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एक दूसरे पर लदे दिन

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एक दिन को
मैं दूसरे दिन पर
रख देता हूं यह जानते हुए
कि रखे हुए दिनों की
अपनी मुसीबतें हैं,
उन्हें रोज
नये दिन का बोझ उठाना पड़ता है,
रातें गुजारनी पड़ती हैं आशंकाओं में,
जिन बातों पर उनका जोर नहीं होता
उन बातों की फिक्र करनी पड़ती है,
कि कल यदि बारिश हुई
तो पानी का बोझ भी उठाना होगा,
छाया रहा यदि कुहरा
तो दिन की शुरूआत ही बुरी होगी,
जाड़े से दुःखते बदन को
संभालना होगा मुश्किल।
दुश्वारियां बढ़ेंगी
कहां से आयेगा
बुरे दिनों को ढ़कने के लिये कपड़ा?
सूरज भी नहीं होगा हांथ-पांव सेंकने के लिये
नमी जोड़ों को जकड़ लेगी।

एक-दूसरे पर लदे दिनों ने
जान लिया है एक-दूसरे को,
पहचानने लगे हैं वो
अपने ऊपर
और अपने नीचे रखे दिनों को।
जान लिया है उन्होंने
कि वो कमजोर आदमी के
बीते हुए दिन हैं।
जो उन लोगों से दबता है
जिनके रंगहीन बदन पर
चर्बी के मोटे तह हैं,
जिनके दिन
सट्टेबाजों की तरह बीतते हैं
और जिनकी रातों को
मौसम के बदलने का डर नहीं होता।
जान लिया है उन्होंने
कि मैं उन गुण्डों से डरता हूं
जो बेखौफ हैं।
लूट और छीन कर जीने वाली
सरकारों से मैं डरता हूं।
डरने को मैं उन दिनों से भी डरता हूं
जिन्होंने थोड़ी-बहुत खुशियां मुझे दीं।

मैं उन खुशियों के लिये
वैसा नहीं,
जैसा होने के लिये
बुरे दिनों से लड़ना पड़ता है,
फिर भी, अपने कमजोर होने की बातें
मुझे बुरी लगती हैं,
तेलचट्टों की तरह जीना
दीमकों की तरह अपने नींव को खाना
और किसी के पांव से कुचल कर
मरने से बचने के लिये
कोने, कचरों की तरफ भागना, बुरा लगता है।
यह सोच कर बुरा लगता है
कि मैं कभी आदमी था उम्मीदों से भरा।
टाल कर रखे दिनों की ओर
मैं देख नहीं पाता,
जिनकी उम्मीदें अभी मरी नहीं हैं,
मरा नहीं है बीता हुआ कल।

एक दिन को
दूसरे दिन पर
रखने से पहले
अब मैं सोचने लगा हूं
कि उनकी गांठें बांधनी चाहिए मुझे।
यदि वो कागज के कमजोर पन्ने हैं
तो उन्हें उठा कर एक साथ
समय के मुंह पर मारना चाहिए मुझे।
एक दिन को
दूसरे दिन पर
रखने की मजबूरी से
मैं उबरना चाहता हूं,
चाहता हूं अपनी दुश्वारियों को
उनकी दुश्वारियों से जोड़ना।
रखे हुए दिनों से
पूछना चाहता हूं-
‘इन दिनों को बदलने की लड़ाई
हमें कहां से शुरू करनी चाहिए?’
मिलना चाहता हूं उन लोगों से
जिन्होंने बुरे दिनों को मात दी
कि ‘लड़ाईयां, जहां शुरू हो गयी हैं
हमें वहीं से लड़ना चाहिए।’

-आलोकवर्द्धन

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