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बीस ट्रिलियन डॉलर के कर्ज में डूबी अमेरिकी अर्थव्यवस्था

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संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज 19.5 ट्रिलियन डॉलर के स्तर को पार कर चुका है और इस बात का पक्का अनुमान है, कि ओबामा के कार्यकाल की समाप्ति तक यह कर्ज 20 ट्रिलियन डॉलर के स्तर तक पहुंच जायेगा। अमेरिकी ट्रेजरी के द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार- वर्तमान में अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज 19.5 ट्रिलियन डॉलर है, और जनवरी 2016 से लेकर अब तक इस कर्ज में 500 बिलियन डॉलर की बढ़ोत्तरी हुई है।

पूंजीवाद और अपनी अर्थव्यवस्था के प्रति जिस विश्वास को अमेरिकी सरकार बनाये रखना चाहती है, वह वास्तव में ध्वस्त हो चुकी है। उसके पास अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने का कोई आधार नहीं है, ना ही कोई सुरक्षा व्यवस्था है। वह वॉल स्ट्रीट, निजी कम्पनियों, दैत्याकार कॉरपोरेशन और निजी वित्तीय पूंजी की गिरफ्त में है। वह उन वैश्विक वित्तीय ताकतों की गिरफ्त में है, जिन्होंने व्हाईट हाउस और अमेरिकी कांग्रेस में अपने लिये काम करने वाले बिचौलियों को बैठा रखा है। उन्होंने फेडरल रिजर्व और उससे जुड़े बैंको के जरिये ‘डॉलर‘ और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर लिया है।

कर्ज में डूबी अमेरिकी अर्थव्यवस्था, वास्तव में डूब चुकी है। वह बड़े कर्ज से छोटे कर्ज को संभालने की नीति पर चलते-चलते वहां पहुंच गयी है, जहां बढ़ते हुए कर्ज के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। चाह कर भी अमेरिकी सरकार इस व्यवस्था को बदल नहीं सकती।

2009 में, जब पहली बार बराक ओबामा ने राष्ट्रपति का पद संभाला था, अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज 10.63 ट्रिलियन डॉलर था, जबकि आज लगभग 20 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर है। मोटे तौर पर देखा जाये तो 8 वर्ष के, दो कार्यकाल, दौरान अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज दो गुणा हो गया। जिसे रोकने और घटाने की क्षमता उसकी अपनी अर्थव्यवस्था में नहीं है, क्योंकि संभलने की तमाम संभावनाओं और संसाधनों का उसने निजीकरण कर दिया है। राज्य एक ऐसी वित्तीय इकाई में बदल गयी है, जिस पर सरकार का नियंत्रण नहीं है।

मार्च 2016 मे अमेरिकी सरकार ने कर्ज के उच्चतम सीमा को ही समाप्त कर दिया, इसलिये राष्ट्रीय कर्ज के बढ़ने की कोई सीमा ही नहीं है। उसका बढ़ना तय है।

अगस्त में ‘कांग्रेसनल बजट ऑफिस‘ ने रिपोर्ट दिया था, कि ‘‘इस वित्तीय वर्ष (सितम्बर 2016) में अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद -जीडीपी- दर में 3 प्रतिशत की वृद्धि के बाद बढ़ कर 77 प्रतिशत हो जायेगा।‘‘ यह अपने आप में एक ऐसी चुनौती है, जिसे हल कर पाना किसी भी अर्थव्यवस्था के लिये आसान नहीं है। ओबामा ने कर्ज की सीमा को हटा कर और फेडरल रिजर्व ने अमेरिकी डॉलर की अनियंत्रित छपाई कर, जिस तरह उसे बाजार में डाला है, उसने कर्ज और मुद्रा के लिये नयी मुसीबतें पैदा कर दी है।

अमेरिका के राष्ट्रीय कर्ज को कैसे नियंत्रित किया जाये? यह आनेवाले राष्ट्रपति और अमेरिकी कांग्रेस के लिये बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि 15 मार्च 2017 से कर्ज की उच्चतम सीमा फिर से प्रभावी हो जायेगी और नया उच्चतम स्तर वही हो जायेगा, जितना कि उस समय अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज होगा। अमेरिका के राष्ट्रीय कर्ज को नियंत्रित करने की कार्य योजना, ना राष्ट्रपति चुनाव के डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के पास है, ना ही रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प के पास है। इसे ‘राष्ट्रीय बहस‘ से बाहर रखा गया है। जबकि अमेरिकी सरकार अपने कर्ज पर वार्षिक लगभग 2.5 प्रतिशत व्याज का भुगतान करती है, जो कि 20 ट्रिलियन डॉलर का लगभग 500 बिलियन डॉलर वार्षिक ब्याज होता है।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था की इतनी बुरी स्थिति होने के बाद भी अभी भी ‘अमेरिकी ट्रेजरी‘ विश्व बाजार का सबसे विश्वसनिय खजाना गिना जाता है। अमेरिकी डॉलर की विश्वसनियता विश्व मुद्रा बाजार में बची हुई है, भले ही उसे चीनी मुद्रा -युआन- की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी ने 1970 के बाद पहली बार अपने मुख्य कर्जदाताओं की विस्तृत जानकारी की घोषणा की है। जारी रिपोर्ट के आधार पर चीन अमेरिकी ट्रेजरी का सबसे बड़ा ‘होल्डर‘ (धारक) है। चीन अमेरिकी ट्रेजरी का 1.244 ट्रिलियन डॉलर ‘होल्ड‘ करता है। दूसरा सबसे बड़ा ‘होल्डर‘ जापान है- 1.137 ट्रिलियन डॉलर। कैमन आईसलैण्ड 265 बिलियन डॉलर का धारक है। अमेरिकी ट्रेजरी के प्रमुख 20 धारकों में 86 बिलियन डॉलर का होल्डर रूस है।

वास्तव में बीस ट्रिलियन डॉलर के कर्ज में डूबी अमेरिकी अर्थव्यवस्था एक ऐसी अर्थव्यवस्था बन गयी है, जिसमें उसकी हिस्सेदारी एक ऐसे कर्जखोर की है, जो अपने लिये नकारा और दूसरों के लिये उपयोगी है। वह सिर्फ इसलिये बचा हुआ है, कि अमेरिका के दीवालिया होते ही, विश्व अर्थव्यवस्था के पांव उखड़ जायेंगे। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था दीवालिया हो जायेगी। और ऐसा होना वैश्विक वित्तीय ताकतों के हित में नहीं है।

-अनुकृति, आलोकवर्द्धन

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