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सचिन तेन्दुलकर एक बड़ा गेम है

सचिन तेन्दुलकर एक बड़ा गेम है। यह जा कर कहां ठहरेगा? हम नहीं जानते। भगवान तो उन्हें बनाया ही जा चुका है।

इस बीच मीडिया ने उन्हें जितनी तरजीह दी, उनके बारे में जितना लिखा, कहा और उन्हें जितना दिखाया गया, उतनी तरजीह तो राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी को भी नहीं मिली, ना ही उतना लिखा, कहा और दिखाया गया। और हम समझते हैं, कि यह बेवजह नहीं है। वैसे भी बाजार किसी को सम्मान नहीं देता, उसे भुनाता है।

मामला करोड़ों-अरबों का है, उस खेल का है, जिसे बड़े ही सुनियोजित ढंग से सम्मानित बनाया गया। जिस खेल से युवाओं को निठल्ला और लापरवाह बनाया गया। उनकी नाराजगी और गुस्से को खेल के मैदान में उतारा गया। बढ़ती हुर्इ सामाजिक जनचेतना और जनअसंतोष को भुलावे में डाल दिया गया। यह भुलावा आज भी बरकरार है। हमारी समझ में नहीं आ रहा है, कि हम ऐसे खेल के भगवान का क्या करें? जिनके बारे में कहा और लिखा तो यही जायेगा कि उन्होंने युवाओं को प्रेरणा दी, वो देश के युवाओं के आदर्श थे। मगर क्या हम इन्हें किसी आदर्श के सामाजिक ढांचे में ढाल सकते हैं? क्या ऐसे आदर्श से समाज के सही विकास की ओर एक कदम भी आगे बढ़ा जा सकता है?

किसी को छोटा बनना हमारा मकसद नहीं है। यदि खेल के मैदान की बात हो, तो उन्हें सम्मान मिलना चाहिये। मिल रहा है। मगर खेल बाजार के बीचो बीच आ गया है। राजनीति के दायरे में है। ”जो दिखता है, वह बिकता है, और जो बिकता है, वही दिखता है।” आज सचिन दिख रहे हैं, बिक रहे हैं। बाजार में उनकी अच्छी कीमत है। राजनीति में भी पूछ है। वो राज्य सभा के सदस्य हैं। और कर्इ राजनीतिज्ञ चाहते हैं, कि ”जैसे उन्होंने अब तक देश की सेवा की, आगे भी वो देश की सेवा करते रहें।”

क्रिकेट से देश की सेवा होती है, यह हमें मान लेना चाहिये, खुले दिल से स्वीकार कर लेना चाहिये, क्योंकि क्रिकेट से कमार्इ होती है। और कमार्इ करना, कराना ही बाजारवाद है। जिसकी सरकार दिवानी है।

आज कल देश की सेवा और देश का विकास सिर्फ दो लोग कर रहे हैं, राजनेता और निजी कम्पनियां। बाकी तो इनकी गाड़ी में लदे हुए सामान हैं, जिन्हें ये अलग-अलग ठिकानों पर अपने हितों को पूरा करने के लिये उतारते, बढ़ाते रहते हैं। जिसकी जरूरत इन्हें जहां होती है, उसे वहीं खड़ा कर देते हैं, इतना सम्मान और सम्मान का प्रचार देते हैं, कि दिमाग सनक जाये।

अभी सचिन तेंदुलकर दोनों के उपयोगी सामान हैं। राजनेताओं के सामने होने वाला चुनाव है, और निजी कम्पनियों के सामने बाजार है।

ऐसा नहीं है, कि दोनों के सामने सिर्फ भगवान है, और वो भगवान भरोसे हैं। नहीं! ये भगवान बनाते हैं, और भगवान को अपने काम से लगा देते हैं। मामला करोड़ों-करोड़ को होता है। आर्इपीएल के खड़ा होने से लेकर स्पाट मैच फिकिसंग और सटटा बाजार में बड़े-बड़ों के मुनाफे का जलवा आपने देखा ही है। भले ही मामला अब ठण्डे बस्ते में है, और क्रिकेट की बदनामी को भगवान को दिया जाने वाला सम्मान, फिर से सम्मानित बनाने का जरिया बन रहा है। क्योंकि मुनाफा बटोरने वाले इतने बड़े धन्धें को सिर्फ बदनामी की वजह से बंद नहीं किया जा सकता। इसलिये बदनामी को धोने के लिये सचिन तेंदुलकर को उस ऊंचार्इ पर खड़ा किया जायेगा, जिसे दिखा कर कहा जा सके कि ”हमारी सुनने पर यहां तक पहुंचा जा सकता है।”

यदि क्रिकेट के खिलाड़ी और क्रिकेट के मैदान को हम देखें तो सिर से लेकर पांव तक खिलाड़ी और एक छोर से दूसरे छोर तक मैदान इस्तहारों से पटा नजर आयेगा।

यदि क्रिकेट कमेण्ट्री से लेकर उसके प्रसारण पर नजरें डालें तो वहां भी कमार्इ का भारी जरिया है। इतना बड़ा जरिया है, जिसे पाने के लिये इस्ट इणिडया कम्पनी भी मचल जाये।

