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जेएनयू एक खुली किताब है

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जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय -जेएनयू- एक खुली किताब है, जिसे भाजपा और संघ जैसे फॉसिस्ट ताकतों से ज्यादा देश के वामपंथी उन राजनीतिक दलों को पढ़ना चाहिये जिन्होंने ‘सर्वहारा क्रांति‘ की सोच से किनारा कर लिया है, और ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ की सोच के लिये अब तक वर्गगत राजनीतिक चेतना के लिये निर्णायक काम नहीं किया। उन्होंने पूंजीवादी लोकतंत्र के संसदीय ढांचे में अपने को ढ़ालने की ऐसी कोशिशें की है, कि ‘माया मिले न राम‘ जैसी स्थितियां हैं। जिस समय उन्हें जन समस्याओं के समाधान के लिये आम जनता के बीच होना चाहिये उस समय वो संसद भवन में बैठे या तो जम्हाईयां रोकने की कोशिश कर रहे हैं या विपक्ष के साथ मिल कर देश की कॉरपोरेट सरकार को रोकने के नाम पर सहयोग दे रहे हैं। यह सहयोग देना ही है, कि जब निर्णायक लड़ाई की पहल जरूरी है, तब जुबानी जमा खर्च हो रहा है।

क्या सीमाराम येचुरी और डी. राजा यह बतायेंगे कि केंद्र की मोदी सरकार से मिल कर, उनके पास कश्मीर की मौजूदा समस्याओं का समाधान क्या है?

क्यों श्रम कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव पारित हुआ?

क्यों भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिलाफ उस संघर्ष की शुरूआत नहीं की गयी जिससे मजदूर, किसान और समाज के शोषित वर्ग की एकजुटता तय होती है। उन्होंने देश की आम जनता और किसानों के लिये क्या किया?

अर्थव्यवस्था के उदारीकरण की नीति को मोदी सरकार जब निजीकरण की नीति में बदल रही है, और सार्वजनिक क्षेत्रों का गला घोंटा जा रहा है, आप क्या कर रहे हैं?

बढ़ती हुई महंगाई, बढ़ती हुई बेरोजगारी, बढ़ती हुई भुखमरी और आम लोगों की बद्हाली के खिलाफ खड़े होने के लिये आपको और कितना वक्त लगेगा?

ऐसे सैकड़ों सवाल हैं- बौद्धिक सम्पदा से लेकर श्रम सम्पदा और प्राकृतिक सम्पदा से जुड़े, जिसका जवाब आपके लटके हुए मुंह, सुस्त रफ्तार और रटी-रटाई बातों के अलावा खास कुछ नहीं है।

आपने मीडिया के खरीदी-बिक्री को तो देखा, मगर अपने लिये लोगों तक पहुंचने का जरिया तक नहीं बनाया। आपको नजर नहीं आ रहा है, कि लोगों तक आपकी पहुंच खत्म हो गयी है।

वामपंथी राजनीतिक ध्रुवीकरण की कारगर शुरूआत तक नहीं की आपने क्यों उन वामपंथियों से बात करने का साहस नहीं होता जो गांव-गिरांव, जंगलों, पहाड़ों में लड़ रहे हैं? क्या सिर्फ यह वैचारिक मतभेद है? यदि वो आतंकवादी बनाये गये तो देशद्रोही तो आपको भी बताया जा रहा है।

ऐसा नहीं है, कि मैं आपके लाल कमीज पर सिर्फ काले धब्बे ही गिना रहा हूं, आपको छोटा बना रहा हूं। आपके सुर्ख होने का खयाल हमें है। उन हालातों का अंदाजा भी हमें है, जहां समर्थन और विरोध की नीतियां बनायी गयी, मगर अब गलत नीतियों को बदलना जरूरी है। इस बात को स्वीकार करने की जरूरत है, कि हमने गल्तियां की हैं, मगर अब नहीं। फासिस्ट ताकतें उभर चुकी हैं, वित्तीय पूंजी का हमला हो चुका है।

