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उड़ी आतंकी हमला – 2

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इस बात के ठोस प्रमाण हैं, कि दुनिया के अधिकांश आतंकी संगठनों के पीछे यूरोपीय देश, अमेरिकी साम्राज्य और उसके मित्र देश हैं। उन्हीं के आर्थिक सहयोग, कूटनीतिक समर्थन और दिखावटी विरोध से आतंकी संगठनों की सांसें चल रही हैं, जो उनके हितों के लिये काम करती है। ‘अल्कायदा‘ से लेकर ‘इस्लामिक स्टेट‘ और उनसे जुड़े तमाम आतंकवादी संगठनों का इतिहास यही है।

हमें यह मान कर चलना चाहिये, कि जब तक साम्राज्यवादी ताकतें हैं, आतंकवाद की जड़ों को उखाड़ कर फेका नहीं जा सकता। समाजवाद के विरूद्ध आतंकवाद इन्हीं ताकतों की इजाद है। जिसका मकसद राजनीतिक अस्थिरता और सैन्य हस्तक्षेप है। तख्तापलट और सरकारों का अपहरण है। आतंकवाद बाजारवादी अर्थव्यवस्था के लिये वैश्विक वित्तीय ताकतों की मार है। जिनके निशाने पर पूर्व समाजवादी और पूर्व सोवियत संघ के मित्र देश हैं। अपने से असहमत देशों की अर्थव्यवस्था है। जिनका हाथ थाम कर आज भारत की मोदी सरकार खड़ी है, जिन्हें इन्हीं ताकतों ने चुनावी तरीके से भारत में खड़ा किया है। देश की मोदी सरकार वही कर रही है, जो अब तक अमेरिकी इशारे पर पाकिस्तान की सरकारें करती रही हैं।

भारत और पाकिस्तान को एशिया की शांति और स्थिरता के लिये खतरा बनाया जा रहा है।

जम्मू-कश्मीर के उड़ी सैन्य मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले को आधार बना कर भारत की मोदी सरकार उस पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित कराने का कूटनीतिक अभियान और सैन्य कार्यवाही की कार्यनीतियां बना रही है, जिसे अमेरिका ने ही आतंकवादियों का गढ़ बनाया। उसी के जरिये उसने अफगानिस्तान, इराक और लीबिया और सीरिया में आतंकी संगठनों को खड़ा किया और भारत पर आतंकी हमले कराये। और अब, आतंकवाद के खिलाफ जारी सैन्य अभियान में वह पाकिस्तान को मोहरा बना कर, भारत से सैन्य संधि कर, भारत का उपयोग चीन के खिलाफ कर रहा है। रूस, चीन, ब्रिक्स देश और लातिनी अमेरिकी देशों के आपसी सहयोग से बन रहे -जिसमें भारत भी सदस्य देश हैं- दुनिया की वैकल्पिक व्यवस्था के खिलाफ, भारत का उपयोग कर रहा है। पाकिस्तान में भी रूस और चीन और उनकी बाजारवादी वैकल्पिक व्यवस्था अमेरिकी निशाने पर है। अमेरिका एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपने सामरिक वर्चस्व को बनाये रखने की लड़ाई लड़ता हुआ भारत को पाकिस्तान की तरह अपना मोहरा बना लिया है।

जिस हिंद महासागर पर अमेरिकी वर्चस्व को भारत ने अपनी मंजूरी दी है, उसी हिंद महासागर के डियागो गार्सिया में उसने अमेरिकी सैन्य अड्डे का कभी विरोध किया था। भारत दक्षिण चीन सागर के विवाद में आज अमेरिकी खेमें में खड़ा है। पाकिस्तान के पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरते चीन के आर्थिक गलियारे को भारत के माथे पर सिकन बना कर, अमेरिका चीन के आर्थिक एवं सामरिक वर्चस्व को रोकने की साजिशें चल रहा है। अमेरिकी सीनेट में पाक को आतंकी देश घोषित करने का प्रस्ताव पेश है। भारत वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक अभियान चलाता हुआ संयुक्त राष्ट्र संघ तक अपनी पेशकश पहुंचा चुका है। उड़ी आतंकी हमले के खिलाफ अमेरिका सहित विश्व समुदाय की एकजुटता भारत के पक्ष में नजर आ रही है मगर धोखा इस सहमति और एकजुटता के पीछे है। जिसका नेतृत्व अमेरिका कर रहा है।

