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अनवर सुहैल की तीन कविताएं

anwar suhail1. भागते रहे हम

छिपे हुए है कैमरे गुपचुप टोह में हैं
और उनकी शिकारी निगाहें खोज रही हैं
भागते रहे हम और बचाते रहे अपना वजूद
कि संसार में बची रहे हुनर और कला
शिकारी निगाहों से बचते-बचाते
घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ों की गुफाओं में
कभी इसी तरह छिपे थे हम
हम जो पत्थरों में जान फूंकने का हुनर जानते हैं
हम जो झरनों और बियाबानों में
सुनते हैं गहन-मौन के आर्तनाद को
हम कभी फ़ना नहीं हुए
देख लो अजन्ता-एलोरा की गुफाएं
हम बचते-बचाते भागते फिरे और बचाए रखे सदियों तक
अपनी सृजनात्मकता और सवेद्नाओं के ज्वार को
खोज रही हैं संस्थाएं हममें बगावत के बीज
कोंच रहे हैं तानों-मलामतों के खंज़र
ऊंची आवाजों में भोंक रहे आज़ाद घुमते कटखन्ने कुत्ते
कुतर्कों के जाल डाल कर हमें फांसने की हो रही तरकीबें
बचते-बचाते फिर-फिर भाग रहे हम
सदियों से इकट्ठा है हममें अपमान और बेबसी की पूँजी
और इन सबके साथ जीने की विकट लालसा
हम गिडगिडाना नहीं जानते
हमारा प्रतिरोध प्रकृति के संग एकाकार हो
गूंजता गीत बनकर कि भूल जाते लोग
सदियों की प्रताड़ना और पीड़ा के दंश….
छिपे कैमरे गुपचुप टोह में हैं
देख रही शातिर निगाहें और हैरान हैं
हम हैं कि फिर-फिर जिए जा रहे हैं….
(10/09/16)

 

2. इल्ज़ाम

हर दिन एक नया इल्ज़ाम
समझ नहीं आता कि कैसे, बदलें अपना चाम
कोई कहता कठमुल्ला तो कहता कोई वाम
ताना कसते इस अंगने में नहीं तुम्हारा काम
कैसे आगे आयें देखो लगा हुआ है जाम
ये ही दुःख है हर घटना में लेते हमारा नाम
कैसे आयें मुख्यधारा में भटक रहे दिनमान
हर दिन एक नया इल्ज़ाम…

 

3. जीते बनता है न मरते

फिर-फिर आ जाते हैं झुण्ड के झुण्ड
साइकिलों पर पैडल मारते
पोटली में कंडे जैसी रोटी-अचार बांधे
कभी न मुटाते, कभी न चिकनाते ठेकेदारी मजदूर
वक्त जैसे ठहर जाता है उनके लिए
वैसे का वैसा दीखता है शम्भू मुंशी
जैसा दीखता था पंद्रह बरस पहले
क्योंकि ठीकेदार और मजदूर के बीच की अनिवार्य कड़ी है वह
साहबों, सुपरवाईजरों से गुप-चुप बतियाता है
फिर पेरता मजदूरों को सारा दिन इस तरह
एक फार्मूला है काम लेने का इनसे
आठ की जगह सोलह घंटे का काम बताया जाए
तब जाकर काम है सध पाता
थके-थके झुण्ड के झुण्ड श्रमिक
लौटते अपने गाँव इस हडबडी में
कि अँधेरा होने से पहले पहुँच जाएँ गाँव
ऐसा नहीं है कि वहां एक शानदार आरामगाह में
रात्रि-भोज के साथ उनका हो रहा होगा इंतज़ार
वे पहुंचना चाहते हैं जल्दी इसलिए
कि घर पहुंचकर नहा-खा-पीकर
फिर उठना है अलस्सुबह उन्हें
फिर पहुंचना है काम पर
फिर खटना-पदना है
फिर-फिर जीना-मरना है
फिर-फिर आ जाते हैं झुण्ड के झुण्ड ठेकेदारी मजदूर
जिन्हें मालूम है अच्छी तरह
कि खटेंगे तो खायेंगे
नहीं खट पाए तो बेकाम लौटा दिए जायेंगे…
काहे कि मुंशी भी तो यही कहता है
देखो हमें काम प्यारा है चाम नहीं…
और काम है कि ख़तम होने का लेता नहीं नाम
मरने के बाद ही उन्हें मिलेगा आराम….

-अनवर सुहैल

परिचय :-

जन्म : 09 अक्तूबर 1964 , मध्यप्रदेश के नैला / जांजगीर में !
प्रकाशन : दो उपन्यास , तीन कथा संग्रह , एक कविता संग्रह , तीन कविता पुस्तिकाएं तथा ‘असुविधा’ और ‘संकेत’ पत्रिकाओं का सम्पादन !
सम्प्रति : कोल इंडिया लि. में सीनियर मैनेजर !

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