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बुरे दिनों की पहचान

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अच्छे दिनों की पहचान तो हो नहीं सकी, बुरे दिनों की पहचान हमें कर लेनी चाहिये।

क्या कहते हैं, आप?

कहने को शायद कुछ भी नहीं है, लेकिन क्या कीजियेगा, हम जिसे जानते और पहचानते हैं, कई बार उसकी पहचान हमें फिर से करनी पड़ती है। यदि आप अदालत में हैं, तो शपथ उठा कर अपनी पहचान करनी पड़ती है। यदि आप समाज में हैं, तो आपका अपना वर्ग, अपनी जमात होगी। देश और दुनिया में रहने के लिये सरकारों से इजाजत लेनी पड़ती है। और यदि सरकारें आपके खिलाफ हैं, तो बताना मुश्किल है, कि आपको क्या करना चाहिये- आपको अपनी सूरत से अपनी पहचान बनानी चाहिये, या वर्ग और जमात से? आपको सरकारों को अपने लायक बनाना चाहिये या अपने को सरकारों के लायक बनाना चाहिये?

वैसे, आपको मालूम है न, कि सरकारें आम लोगों के लायक नहीं बनतीं, अपने लायक लोगों को बनाती हैं। दिन अच्छे हों या बुरे कोई फर्क नहीं पड़ता। अच्छे दिनों का शगूफा फूलता हुआ गुब्बारा है। सुनते हैं, वह सरकार और भाजपा के गले की हड्डी बन गयी है। जिसे उसने अपने गले में खुद ही फंसाया है। पार्टी को सरकार बनाने के लिये यह सब करना पड़ता है। भाजपा ने किया, मोदी जी ने किया। बेहाल लोगों से कहा- ‘‘अच्छे दिन आने वाले हैं।‘‘ चुनावी नारे मुसाफिरों की तरह आते-जाते हैं, मगर इस नारे को भाजपा ने लोगों के दिल में उतार दिया, मोदी जी ने मुसाफिरखाने में बैठा दिया, जहां उसने डेरा जमा लिया और मोदी जी की सूरत का मुखौटा पहन लिया।

आदमी अपनी सूरत से जाना जाता है, इसलिये अपनी सूरत दूसरों के चेहरे पर देखना भी अच्छा लगता है। मोदी जी को लगा जिसने मुसाफिरखाने में डेरा डाल रखा है, उसे सरकारी आवास एलॉट कर देना चाहिये।

यह काम अगले दरवाजे से भी हुआ, पिछले दरवाजे से भी हुआ, सरकारी तरीके से भी हुआ, गैर-सरकारी तरीके से हुआ, झूठ-झकार से हुआ, मीडिया के माईक से हुआ, सेल्फी से हुआ और अपने को पीएम कहने वाले मोदी की उस सूरत से हुआ जो मुखौटों के परतों से बना है। जिसे निजी कम्पनियों ने अपने लिये बनाया है।

मोदी जी के दिन अच्छे हुए।

भाजपा के दिन अच्छे हुए।

संघ के दिन अच्छे हुए।

और जिन वित्तीय ताकतों ने उन्हें सरकार बनाया उनके दिन अच्छे हुए।

और जब इतनों के दिन अच्छे हुए तो अच्छे दिनों का आना ही तय नहीं हुआ, वह आ गया।

शाह जी कहते-झुठलाते रहे कि यह चुनावी नारा था, मोदी जी ने घोषणां कर दी ‘अच्छे दिन आ गये।‘

बढ़ी हुई कीमतों में, किसानों की बद्हाली में, मजदूरों के अधिकारहीनता में, छात्रों की नाराजगी में, आदिवासियों के विस्थापन में, बड़ी सामाजिक असहिष्णुता में, संघ, सरकार, भाजपा की देशभक्ति में, राजनीतिक एकाधिकार, कश्मीरियों के दमन में, न जाने कहां-कहां लोग ‘अच्छे दिन‘ को ढूंढ़ने लगे। सरकार के सच-झूठ, गली-मुहल्ले के कचरे में। भोगवादी योग और झाडू उठाये सेलिब्रिटियों में। मोदी जी के अंधाधुंध विदेश यात्राओं में। कुछ लोगों को वह भूमि अधिग्रहण विधेयक की चालबाजी में मिला, कुछ लोगों को श्रम कानूनों में हुए संशोधनों में मिला, ‘सर्व क्षेत्रों में सर्वनाश‘ और निवेशकों के लिये जीएसटी विधेयक के पारित प्रस्ताव में मिला।

गड़करी साहब को यह कहना पड़ा- ‘‘अच्छे दिन कभी नहीं आते‘‘….. ‘‘अच्छे दिन मानने से होता है।‘‘ उन्होंने ‘अच्छे दिन‘ का माजरा ऐसे सुनाया, जैसे मोदी जी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कांग्रेसी जाल में फंस गये। उन्होंने भाजपा को भी फंसा दिया। गले की हड्डी बना दिया। अब न उगलते बन रहा है, न निगलते। कभी उल्टी करने, कभी गटकने की आवाजें आ रही हैं।

भाजपा और सरकार का ब्राण्ड बने नरेंद्र मोदी जी, अपने जन्मदिन को आज ‘सेवा दिवस‘ के रूप में मना रहे हैं। लोग फंसे हुए हैं और देश जहां फंस गया है, वहां से सही-सलामत निकलने का जुगाड़ नहीं है। अर्थव्यवस्था पर निजी वित्तीय ताकतों की पकड और देश में साम्राज्यवादी ताकतों की दखल बढ़ती जा रही है। बुरे दिनों के दस्तक दे दी है। फॉसिस्ट शक्तियों की उपासना हो रही है, विर्सजन का समारोह आसान नहीं होगा। कुर्बानियों के खून से ढाका की सड़कों के लाल होने की खबर है। जश्न के लिये यह जबर्दश्ती ली गयी कुर्बनी है। देश की सड़कें अभी लाल नहीं, मगर कुर्बानियां तो ली जा रही हैं। क्या आपको नहीं लगता, कि बुरे दिनों की पहचान हमारे सामने है?

-आलोकवर्द्धन

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