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‘लीबिया कर्नल गद्दाफी के साथ ही मर गया’

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20 अक्टूबर 2011 को, सिरते में कर्नल गद्दाफी की हत्या की गयी। जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया। जिसका वीडियो देख कर हिलेरी क्लिंटन वहशियों की तरह अपनी खुशी जाहिर की- ‘‘हम आये, हमने देखा, वह मर गया।’’ और हंसती रही। उस समय वह विदेश मंत्री थीं और आज राष्ट्रपति पद की डेमोक्रेट उम्मीदवार हैं। जिनके बारे में चीन और रूस की स्पष्ट धारणा है, कि यदि वो राष्ट्रपति बन जाती हैं तो तीसरे विश्वयुद्ध को रोका नहीं जा सकता।

कर्नल गद्दाफी शॉवेज की तरह ही सिर्फ लीबिया में ही नहीं अफ्रीकी महाद्वीप में अमेरिका के लिये सबसे बड़ी चुनौती थे।

आज आम लीबियायी कहता है- ‘‘लीबिया कर्नल गद्दाफी के साथ ही मर गया।‘‘

और यह सच है।

सच उससे भी बड़ा है, कि यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवादी ताकतों ने लोकतंत्र और क्रांति के नाम पर कर्नल गद्दाफी और लीबिया के साथ अफ्रीकी महाद्वीप की एकजुटता और उसके आने वाले कल की हत्या की, उसे मार डाला। उसे युद्ध, आतंक और अंधकार के गहरे गर्त में ढ़केल दिया। उसे राजनीतिक अस्थिरता के जाल में फंसा कर आतंकवादियों के हवाले कर दिया। सच यह है, कि आज लीबिया हथियारबद्ध मिलिशियायी गुट और इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठन के कब्जे में है।

जिन लीबियाइयों ने कर्नल गद्दाफी के खिलाफ विद्रोह को बढ़ाने और युद्ध के जरिये तख्तापलट की कार्यवाही को अंजाम दिया था, आज वो ही लीबियायी कर्नल गद्दाफी की उपलब्ध्यिं में आम जनता की हिस्सेदारी और लीबिया के सुनिश्चित विकास को खोने का अफसोस कर रहे हैं।

यह स्वीकारोक्ति ‘डेली मेल‘ द्वारा ‘ऑन द ग्राउण्ड‘ -वर्तमान लीबिया में किये गये सर्वेक्षण और साक्षात्कारों से उभर कर सामने आयी है। डेली मेल का यह रिर्पोट ‘कॉमन डीफेन्स कमेटी‘ के उस रिपोर्ट के आने के कुछ दिनों बाद आयी, जिसमें लीबिया को खत्म करने और वहां इस्लामिक स्टेट के उभरने का सारा दोष ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के कंधों पर डाला गया है।

लीबिया के पतन के पांच सालों बाद आम लीबियावासी अंधकार, अभाव, शरणार्थी संकट और हो रहे हमलों, मिलिशियायी गुटों के खूनी संघर्षों से यह महसूस करने लगा है, कि उत्तरी अफ्रीका का सबसे विकसित देश अब हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता का शिकार हो चुका है। उनकी स्वीकारोक्ती साम्राज्यवादी साजिशों में शामिल होने का गहरा अफसोस है।

एक पूर्व गद्दाफी विरोधी लड़ाके ने -जिसका नाम मोहम्मद है ने डेली मेल से कहा- ‘‘मैं गद्दाफी के खिलाफ विद्रोह में पहले दिनों से शामिल था, मैंने गद्दाफी के खिलाफ लड़ाईयां लड़ी। 2011 के पहले मैं गद्दाफी से सबसे ज्यादा नफरत करने वालों में से एक था, मगर अब हमारा जीवन पहले से ज्यादा कठिन बन गया है, हमने अपना सबकुछ खो दिया है और अब मैं गद्दाफी का सबसे बड़ा समर्थक बन गया हूं।‘‘

