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देश का नागरिक होना मुझ पर भारी पड़ा

महीने की शुरूआत मेरी बुरी हुर्इ, पहले सप्ताह में ही दिवाली आ गयी। और बराक ओबामा ने भारतीयों को दिपावली की बधार्इ भेज दी।

बधार्इ संदेश ने मुझे हिला दिया, कि यदि सौगात भी साथ में हुआ तो क्या होगा?

यदि मिठार्इ के डब्बे में बम भेज दिया

तो मैं करूंगा क्या?

यदि फुलझड़ी की जगह मिसाइलें भेज दी

तो मैं रखुंगा कहां?

यदि नकली पिस्तौल की जगह एके-56 भेज दिया,

तो मैं चलाऊंगा कैसे?

यदि ढेरों उपहार उन्होंने एफ-16 लडाकू बम वर्षक विमान में भर कर भेज दिया,

तो मैं लडुंगा किससे?

ड्रोन का डर सताने लगा। मेरी हालत पतली होती चली गयी। सारा दिन मैं डरा-डरा, घबराया सा रहा।

अमेरिका की दोस्ती दुश्मनी से कम नहीं होती।

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दिपावली जैसे-तैसे किल्लतों की मार सहते हुए बीत गयी। मगर मेरा बुरा होना थमा नहीं। सप्ताह भर भी नहीं बीता कि छत्तीसगढ़ में विधान सभा चुनाव का पहला दौर आ गया।
खबरें आ गयी कि ”वोट दोगे तो अंगुलियां कट जायेंगी।”

नक्सलियों के खिलाफ सैंकड़ों-हजारों सैनिकों और पुलिसया जवान आ गये। मैं अजीब-अजीब बंदूकों से घिर गया। दशकों से मार खाया मेरा चेहरा मेरी हालत बिगाड़ता रहा। जो भीे देखता वही मुझे खंगालने लगता। हौसला बढ़ाना तो दूर रहा हौसला पस्त करने लगा। तनी हुर्इ बंदूक की सर्द नालों से मुझे डराने लगा।

मैं पहले से ही डरा था, इसलिये मतदाता केंद्र पर ज्यादा देर तक खड़े रहने की मेरी दिलेरी, मेरा साथ छोड़ने लगी। सोचा भाग खड़ा होऊं, मगर ऐसा कर नहीं सकता था। जिसको भी पीठ दिखाता वही गोलियां दाग देता।

मेरी उलझन बरकरार रही- भागता तो पीठ पर गोली खाता और डटा रहता तो अंगुलियां गंवाता।

सारा दिन मैं दहशत में रहा।

अंत में पीठ में घुसने वाली गोली भी बच गयी और मेरी अंगुलियां भी बच गयीं। मगर पांच साल के लिये मेरी हथेली कट गयी।

देखने वालों ने कहा- ”मगर हथेली तो आपकी, आपके हाथ में है।”

मैंने गाते हुए कहा- ”यह हथेली भी कोर्इ हथेली है लल्लू।”

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मैंने सोचा था- गाने से जिंदगी में थोड़ी सी रवानी आ जायेगी। डर की चिरर्इयां फुर्रर से उड़ जायेगी। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैं दूसरे दौर में प्रवेश कर गया। बड़े-बड़े वायदे मुझे डराने लगे। पेट में ज्यादा खाना और आंखों से बड़े सपनों से मैं डर गया।

गंजे को कंघा

अंधे को चश्मा

लंगड़े को जूता

और लूले को दस्ताने का आश्वासन मुझे डराने लगा।

खेल के मैदान में तिरंगे का उतरना, क्रिकेट के भगवान का विदा होना, भारत रत्न का यूं घूमना-फिरना मुझे डराने लगा। ऊपर से लल्लू अड़ गया कि ”हथेली तो हाथ में है और चेहरा कमल सा खिला है।”
यह सुन कर मैं पहले से ज्यादा डर गया।

चुनावी इस्तहार होना मुझे डराने लगा। डरते-डरते मैंने पूछा- ”जनाब! 2014 का रूख कैसा है?”

नहीं जानता किसने? मगर किसी ने मेरी गिरेबां पकड़ ली कि ”चुनाव का पूर्वानुमान गुनाह है।”

देश का नागरिक होना मुझ पर भरी पड़ रहा है। और यह समझ के बाहर है कि जाऊं तो कहां जाऊं?

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