देश की मोदी सरकार इस हमले को अपनी आतंकी समस्याओं के समाधान के नजरिये से ‘राष्ट्रीय उन्माद‘ फैला रही है। यह उन्माद आतंकवाद के खिलाफ कम पाकिस्तान के खिलाफ ज्यादा है, जिसका प्रभाव भारत के अल्प संख्यक समुदाय पर पड़ता है, और हिंदू राष्ट्रवाद को हवा मिल जाती है। जो संघ एवं भाजपा की सोच-समझ है। स्थायी मुद्दा है। जो बढ़ती हुई ‘सामाजिक असहिष्णुता‘ के मुकाम से होता हुआ ‘देशभक्त बनाम देशद्रोह‘ के जेएनयू मुकाम तक पहुंचा। जहां संघ, भाजपा एवं सरकार को असफलता का सामना करना पड़़ा। मोदी सरकार इस सच को भूल चुकी है, कि उसे मिला जनसमर्थन आर्थिक विकास और अच्छे दिनों के उन सपनों की वजह से मिला जिसे मोदी के नाम से भारी भरकम चुनावी खर्च और वॉलस्ट्रीट की निजी कम्पनियों के सहयोग से दिखाया गया। जिसके बारे में हर वर्ग की सोच अलग है। जो सरकार और भाजपा के गले में हड्डी की तरह फंस गयी है। जिसे चाटुकार मीडिया, सरकारी प्रचार और संघी-भाजपायी प्रचारकों और मोदी के बड़बोलेपन से लांघने की नाकाम कोशिशें हो रही थीं। लेकिन, इस आतंकी हमले के मुद्दे से मोदी सरकार से ‘असफलता के सवाल‘ को पीछे धकेला जा रहा है।

कुछ इस तरह से प्राचारित किया जा रहा है, कि ‘‘नेहरू-गांधी की सरकारें राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करती रही और मोदी सरकार देश की पहली ऐसी राष्ट्रवादी सरकार है, जिसकी विदेश नीति ठोस एवं मजबूत है। जिसने देश के राष्ट्रीय गौरव को बढ़ाया है।‘‘ जिसके पक्ष में दुनिया भर की सरकारें हैं। पाक के मामले में उसे अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक सफलता मिली है, और वह पाकिस्तान पर हमला करने में सिर्फ सक्षम ही नहीं है, वह चाहे तो पाक अधिकृत कश्मीर और पाक के सीमा क्षेत्र में घुस कर वहां के आतंकी शिविरों को नष्ट कर सकता है। सरकार बार-बार कह रही है, उसके सामने सभी विकल्प खुले हैं। उसने अमेरिकी कार्यवाही की पद्धति को स्वीकार करते हुए-

पाक अधिकृत कश्मीर पर भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक,

पाक चौकियों पर जबर्दस्त गोलाबारी

आतंकवादियों पर इनाम

पाक को आतंकी देश घोषित कराना

और ड्रोन हमले की कार्यवाही पर विचार कर रहा है।

उसने पाक के साथ ‘सिंधु जल समझौते‘ को तोड़ने पर विचार करना भी शुरू कर दिया है।

घटनाक्रम में तेजी बरकरार है। आने वाले कल में संघ, भाजपा और मोदी सरकार इस तेजी को अपनी सफलता के रूप में चुनावी मुद्दा बनाने का निर्णय लेती सी लग रही है। जिसका मतलब है, देश में हिंदू राष्ट्रवाद के मुद्दे से जनहित के मुद्दे को हथियारों के साथ युद्ध उन्माद से जोड़ना। कह सकते हैं, कि सरकार अपनी नाकामी और अपने इरादों को पूरा करने के लिये उड़ी आतंकी हमले को ढ़ाल बना रही है।

-आलोकवर्द्धन, अनुकृति

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