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बाढ़ का चेहरा

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इस बीच हमें तबीयत की मार झेलनी पड़ी,

बाढ़ का खतरा उठाना पड़ा।

इरादे न होते तो शायद हम जीने के लायक ही न बचते, मगर ऐसा नहीं हुआ।

अच्छी बात बस इतनी है, कि शहर की सड़कों पर घूमती नदियां, घाटां की सीढ़ियां उतर गयीं।

तबीयत संभल गयी। उसने मान लिया है, कि जिन्दगी की पकड़ अभी ढ़ीली नहीं पड़ी। हम चिम्मड़ हैं।

ब-हरहाल चींटियों की तरह अपने अंड़े उठाये हम अपनी बस्तियों में वापस हो गये हैं। कीचड़-कांदो, गाद और पानी है, और हम भी हैं, सीमित साधन और मजबूत इरादों के साथ, कि किसी के मारने से हमें मरना नहीं है। हम उस मोर्चे पर हैं, जहां लड़ाईयां कभी बंद नहीं होतीं। इस मोर्चे पर अपनों की कमी नहीं पड़ी। मगर, बाढ़ का जो चेहरा नजर आया उसमें समाज ही डूबता-उतराता हुआ मिला। 2013 से स्थितियां बद्त्तर ही बनीं। यदि पानी कमर तक था, तो उसने छातियों को छुआ। जीना पहले से मुहाल हुआ। दुश्विरियां बढ़ी। कहने को सरकारी मदद है, स्वयं सेवी संस्थायें हैं, क्लब हैं, जिन्हें फोटो खिंचवाने और सेल्फी लेने का शौक है। बड़ी बातों और छोटी हरकतों की लत् है। देश और प्रदेश में सकरारें हैं। उनके पास आम जनता का राहत कोष है, इसलिये लूट है। जो वास्तव में काम कर रहे हैं, और जिन्होंने वास्तव में काम किया, उनका जिक्र नहीं है। बाढ़ बांधों की कारस्तानी और प्राकृतिक आपदायें सरकारों की देन है।

हम उन गलत नीतियों के शिकार हैं, जिन्हें सरकरों ने देश और समाज के विकास के नाम पर बनाया। जिसका लाभ आम जनता को तो कभी नहीं मिला, हां, प्राकृतिक आपदाओं के नाम पर नीतियां किसानों और समाज के बहुसंख्यक वर्ग पर कोड़े बरसाती रहीं। उत्तराखण्ड में बादल फटा, मध्यप्रदेश में मूसलाधार बारिश हुई, इस डैम के इतने गेट खोले गये, उस डैम में दरारें पड़ीं, आम जनता और मीडिया के लिये खबरें हैं, जबकि खबर यह है, कि इन्हीं बांधो के पानी ने तबाही मचाया, बस्तियां उजाड़ी, लाखों एकड जमीन की फसलें डूब गयीं।

मुआवजे की राशि है। आप सिर खपायें, चक्कर लगायें,

राहत कार्य, राहत सामग्री है, मिले न मिले आपकी किस्मत है।

बांधों का हासिल आर्थिक विकास के लिये उद्योगपतियों और धनपतियों के लिये औद्योगिक संसाधन है।

तटीय क्षेत्रों में बस्यिं का बसना भी सरकार की गलत नीतियों का परिणाम है। कॉलोनी नाइजरों ने फ्री स्टाइल कॉलोनियां बसा दी, सारी प्रशासनिक औपचारिकतायें ले-दे कर पूरी की गयीं। जो नदी का क्षेत्र था, वह रिहाइसी इलाका बन गया। बाढ़ पीड़ितों आौर आपदाग्रस्त लोगों की तादाद बढ़ गयी। गांवों में पानी भर गया। फसल बर्बाद, किसान तबाह हो गये। हां, बांधों में पानी लबालब है और उनका लाभ जिन्हें मिलता है, वो मालामाल थे, आज भी हैं। घाटा नहीं, मुनाफे की बाढ़ है। घर-व्यापार सुरक्षित। देश का प्रधानमंत्री विज्ञापन है।

आम आदमी ही तकलीफें उठाता है। मरता और अपना सबकुछ खोता है। सम्बंध, सम्पर्क आौर रिश्ते भी। ‘छुच्छा रे, तो के पुच्छा कौन।‘ की स्थिति भी उसी की होती है। उसकी लड़ाई कभी किसी मोर्चे की लड़ाई कम नहीं होती, लेकिन उसे वह दर्जा नहीं मिलता।

मौजूदा दौर में बीमारी और बाढ़ से लड़ते हुए हम जिस मोर्चे पर हैं -जहां लड़ाईयां कभी नहीं बंद होती- वहां हमें अपनों की कमी कभी नहीं पड़ी, मगर चेहरे डूबते और उतराते रहे। घर-मकान पानी में ठहरे उन जहाजों की तरह हो गये, जो पेड़ों की तरह कहीं जा नहीं सकते। जिन्होंने तैरना या चलना कभी सीखा नहीं, और खतरों से घिर गये। समाज तैर, उतरा और डूब रहा है। सभी को अपने घर की फिक्र है।

बाढ़ का चेहरा कुछ लोगों के होने और कुछ लोगों के न होने की तरह है। कहीं वह हमारे गुस्से की तरह है, तो कहीं वह इस पर कहर ढ़ाती उन सरकारों की तरह है, जिनकी फिक्र बाजार है, जो बाजार के लिये हमारा, हमारी सम्पदा का सौदा कर रहे हैं। देश को बाजार बना रहे हैं, युद्ध के मैदान तक पहुंचाने के समझौते कर रहे हैं। हमारे सामने अस्तित्व का संकट है।

बड़ी बात यह है, कि हम हैं, और सही मोर्चे पर हैं, बाढ़ के सही चेहरे की शिनाख्त हो रही है। यह शिनाख्त जरूरी है।

-आलोकवर्द्धन

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