एक तेल कामगर हारून ने कहा- ‘‘गद्दाफी के खिलाफ विद्रोह और गद्दाफी सरकार से आजादी खुले तौर पर हमारी गल्ती थी।‘‘ उन्होंने आगे कहा- ‘‘हम लोकतंत्र के लिये तैयार नहीं थे, और हमें विश्व समुदाय के समर्थन की जरूरत थी, जोकि उस समय हमारे पास नहीं था।‘‘ पश्चिमी देश हमला करने के लिये तो उतावले थे मगर इस अभियान का अंत हवाई हमलों से हुई तबाही के अलावा और कुछ नहीं। उन्होंने कहा- ‘‘पिछले 4 दशक से ज्यादा समय तक लीबिया में लोकतंत्र नहीं था। जिस समय क्रांति के बाद लीबिया में लोकतंत्र की पुर्नस्थापना करने की जरूरत थी, पश्चिमी ताकतों ने ऐसा नहीं किया। परिणाम स्वरूप कई हथियारबद्ध गुटों में, सैन्य तरीके से, सत्ता हासिल करने की लड़ाईयां शुरू हो गयीं।‘‘

लीबिया के राजनीतिक कार्यकर्ता फादिल ने कहा- ‘‘यह एक राजनीतिक अस्थिरता है।‘‘ उन्होंने आगे कहा कि- ‘‘हमने सोचा था कि गद्दाफी के समय से अच्छा होना चाहिये, लेकिन जो है वह है अराजकता। सभी एक दूसरे से लड़ रहे हैं।‘‘ अमेरिकी प्रशासन भी मानता है, कि लीबिया में कोई सरकार नहीं है।

त्रिपोली की एक व्यवसायी नूरी ने डेली मेल से कहा- ‘‘यह सिर्फ गद्दाफी समर्थक होने का मसला नहीं है। गद्दाफी एक सनकी नेता था, जो कि अंतर्राष्ट्रीय रूप से काफी शर्मनाक है। इसके बाद भी सच यह है, कि लोगों की जिंदगी गद्दाफी के कार्यकाल की तुलना में आज के समय काफी कठिन है।‘‘

त्रिपोली के 26 वर्षीय मेडिकल के छात्र सलेम ने कहा कि ‘‘अमेरिका के नेतृत्व में, जिसमें ब्रिटेन की भूमिका बड़ी थी, जो उम्मीदें पैदा की गयी थी, वह काफी जल्दी ही चकनाचूर हो गयीं।‘‘ उन्होंने स्वीकार किया कि ‘‘गद्दाफी के 42 साल के पूरे कार्यकाल और क्रांति के दौरान भी उतनी हत्यायें नहीं हुईं, जितनी हत्यायें अक्टूबर 2011 से ले कर अब तक में हुईं है। गद्दाफी के लीबिया के समय हमें ऐसी परेशानियां कभी नहीं उठानी पड़ीं, जैसी 2011 के बाद हमें उठानी पड़ रही हैं।‘‘ उन्होंने खुले तौर पर माना कि ‘‘उस समय -गद्दाफी सरकार के दौरान- किसी चीज की कमी नहीं थी। पैसे और बिजली हमेशा उपलब्ध थे, हालांकि लोगों को वेतन बहुत ज्यादा नहीं मिलता था, लेकिन सभी चीजें सस्ती थीं। जीवन काफी आसान था।‘‘

एक अनुमान के अनुसार- इस ‘क्रांति’ के परिणाम स्वरूप लीबिया में 1700 हथियारबद्ध मिलिशियायी गुटो का जन्म हुआ। अब लीबिया की राजनीति लोगों के मतपत्रों की जगह हथियार और बमों से तय की जाती है। लीबिया के लोगों की स्थिति इतनी बुरी कभी नहीं रही, जितनी आज है। लोकतंत्र -जिसकी उन्होंने उम्मीदें बांधी थी, वह नहीं आया। सलेम ने अपने वक्तव्य में यह भी कहा कि ‘‘यहां घायलों की तादाद रोज बढ़ती है। हमारा अपमान बढ़ता जा रहा है। यहां शांति नहीं है, और अब यहां इस समय का सबसे भयानक आतंकी गुट -इस्लामिक स्टेट- अपने पांव जमाने की कोशिशें कर रहा है।’’ उन्होंने एक अन्य लीबियायी के शब्दों का सहारा लेते हुए कहा- ‘‘लीबिया गद्दाफी के साथ ही मर गया।‘‘

