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काठ के पुतले का रंग

abcबढ़ती हुई सामाजिक असहिष्णुता का जिक्र सहसा ही थम गया।

इतिहास और साहित्य पर हो रहे हमलों के बारे में भी बातें ना के बराबर हो रही हैं।

भारतीय संस्कृति पर हो रहे हिंदूवादी सांस्कृतिक हमलों का जिक्र भी नहीं होता। मान लिया गया है, कि भारतीय संस्कृति की सूरत हिंदू संस्कृति है।

ऐसा है या नहीं?

किसी को सोचने की जरूरत नहीं है।

कोई यह सोच ही नहीं रहा है, कि वास्तव में संस्कृति पर हमला कहां से हो रहा है?

किसने हमारे रहन-सहन, खान-पान को बदल दिया?

किसने हमारे लिबास, हमारे जीने के दिन रात को बदल दिया?

किसने हमारी सोच, हमारी भावनाओं पर छुप कर धावा बोला है?

पश्चिमी ताकतों को -जिसमें अमेरिका भी शामिल है- बरी कर दिया गया है।

उनकी सोहबत को सामाजिक विकास

उनकी सोहबत को आर्थिक प्रगति

और उनकी सोहबत को सांस्कृतिक उत्थान की तरह मान लिया गया है।

देश की सरकार और हिंदूवाद की डफली बजाने वाली उसकी सांस्कृतिक इकाईयों के लिये यह कोई मुद्दा नही है। जो राजनीति भी करती है।

उसकी फिक्र इस्लामी संस्कृति है।

उसकी फिक्र सदियों पहले हुए तुर्क और मुगलों के हमले हैं।

उसकी फिक्र उन हमलावरों की संस्कृति है, जो भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है।

वह इस मानसिकता को फैलाता है, कि भारतीय संस्कृति वास्तव में हिंदू संस्कृति है, जिस पर इस्लामी संस्कृति का हमला आज भी हो रहा है। जबकि हमलावर वो ताकतें हैं, जो हमारी सोच, रहन-सहन और लिबास को भी बदल चुकी है। जो देश की राजनीतिक व्यवस्था और आर्थिक विकास का साझेदार बन गयी है।

जिसके होने को जब हम समाज के आईने में देखते हैं, तो हमें अपनी सूरत नजर आती है, उसका बदला हुआ रूप नजर नहीं आता।

कभी हमने सोचा, कि यदि मुगलों के इतिहास को हम भारत के इतिहास से निकाल दें तो हमारे पास क्या बचेगा?

कभी हमने सोचा कि पाकिस्तान यदि राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास से ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष को निकाल दें, तो उसके पास क्या बचेगा?

कभी हमने सोचा कि भारतीय संस्कृति का विस्तार सिर्फ हिंदू संस्कृति का विस्तार नहीं है।

कभी हमाने सोचा कि आज की लड़ाई का मकसद सिर्फ हिंदू संस्कृति का विस्तार नहीं है।

नहीं! सरकारों ने, वैश्विक वित्तीय ताकतों ने, हमारे होने की लड़ाई का रूप बदल दिया है।

कि राष्ट्रवाद पूंजीवाद का सबसे खतरनाक हमला है।

कुछ ऐसा है जैसे पेड़ों को काट, कर उसे लकड़ी बनाना।

कुछ ऐसा है, जैसे लकड़ी को काट कर काठ का पुतला बनाना।

कुछ ऐसा है, जैसे काठ के पुतले पर अपना रंग चढ़ाना, और यह बताना कि यह वृक्ष है, पेड़ है, दरख्त है, प्रकृति और हमारा आज है। काठ के पुतले का रंग ही हमारा आज है। हमें आज जिस लड़ाई में झोंक दिया गया है, वह खतरनाक है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बांध कर उसके लिये नहर बनाये जा रहे हैं। और नहर का पानी सभी के लिये नहीं है। उन लोगों के लिये तो हर्गिज नहीं जो सवाल खड़ा करते हैं। लोकतंत्र और समन्वय की बात करते हैं। जो धर्म और राष्ट्र की जगह आम लोगों के हितों की बात करते हैं।

भारतीय सिनेमा ने जब अपने सौ साल पूरे किये थे, तब हमने बड़ी लम्बी-चौड़ी बातें की थी। उसे सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास का जरिया और दस्तावेज भी बताया था, उसे समन्वय का प्रतीक भी बताया था। गीत, संगीत और कला को सरहदों से आजाद बताया था, मगर आज हॉलीवुड के लिये तो कोई बात नहीं, उनके लिये बाजार खुला है, मगर हिंदी सिनेमा में पाकिस्तानी कलाकारों के खिलाफ हो रहे हमलों में बॉलीवुड भी एक नहीं। यह फिक्र ही नहीं कि हमारी जड़ें कहां कट रही हैं? सिनेमा को अभिव्यक्ति का जरिया नहीं, राजनीति का हथियार बनाया जा रहा है। और सबसे बुरी बात यह है, कि हथियार बनने का विरोध नहीं है, उसे देशभक्ति करार दिया जा रहा है। एक ऐसी देशभक्ति जिसमें एक विशेष सम्प्रदाय का राष्ट्रीय विरोध है। मुक्त बाजार की यह नयी परिभाषा है, जिसे काठ के पुतलों को रंगने वाले बना रहे हैं।

-आलोकवर्द्धन

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