
गर तुम रहने देते
अपनी कमीज़ पर
काले गहराते खून के धब्बे
और सहेजते बाकी बचे
खून को बहने से
लेकिन कलफ लगी
झक्क सफ़ेद कमीज़ पहनना
ज़रूरी लगा तुम्हें
कुछ नहीं बदलता
गर तुम रुकते थोड़ी देर
और सिखाते उन कदमों को
चलने की तमीज
लेकिन जूतों का नाप लेना
ज्यादा ज़रूरी था तुम्हारे लिये

तुम्हें पता है
जब तुम कर रहे थे
अपनी अपनी शक्लों की लीपापोती
ठीक उसी वक़्त
गहरे तक खरोंची जा रही थी
कहीँ इंसानियत
हैवानियत उफान पर था
देखो तो जरा
खून में लिपटे
उन ठंडी पड़ी गोश्त के टुकड़े
तुम्हारे नाखूनों में तो
फँसे नहीं पड़े हैं
जाओ धो डालो इन्हें भी
समय रहते ही
बेहद ताजे व जिंदा सबूत हैं
ये तुम्हारे खिलाफ़
बोल उठेंगे कभी भी

 

5. मौन गीत

उस विहंगम काली रात में
जब सन्नाटे गा रहे थे मौन गीत
कुछ शिल्पी सिर झुकाए बैठे थे
कर रहे थे आंकलन
खोये पाये का
कुछ चिंता ग्रस्त से
ओह ! ये कैसे हो गया ?
सृष्टि की सबसे सुन्दर रचना
इतनी कलुषित,इतनी मलिन
वे कर रहे थे गणना
उस नक्षत्रमंडल का
जिसके दूषित काल में
इनकी परिकल्पना की गयी
कोस रहे थे उस मातृगर्भ को
जिसकी मिट्टी से इन्हें गढ़ा गया
और एक एक कर वे तोड़ने लगे
अपने उन अप्रतिम कृतियों को
कि वे प्रश्नचिह्न बन चुकी हैं अब
इनके अस्तित्व पर
कि उनका ख़त्म होना ही
बचा सकता है अब इनका वजूद
वे बन चुकी है विद्रोही
बदजुबान हो चुकी हैं वो
आ खड़ी होती हैं अक्सर
अपने धारदार तर्कों के साथ
और
दूर कोहरे में लिपटी
वे अनबुझ आकृतियाँ
जिन्हें कभी रचा गया था
पुरुषों के लिये
खड़ी थीं आज निर्लिप्त ,मौन
देख रही थीं कहीं दूर
ज़िंदगी के धुंध के परे
उस चमकीले रास्ते को
जो कर रही थी आलिंगन
क्षितिज पर उग रहे
एक नये सूरज को……..

 -स्मिता सिन्हा 

 

कवि परिचय :

स्वतंत्र पत्रकार एवं कवयित्री, विभिन्न मीडिया हाऊस के साथ 15 से अधिक वर्षों का कर्यानुभव, एम बी ए फैकल्टी के तौर पर यूनिवर्सिटी स्तर पर कार्यानुभव, फिलहाल रचनात्मक लेखन में सक्रिय

प्रस्तुति : नित्यानन्द गायेन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top