हर ओवर हर एक गेंद में ढेरों पैसा है। सटटा बाजार है। लोग कहते हैं, कि ”आखिरी गेंद तक गहरा रोमांच होता है।” होना ही चाहिये, क्योंकि जो लोगों में रोमांच भरते हैं, दौलत से उनका रोमांस पक्का है। पहले से सारी बातें तय होती हैं। कौन जीतेगा, कौन हारेगा। किसे बुझना है, किसे चमकना है। सब तय होता है। खिलाड़ी ही नहीं टीम के मालिक भी यह जानते हैं। उधोगपतियों और अभिनेताओं-अभिनेत्रियों ने चाहे जैसी भी खरीददारी की हो, मुनाफा चोखा ही होता है। ऐसा नहीं होता कि कोर्इ डूब जाये। डूबते दर्शक हैं। डूबते वो लोग हैं, जो सबकुछ जानते हुए बहंस करते हैं। अफसोस जाहिर करते हैं, कि भगवान शतक बनाने से चूक गये।

सचिन तेंदुलकर पर लिखने के लिये सारे लिक्खाड़ टूट पड़े हैं। जहां से क्रिकेट को तीसरी दुनिया में धकेल कर उतारा गया, कि ”बाबू बर्बाद हो जाओ” वहां के लिक्खाड़ न्यूयार्क टार्इम्स में, सचिन की विदार्इ को गांधी को दी गयी अंतिम विदार्इ से जोड़ने का करिश्मा कर दिखाया है। इसलिये किसने क्या कहा? इस बात का कोर्इ महत्व नहीं है। कोर्इ जार-जार रोये, या कोर्इ बेजार नजर आये, इस बात का भी कोर्इ महत्व नहीं है। मैदान को सिर झुकाने या आसमान को देखने का भी कुछ ऐसा ही महत्व बनता है। क्योंकि सबकुछ इतना प्रायोजित है, कि भवनाओं के लिये कोर्इ जगह नहीं है।

लोग गा रहे हैं, कि उन्होंने राष्ट्र को एक ठोस पहचान दी है। ऐसी ठोस पहचान अमिताभ बच्चन, शाहरूख खान और आमीर खान के नाम से भी दर्ज है। और ऐसी ठोस पहचानें बनती बिगड़ती रहती हैं। कभी ऐश्वर्या राय भी पहचान थीं। राजेश खन्ना भी पहचान थे। दिलीप कुमार, देवानंद और राजकपूर भी पहचान थे।

क्या कमाल की पहचान है।

ऐसा लगता है, जैसे खेल और सिनेमा और फैशन के अलावा भारत की और कोर्इ पहचान ही नहीं है, जबकि विश्व मानचित्र पर वह उपमहाद्वीप की तरह विशाल देश है। संभवत: जिसके पास नेतृत्व के अलावा और किसी चीज की कमी नहीं है।

क्या आपको ऐसा नहीं लगता, कि भारत की ऐसी पहचान जानबूझ कर बनायी जा रही है। ऐसे लोगों से उसकी पहचान बनायी जा रही है, जो बाजार की चीज हैं, और अपने लिये जीते हंैं। निजी सम्पतित हैं। निजी सम्पतित की पहचान हैं। जिनका बनना बाजार का विस्तार है।

सचिन के सम्मान में खेल से धन और सम्मान कमाने वाले, खिलाडियों के अलावा भारत सरकार कुछ ज्यादा ही चुस्त और दुरूस्त बन रही है। मुम्बर्इ क्रिकेट संघ के अध्यक्ष शरद पवार और दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने सचिन के सम्मान में डाक टिकट जारी किये। कर्इ सांसद और कांग्रेस नेता भी मौजूद थे। मिलिंद देवड़ा ने टवीटर पर लिखा ”मदर टेरेसा के बाद, सचिन दूसरे जीवित व्यकित हैं, जिनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया।” प्रधानमंत्री कार्यालय ने उन्हें ”भारत रत्न” देने की घोषणा भी कर दी। ध्यानचंद धरे रह गये।

सर्वोच्च नागरिक सम्मान की घोषणा के बाद, सचिन तेन्दुलकर ने कहा- ”यह सम्मान वो अपनी मां को समर्पित करेंगे।”

मां सबसे बड़ी होती है। कंधे पर लाद कर टीम इणिडया के खिलाडि़यों का सचिन को मैदान के चक्कर लगवाना और सचिन का तिरंगा लहराना भी एक सम्मान भरा सवाल है। आप मेरी पीठ थपथपायें, मैं आपकी पीठ थपथपाऊंगा।

बाजार में सचिन तेन्दुलकर का ब्राण्ड पहले से बड़ा हो गया है। आने वाले कल में आम जनता ही यह तय करेगी कि उसे शिक्षा, चिकित्सा और रोटी चाहिये या क्रिकेट? खेल और खिलाडि़यों को समाज में सम्मानित जगह मिलनी चाहिये, मगर तब जब खेलों के विकास के लिये सहज परिसिथतियां हों, जब सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से हम सुरक्षित हों। क्या ऐसा है? क्या भगवान और भगवान को भगवान बनाने वाले ऐसा कर सकते हैं? क्या वो ऐसा चाहते हैं? जवाब आपको मालूम है, इसलिये जवाब देने की जरूरत नहीं है, जरूरत इस बात की है कि आप हमें जानें।

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