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आतंकवाद के विरोध का अड्डा

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जैसे कभी कम्युनिस्ट विरोधी होना अमेरिकी फैशन था, वैसे ही आतंकवाद विरोधी होना आज कल नेशनल और इंटरनेशनल फैशन बन गया है। और यह फैशन भी अमरिका से ही आया है। फिर आप तो जानते ही हैं, अमेरिकी राजनीति, सभी का मकसद अपने वर्चस्व और वरियता के लिये लोगों को मारना है। मारा-मारी के इस खेल में व्हाईट हाउस, कांग्रेस, पेंटागन, सीआईए और अमेरिकी सेना ही नहीं उसके सहयोगी देश भी शामिल है, जो पहले आतंकवादियों को अपने हितों के लिये पैदा करते हैं, और उन्हीं हितों के लिये आतंकवाद विरोधी सैन्य अभियान चलाते हैं।

इस नजरिये से देखें तो आतंकवाद अमेरिकी साम्राज्य और उसके सहयोगी देशों की सरकारों का आतंक है। यह मतलब का ऐसा अतांकवाद है, जिसकी कमान इन देशों की सरकारों, गुप्तचर इकाईयों और सेना के हाथों में है। इन्होंने ही ‘आतंकवाद के विरोध का अड्डा‘ बना रखा है। इस अड्डे पर विश्व समुदाय के कई देशों की सरकारें हैं। इस अड्डे पर भारत की मोदी सरकार नये मुल्ले की तरह प्याज कुछ ज्यादा ही चबा रही है। नरेंद्र मोदी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर आतंकवाद के खिलाफ बातें कर रहे हैं। वो अमेरिकी एजेन्डे के तहत आतंकवाद को विश्व की सबसे बड़ी समस्या बताते फिर रहे है।

आप कह सकते हैं, कि आज दुनिया के ज्यादातर देशों की सरकारें आतंकवाद के विरूद्ध हैं।

सरकारों पर तो यकीन नहीं, मगर दुनिया की आम जनता आतंकवाद के खिलाफ है। वह उन सरकारों के भी खिलाफ है, जो आतंकवाद के खिलाफ नकली लड़ाईयां लड़ रहा है, ताकि बाजारवादी वित्तीय ताकतों के लिये ‘मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों‘ की रचना की जा सके, हंथियारों की होड़ को बढ़ा कर हथियार उद्योग को बढ़ाया जा सके और ध्वंस के बाद निर्माण का काम भी निजी कम्पनियों को सौंपा जा सके। आज बाजारवादी देशों की सेना अपने देश और देश की सुरक्षा से ज्यादा इन्हीं बाजारवादी वित्तीय ताकतों के लिये युद्ध और कवायतें कर रही हैं। संयुक्त सैन्य अभ्यास और अपने देश की आम जनता पर भी हमले कर रही है। सेना का यह हमला वास्तव में जनविरोधी सरकारों का हमला है।

जरा सोच कर बतायें, पिछले डेढ़-दो दशक के आतंकवाद ने किसको क्या दिया?

साम्राज्यवादी देशों की सरकारों को क्या दिया?

उन देशों को क्या दिया जहां राजनीतिक अस्थिरता के लिये विद्रोही-आतंकियों को पैदा किया गया? आतंकी हमले हुए। सैन्य अभियान हुए और तख्तापलट किया गया?

तख्तापलट के लिये भी साम्राज्यवादी देशों ने शानदार तरीके निकाल लिये। पहले सेना तख्तापलट करती थी, और लोकतांत्रिक ताकतें हाय-तौबा मचाती थीं, आज लोकतंत्र के चुनावी प्रक्रिया को हथियार बना लिया गया। ‘वैधानिक तख्तापलट‘ -अभी-अभी ब्राजील में- और चुनावी पद्धति से ‘सरकर का अपहरण‘ -भारत में- भी होने लगा। लीबिया में तो कर्नल गद्दाफी के तख्तापलट के बाद आतंकवादियों को ही सौंप दिया गया। अफगानिस्तान में बहुराष्ट्रीय सेना के साथ अब अमेरिकी सेना है। इराक में ऐसी सरकार है, जिसकी सेना के पलायन के जरिये आतंकवादी संगठनों को -आईएस- हथियारों की आपूर्ति कराई जाती है। सीरिया में खुले तौर पर अमेरिकी सेना आईएस के खिलाफ अभियान -हवाई हमले- चलाते हुए आतंकी-विद्रोहियों को आर्थिक, कूटनीतिक और प्रशिक्षण सहित जमीनी लड़ाई के लिये घातक हथियार थमा रही है।

जहां भी आतंकवादी हैं, वहां अमेरिकी सेना है, और वहां आम लोगों के लिये अपनी अपनी जान गवांने से लेकर जान बचाने के लिये पलायन और विस्थापन है। आतंकवादियों ने साम्राज्यवादी देशों को एशिया और अफ्रीका के देशों को सौंपना शुरू कर दिया है। या कह लें कि साम्राज्यवादी ताकतों ने आतंकवादी संगठनों को खड़ा ही इसलिये किया है, कि आर्थिक हितों के लिये, विरोधी सरकारों का तख्तापलट या सरकारों का अपहरण वो कर सके।

इस सच के खिलाफ आपके पास बस एक ही तर्क होगा, कि अमेरिका पर आतंकी हमले हुए, यूरोप पर आतंकी हमले हो रहे हैं, फिर आतंकवादी इन देशों का ‘उत्पाद‘ कैसे है?

जरा झुक कर देखें, मीडिया के बकवास को किनारे हटा दें, आपको साफ नजर आने लगेगा कि इन देशों पर हुए ज्यादातर आतंकी हमले इन देशों की अपनी कारस्तानी है। मुनाफे का सौदा है। सरकारें जब अपने देश के नागरिकों का सौदा वित्तीय ताकतों से कर सकती हैं, तो अपने ही देश के हजार-पांच सौ नागरिकों को भेंडे-बकरियों की तरह जिबह करने में उन्हें परहेज क्यों होगा?

-आलोकवर्द्धन

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