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ओबामा प्रकरण – शिखर वार्ताओं के मुद्दों को गायब रखने की कवायत

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अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश पर जूतों की मेहरबानी रही। फेके तो गये मगर पड़ा नहीं।

बराक ओबामा की वैश्विक विदाई अपने लिये रचे गये विशेष से कमतर व्यवहार और अब गालियों की सौगात से हो रही है।

वैसे, अमेरिकी लोगों ने अपने कई राष्ट्रपतियों को गोलियों से उड़ाया है। इस सच के बीच कोई सम्बंध है या नहीं कि यह गोलीबारी और हत्याये तब बंद हुईं जब व्हाईट हाउस ने वित्तीय पूंजी की तानाशाही को मंजूर किया। अमेरिकी डॉलर से लेकर फेडरल रिजर्व तक पर निजी कम्पनियों का कब्जा हो गया, और अमेरिकी लोकतंत्र दिखावटी लोकतंत्र में बदल गया। इस बात की सही जानकारी अमेरिकी खुफिया विभाग, व्हाईट हाउस और उन ताकतों को ही होगी, जिन्होंने एक विशाल साम्राज्य को अपना पिट्ठू बनाया।

ओबामा ऐसे ही पिट्ठू साम्राज्य के राष्ट्राध्यक्ष हैं। सुरक्षा और विशेष सम्मान के नाम पर जिनके अपने तामझाम हैं। दुनिया के ज्यादातर देश विशेष सुरक्षा और विशेष सम्मान के तामझाम को मान कर अपने देश के समारोह स्थल को अमेरिकी टापू में बदलने की इजाजत दे देते हैं। अनगिनत बेतुकी बातों के बीच वो अपमानित भी होते हैं।

जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान चीन ने ऐसा नहीं किया। न तो उसने अमेरिकी सुरक्षा और अतिरिक्त सम्मान को स्वीकृति दी, ना ही अपनी जमीन पर अमेरिकी टापू बनाने को अपनी मंजूरी दी। उसके ऊपर अतिथि देशों के शेष राष्ट्राध्यक्षों के सम्मान और सुरक्षा की जिम्मेदारी थी। जिसे पूरा भी किया गया। मगर अमेरिकी वायुसेना का विमान हांगझाऊ के एयरपोर्ट पर उतरने वाला था तभी से अमरिकी और चीनी अधिकारियों के बीच विवाद हर स्तर पर बढ़ता गया। ओबामा को विभाग के उस दरवाजे से निकलना पड़ा जिस दरवाजे से वो साम्राज्यावादी-आतंकी हमले झेल रहे देशों में उतरते और निकलते हैं। जहां उनकी गरिमा छोटी या दागदार नहीं होती। ये वे ही देश होते हैं, जहां अमेरिकी सेना, साम्राज्यवादी हमले और अमेरिकी तथा उसके सहयोगी देशों के आतंकी संगठन राजनीतिक अस्थिरता के लिये लगातार आतंकी हमले कर रहे होते हैं।

आम अमेरिकी को यह बात समझना ही होगा कि व्हाईट हाउस, अमेरिकी कांग्रेस और वॉल स्ट्रीट विश्व शांति, सुरक्षा और राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिरता के लिये सबसे बड़ा खतरा है।

चीन के साथ अमेरिका आर्थिक मंदी के शुरूआती दौर से ही अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहा है। हिंद महासागर और दक्षिण चीनी सागर में यह विवाद विस्फोटक होता जा रहा है। इसे ही बढ़ाने की नीति मौजूदा ‘अपमान‘ का प्रचार है। अमेरिकी ‘पिवोट टू एशिया‘ की नीति खुलेआम अमेरिका के द्वारा चीन की आर्थिक एवं सामरिक घेराबंदी है। इसी महीने भारत के साथ सैन्य सहयोग का मतलब इससे अलग नहीं है। यह ‘ब्रिक्स देशों‘ को तोड़ने की नीति भी है। भारत में चुनावी तरीके से सरकार का अपहरण हुआ और ब्राजील में वैधानिक तख्तापलट हुआ। अब दोनों ही ब्रिक्स देशों की सरकारें अमेरिकी कब्जे में हैं।