यह कहने वाले जिस लीबियायी ने अपने इंटरव्यू में कहा था- ‘‘हम अब एक देश नहीं रहे, हम अब एक युद्धरत नगर या शहर हैं, जहां कबीलों  का गुट आपस में लड़ रहा है। पहले यहां सिर्फ एक गद्दाफी थे, अब यहां 6 मीलियन छोटे-छोटे गद्दाफी हैं।‘‘

जिन्होंने कभी कर्नल गद्दाफी का विरोध किया था, आज वो भी इस बात को स्वीकार करने के लिये विवश हैं, कि गद्दाफी की सरकार आज लीबिया के किसी भी सरकार से बेहतर थी, वह वास्तव में एक ऐसी सरकार थी, जिसने आम लीबियावासियों की फिक्र की। 42 वर्षीय फर्मासिस्ट फैय्याज-अल-मास ने कहा- ‘‘मुझे यह कहते हुए नफरत हो रही है, मगर हमारा जीवन गद्दाफी सरकार के कार्यकाल में बेहतर था। आज हम घंटो बैंक के बाहर इंतजार करते हैं, कैशियर से अपने ही पैसे की भीख मांगते हैं। सभी चीजों की कीमत तीन गुणा महंगी हो गयी है।‘‘ जबकि सच यह है कि यह वृद्धि 5 गुणा की हुई है और आम कामगरों को महीनों उनका वेतन नहीं मिलता है। यह स्थिति हर क्षेत्र की है। भूख, गरीबी, बेकारी और जान जाने का खतरा वो 2011 से झेल रहे हैं।

इस बीच इस्लामिक स्टेट का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। सिरते पर इस्लामिक स्टेट ने कब्जा कर लिया है। और इस्लामिक स्टेट से लड़ने के नाम पर 1 अगस्त से अमेरिकी सेना लीबिया पर हवाई हमले कर रही है। लीबिया का अघोषित विभाजन हो गया है। एक पूर्व लीबियायी राजनीतिज्ञ ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया कि ‘‘लीबिया का विभाजन हो गया है। यहां दो सरकारें हैं। दो संसद हैं। दो सेण्ट्रल बैंक हैं और दो नेशनल ऑयल कम्पनियां हैं।‘‘ और सबसे बड़ी बात कि लीबिया में कोई सरकार नहीं है।

लीबिया के लोगों के लिये उनका देश कूडे का डब्बा बन गया है। महमूद ने बेहद तल्खी से अपने देश की सरकारों और उनकी उपब्धियों के बारे में कहा- ‘‘2011 के बाद से अब तक 7 सरकारें आयीं और उन्होंने हासिल क्या किया? एकमात्र चीज जो हम देख सकते हैं, वह है ‘नये डस्टबिन‘ क्योंकि पहले की सरकार में से एक ने त्रिपोली के चारो तरफ एक बड़े ‘डस्टबिन‘ का निर्माण किया। जिसे हम देखते और हंसते हैं, कि क्रांति की एकमात्र उपलब्धि ये डस्टबिन है।‘‘ जिसमें यूरोपीय देश और अमेरिकी लोकतंत्र, आतंकी गुटों और इस्लामिक स्टेट के साथ पड़ा है। कर्नल गद्दाफी का लीबिया अब कहीं नहीं, उसकी हत्या इन्हीं ताकतों ने की है। जो हैं तो हत्यारे मगर उनकी सजा आम लीबियायी झेल रहा है।

-अनुकृति, आलोकवर्द्धन

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