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उड़ी आतंकी हमला

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जम्मु-कश्मीर के उड़ी सैन्य मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले के बारे में कुछ भी कहने या लिखने से पहले हम यह खुले तौर पर घोषित करते हैं, कि हम आतंकवाद के खिलाफ हैं। हर किस्म के आतंकवाद के खिलाफ हैं, चाहे वह किसी संगठन या समूह के द्वारा फैलाया गया आतंकवाद हो, या राज्य की सरकारों के द्वारा सेना, पुलिस और खुफिया तंत्र द्वारा की जा रही निगरानी का आतंकवाद हो। हम आम जनता को आतंकित करने के खिलाफ हैं।

यदि सेना पर हमला हुआ है, तो हम मानते हैं, कि ‘‘हर वर्दी के पीछे किसान है।‘‘ वह श्रमजीवी है, जिसे रोजी-रोटी और अच्छी जिंदगी चाहिये। यह उसका अधिकार है।

अच्छी जिंदगी के लिये आदमी की सूरत बिगाड़ दी गयी है। उसे उसके वर्ग से काट दिया जाता है। उसकी समझ से यह बात निकाल दी जाती है, कि सरकारें यदि बाजारवादी ताकतों के साथ हैं, वह अपने देश और देशवासियों से ज्यादा बाजारवादी ताकतों के लिये लड़ता और अपनी शहादत दे रहा है। देश की सेना को इन ताकतों की सेना में बदला जा रहा है। अमेरिका जैसे देशों में ‘निजी सेना‘ का व्यापार चल पड़ा है, जो किसी आतंकी संगठन से कम नहीं। जिन्होंने इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया और तीसरी दुनिया के देशों में अपना कारोबार फैला रखा है। अमेरिकी सेना ऐसे देशों में निजी सेनाओं के पीछे-पीछे चल रही है।

आतंक राज्य की सरकारों का हो या आतंकी संगठनों का उसके पीछे अमेरिकी साम्राज्यवाद, उसके सहयोगी यूरोपीय एवं कई अरब देश हैं। उसने ही आतंकवाद को ‘वैश्विक दर्जा‘ के मुकाम तक पहुंचाया है। उसने ही 9/11 की घटना को अंजाम दिया, उसने ही ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध‘ को आतंकवाद को फैलाने का जरिया बनाया। और देश की मोदी सरकार अमेरिकी सरकार के साथ है। अमेरिका के ‘आतंकवाद विरोधी युद्ध‘ का वह साझेदार बन गया है। हम यह नहीं कह सकते कि उसे इस बात की जानकारी नहीं है, कि ‘आतंकवाद विरोधी युद्ध‘ अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसकी नवउदारवादी बाजारपरक अर्थव्यवस्था के विस्तार का जरिया है। बल्कि समझना यह चाहिये कि यह उसकी सोची-समझी योजना है। जिस तरह अमेरिका एवं साम्राज्यवादी ताकतों ने आतंकी प्रशिक्षण और पनाह के लिये पाकिस्तान को अपना जरिया बनाया, अब वह भारत को आतंकवाद विरोधी युद्ध का जरिया बना चुका है, ताकि एशिया में वह चीन की बढ़ती हुई ताकत और बढ़ते वर्चस्व को रोक सके।

इस बीच नरेंद्र मोदी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर, तमाम मुद्दों को दरकिनार कर आतंकवाद के खिलाफ बोलते रहे हैं, वह अमेरिकी समर्थक होने और उनके इरादों की चुगली है। उन्होंने जी-20 सम्मेलन, ब्रिक्स देशों की बैठक और आसियान देशों के शिखर सम्मेलन में आतंकवाद को मुद्दा बनाया। ‘‘पाकिस्तान का नाम लिये बिना‘‘ उन्होंने पड़ोसी देश को ‘आतंकवादी देश‘ घोषित करने का दबाव बनाया। विश्व समुदाय से उसे अलग-थलग करने की बातें की।

उड़ी सैन्य मुख्यालय पर हुए हमले के लिये मोदी सरकार ने खुले तौर पर पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया। जिसे पाकिस्तान की सरकार ने खारिज कर दिया। जिसमें 18 भारतीय जवान शहीद हुए और 4 आतंकी मारे गये।

भारत जिसे पुख्ता सबूत कह रहा है, क्या वे इतने पुख्ता हैं कि विश्व समुदाय के सामने वो पाकिस्तान के खिलाफ अकाट्य प्रमाणित हों?