आजादी और क्रांति के लिये जुबान चलायें, मगर संघर्षों की ईमानदार कोशिश भी होनी चाहिये। आपने महसूस ही नहीं किया कि आपके सामने अस्तित्व का संकट है। आप देश की आम जनता से अलग नहीं हैं, जिन्हें प्राकृतिक सम्पदा की तरह बेचा जा रहा है। निजी कम्पनियां दांत गड़ा चुकी है।

जेएनयू ने इसे महसूस किया। वहां के वामपंथी छात्र संगठनों ने सिर्फ जेएनयू ही नहीं देश भर के विश्वविद्यालयीन छात्रों के लिये संघर्ष किया। उन्होंने जेएनयू छात्रसंघ पर किसी गैर वामपंथी छात्र संगठनों को रोकने या गैर-वामपंथी छात्र संगठनों से समझौते नहीं किये, बल्कि उस पर अपनी दावेदारी पेश की। छात्रसंघ में वे चुन कर गये। उन्होंने जेएनयू में छात्र समर्थक छात्रसंघ का निर्माण किया। मानी हुई बात है, उन्होंने इसे संघर्षों से हासिल किया। मगर इस देश में वामपंथी राजनीतिक दलों ने लोकसभा के सभी सीटों के लिये उम्मीदवार तक खड़ा नहीं किये। देश की आम जनता को अपने विश्वास में नहीं लिया, उसमें वर्गगत राजनीतिक चेतना की समझ पैदा नहीं की। और विधानसभाओं में जहां भी ऐसा हुआ आम जनता उनके साथ खड़ी हुई।

मगर 30 साल से ऊपर पश्चिम बंगाल में सत्ता में रहने के बाद भी वाम मोर्चा की सरकार ढ़ह गयी। उन्होंने प0 बंगाल, केरल और त्रिपुरा को लेकर पूरे देश में अपनी व्यवस्था का जन अभियान नहीं चलाया। यह तक नहीं सोचा कि देश को तीसरे मोर्चे की नहीं, वाम मोर्चा की जरूरत है।

बात सतही है और हम गहरी बातों में जाना भी नहीं चाहते क्योंकि सैद्धांतिक मतभेद के पिटारे में, अब ऐसा कुछ भी नहीं है, कि वर्गशत्रु से एक साथ मिल कर लड़ा न जा सके। ऐसा नहीं है, कि जेएनयू वाम छात्र संगठनों में वैचारिक मतभेद नहीं है, लेकिन उन्होंने वर्गशत्रु की पहचान मिल कर की। लाल सलाम को तरजीह दिया। कॉमरेड के बाद ही अपना नाम लिखा। उन्होंने रोहित वेमुला के मामले को नयी समझ दी। ‘जय भीम, लाल सलाम‘ की कूटनीतिक तहजीब दी। यह समझ भी सामने आयी कि मुद्दे की सूरत वर्गगत आधार पर ही बननी चाहिये। दलित समाज का सबसे कमजोर वर्ग है। मगर कुछ ऐसा भी है कि सिर्फ ‘जय भीम‘ से काम नहीं चलेगा।

राष्ट्रीय स्तर पर यह काम क्यों नहीं हुआ?

क्यों वामदल कार्यालयों में मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन की तस्वीरों के नीचे बैठे रहे? आपने एडमिन ब्लॉक का खुला मंच क्यों नहीं बनाया? खुली बहंस, खुली चुनौती क्यों नहीं दी गयी? मुक्त व्यापार और बाजारवाद के खिलाफ समाजवादी अर्थव्यवस्था के तर्क को क्यों दबा कर रखा गया? यह क्यों नहीं प्रमाणित किया गया, कि मार्क्सवाद सिर्फ चिंतन धारा नहीं समाज व्यवस्था है? सोवियत संघ के पतन का सदमा हम कब तक उठयेंगे? यह जानते हुए कि ‘21वीं सदी का समाजवाद‘ इस हादसे के बाद ही सामने आया।

लातिनी अमेरिकी देशों की जन एकजुटता का आधार समाजवादी सहयोग एवं समर्थन पर टिकी ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ की सोच है। जिस पर हमले हो रहे हैं। वैधानिक तख्तापलट और सरकारों के अपहरण हो रहे हैं। यह भरम टूट रहा है, कि ‘सर्वहारा वर्ग की तानाशाही‘ का कोई विकल्प है। यह स्वीकार करने और कराने की जरूरत है, कि 90 प्रतिशत की तानाशाही 10 प्रतिशत लोगों के लोकतंत्र से बेहतर है। वित्तीय पूंजी की तानाशाही को नवउदारवादी मुक्त बाजार व्यवस्था से जोड़ कर क्यों नहीं विश्लेषित किया जाता? क्यों उसको लोकतंत्र के दायरे में रहने को मंजूरी दी जाती रही?