ओबामा चीन और रूस के संयुक्त आर्थिक, कूटनीतिक एवं सामरिक चुनौतियों को खत्म करना चाहते हैं। लीबिया, सीरिया और यूक्रेन और लातिनी अमेरिकी एवं अफ्रीकी देशें में ओबामा ने जो किया है, और इस्लामि स्टेट के खिलाफ जारी ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध‘ का जो सच है, वह अमेरिकी लोकतंत्र का ऐसा चेहरा है, जिसके सामने डरे हुए लोग ही सिर झुका सकते हैं। डरे हुए देशों ने अमेरिकी सरकार के मिजाज को बिगाड़ दिया है।

जाने से पहले ओबामा बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। ये बातें किसी शैतान के मुंह से देवदूत की तरह हैं। उन लोगों की तरह है, जो ऊंचाईयों पर खड़े हो कर झूठ बोलते हैं। आज दुनिया के ज्यादातर देशों के राजनेता और राष्ट्राध्यक्षों की यही स्थिति है। उन्होंने राजनीति और संवैधानिक पदों को पेशा बना दिया है। उनकी सरकारें बाजार के ऐसे दलालों की हैं, जो आम जनता के हितों की बातें करते हैं। जिन्हें आम जनता अपने रोजमर्रा की बातों में गालियां भी देती है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ऐसे राष्ट्राध्यक्ष हैं, जिन्हें फिलिपिंस के राष्ट्राध्यक्ष रोड्रिगगो दुतार्ते ने इसलिये गालियां दी कि ओबामा लाओस में आयोजित ‘आसियान‘ शिखर सम्मेलन में ‘‘फिलिपिंस में चलाये जा रहे ड्रग माफिया एवं तस्करों के खिलाफ अभियान के दौरान मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा उठायेंगे।‘‘ दुतार्ते ने गाली दे कर कहा- ‘‘ओबामा लाओस में उन्हें मानवाधिकार के मुद्दे पर भाषण न दें।‘‘ ऐसे ड्रग तस्करों से अमेरिकी सीआईए का नाता पुराना है। इसके बाद भी, रोड्रिगो दुतार्ते के द्वारा ओबामा को दी गयी गाली, गलत है। जिसके लिये उन्होंने माफी भी मांगी।

व्हाईट हाउस ने ओबामा से उनकी मुलाकात रद्द कर दी है, फिलिपिंस राजनीति के जिस गलियारे में है, वहां से अमेरिकी राष्ट्रपति को गाली या उनकी अनदेखी या अपमान का मामला स्वाभविक नहीं है। इसलिये एशिया के इस क्षेत्र में किस विवाद को बढ़ाने की यह अमेरिकी नीति है? यह सवाल है। दक्षिण चीनी सागर में बढ़ते हुए तनाव से ये मामले कहीं न कहीं जुड़े हैं।

ओबामा प्रकरण शिखर वार्ताओं के मुद्दे को गायब रखने की अमेरिकी कवायत लगती है, जहां आपसी तनाव अपने चरम पर है। जिसका सीधा सा मतलब है, कि अमेरिका वार्ता की मेज पर आपसी सहमति के बजाये संघर्ष की पृष्टभूमि बना रहा है। यह अमेरिकी जनता को बरगलाने की कोशिश भी है।

खबर है कि लाओस आसियान सम्मेलन में ओबामा ने रोड्रिगो दुतार्ते से मुलाकात की, हाथ मिलाया, बातें की, झेंप मिट गयी। दिल को दरिया बनाया, डुबकियां लगायी और चीन पर हमला बोल दिया कि चीन दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीपों का निर्माण बंद करे, अंतर्राष्ट्रीय नियम और निर्णय बाधाकारी हैं। फिलिपिंस और उसके राष्ट्रपति को जहां होना चाहिये था, वहीं हैं। अवमानना और गाली अपनी जगह है।

-अनुकृति, आलोकवर्द्धन

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