उड़ी सैन्य मुख्यालय पर आतंकी हमला पठानकोट एयरबेस पर किये गये हमले की तर्ज पर ही है। पठानकोट एयरबेस पर किया गया हमला अभी भी निष्कर्षहीन है, संदेह के दायरे में जैसे संसद पर किया गया आतंकी हमला है, कम-ओ-बेश वैसी ही स्थिति है। अशांत कश्मीर जब सेना की निगरानी में हाई अलर्ट पर है, यह कैसे संभव है, कि 4 आतंकी 24 से 48 घण्टे पहले से वारदात के इलाके में हों और किसी को पता न चले?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिसका जवाब हमें नहीं मिलेगा। किसी भी देश की आम जनता को ऐसी जानकारियां ‘राष्ट्रीय हित‘ में नहीं दी जाती और सरकारें विशेष दर्जा हासिल कर लेती हैं। आम जनता के पास सिर्फ अनुमान ही होता है। वह गलत खबरों से भी अपनी राय बनाती है। केंद्र की मोदी सरकार ने वैसे भी खबरों का ‘ब्लैक आउट‘ घोषित कर रखा है। खबरों की मानें तो ऐसी चूक सिर्फ सवाल ही है। हम नहीं जानते कि आतंकी हमले का ‘मास्टर माइंड‘ कौन है? सरकारों को भी बरी नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान में आवाम की सरकार का तख्तापलट भी संभव है, और भारत में फॉसिस्टों का बढ़ना तय है। संघ, भाजपा और मोदी सरकार साम्राज्यवादियों के हित में अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं।

पाकिस्तान के नजरिये से क्या यह हमले का माकूल वक्त है? जब जम्मू-कश्मीर और पाक अधिकृत कश्मीर में जनसंघर्ष जैसी स्थितियां हैं? जब दोनों ही देशों के बीच का तनाव विस्फोटक मुकाम पर है? जब मानवाधिकार का मुद्दा गरम है? जब मानवाधिकार परिषद (संयुक्त राष्ट्र) के 33वें सत्र की शुरूआत होने में 48 घण्टे से भी कम वक्त था? जब 26 सितम्बर को संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में भारत के द्वारा ‘पाकिस्तान को आतंकी देश‘ घोषित करने का प्रस्ताव आना तय है? जब पहली बार पाकिस्तान रूस के साथ सीमित सैन्य अभ्यास की तैयारियां कर रहा हो? जिसका गंभीर रणनीतिक महत्व है। जब चीन दक्षिण चीन सागर के विवाद में फंसा हो, जिसके सहयोग पर पाकिस्तान का आर्थिक विकास निर्भर करता है? जब चीन के सहयोग के बिना पाकिस्तान अमेरिकी चंगुल से बाहर निकलने की स्थिति में नहीं है? क्या पाकिस्तान की ऐसी स्थिति है, कि वह विश्व समुदाय की अनदेखी कर सके? और भारत का विरोध बर्दाश्त कर सके?

हर एक सवाल का सिर्फ एक ही जवाब है, कि यह पाकिस्तान के लिये कूटनीतिक आत्महत्या है। नवाज शरीफ के लिये मुश्किलों का पैगाम है।

जबकि, भारत की मोदी सरकार अपनी आंतरिक समस्या का कठोर समाधान और परम्परागत विदेश नीति को बदलने का आधार बना रही है। कह सकते हैं, कि बना चुकी है।

मौजूदा आतंकी हमला अमेरिकी हितों से जुड़े मोदी सरकार के पक्ष में इतना है, कि सोचना पड़ रहा है, कि यह अमेरिकी कारस्तानी तो नहीं? यह उन ताकतों की साजिश तो नहीं जिसमें पाकिस्तान के साथ भारत भी फंस गया है? हम यह मानते हैं, कि पाकिस्तान दूध का धुला नहीं है। आतंकवादियों का गढ़ उसे अमेरिका ने ही बनाया है। जिसका उपयोग इराक से लेकर अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया में ही नहीं, भारत के खिलाफ भी, अमेरिका ने किया।

(जारी)

-आनुकृति, आलोकवर्द्धन

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