जेएनयू पर हमले हुए। देश की चुनी हुई सरकार ने हमले किये। छात्रसंघ अध्यक्षक कन्हैया कुमार को मीडिया ट्रॉयल के जरिये देशद्रोही करार दिया गया। हिरासत और यातनायें दी गयीं। जेएनयू ने लम्बी लड़ाई लड़ी। सरकार समर्थक बिकी हुई मीडिया के विरूद्ध ‘स्टैण्ड विथ जेएनयू‘ की वैकल्पिक व्यवस्था की। प्रदर्शनों-अभियानों का दौर चला। देश भर में विशाल जनसमर्थन मिला। समाजसेवी, बुद्धिजीवी, मजदूर, किसान और सामाजिक संगठनों ने साथ दिया। वाम तबीयत के लोगों ने सामाजिक एकजुटता दी। न्यायालयों में देशद्रोह के आरोप की धज्जियां उड़ गयीं। संगठित छात्र आंदोलन खड़ा हुआ। भाकपा, माकपा, माले सभी की एकजुटता नजर आयी। यह एकजुटता जेएनयू के बाहर क्यों नहीं?

जेएनयू के किताब में जो नया अध्याय जुड़ा, उसे आपने क्यों नहीं पढ़ा? समझना चाहिये कि जो जेएनयू में हो सकता है, वह देश में हो सकता है। छात्र अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। छात्रों का अपना वर्ग होता है, मगर वे अपने वर्ग से अलग नहीं होते। कन्हैया कुमार, शेहला राशिद, रामा नागा, अनिर्बान भट्टाचार्य और उमर खालिद का अपना वर्ग, अपनी जमात है, उनकी सोच में फर्क है, मगर जब वो जेएनयू में होते हैं, और वर्गशत्रु से लडाई आमने-सामने की होती है, वो एक होते हैं, उनका वर्ग एक होता है। जेएनयू ही वह जगह है, फिर आप राष्ट्रीय राजनीति में पूंजीवादी लोकतंत्र के ढांचे में उनके तौर-तरीकों में, क्यों अपने को ‘फिट‘ कर रहे हैं?

जनाब, यदि आप कश्मीर में आतंकवादियों  से बात करने की पेशकश कर सकते हैं, तो अपने से असहमत उन वाम संगठनों से बात क्यों नहीं कर सकते, जिन्हें यूपीए सरकार ने आतंकवादी करार दिया और अब मोदी सरकार जल, जंगल और जमीन से उन्हें बेदखल करने के लिये, उन्हीं के नाम से आदिवासियों का दमन कर रही है। क्या कन्हैया कुमार के साथ जेएनयू ने उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य के लिये मिल कर लड़ाईयां नहीं लड़ी हैं? जिनके खिलाफ आतंकवादियों जैसे आरोप रखे गये।

जेएनयू खुली किताब है, उसे पढ़िये कॉमरेड, जहां छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी को शर्मनाक शिकश्त मिली है। जहां ‘लेफ्ट यूनिटी‘ वजूद में आया एबीवीपी को गहरी मात मिली। मोदी सरकार और भाजपा-संघ से बातें भी हम बाद में करेंगे। उनसे बस इतना ही कहना है अभी, कि जेएनयू आपके नकली देशभक्ति और जनविरोधी नीतियों का जवाब है। लड़ाईयां चाहे जितनी लम्बी हों, लड़ी तो जायेंगी ही। देश को चरागाह और हमारी मवेशियों की तरह खरीदी-बिक्री निरापद तो नहीं होगी। जिन ताकतों ने चुनाव के जरिये देश की राजसत्ता का अपहरण किया है, वो मजबूत हैं, मगर पतनशील भी।

-आलोकवर्द्धन

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One comment

  1. बेहतरीन जानकारी

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