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पढ़-लिख कर हम कहां फंस गये?

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पढ़ने-लिखने की हमारी आदत रही है, मगर क्या करें, पढ़-लिख कर हम बुरे फंसे। न घर के रहे न घाट के। खुद को धोबी का कुत्ता कहते नहीं बन रहा है, हालांकि हालत कुछ ऐसी ही है। गले में धोबी का पट्टा है और हम आवारा घूम रहे हैं।

बाहर निकली दुम हमारी मुसीबत है। पढ़-लिख कर कड़क हो गयी, हिलाये नहीं हिलती, जबकि चलन भीतर छुपे दुम को हिलाने का है। जो जितने जोर से हिलाता है, उतनी तेजी से आगे बढ़ता है।

हमारी दुम देख कर लोग कहते हैं- हम कुत्तों के अपवाद हैं जिसकी दुम सीधी हो गयी।

पढ़-लिख कर सीधा होने के हम धोखे में आ गये। जबकि सोचा था हमने, हम खास बन जायेंगे। मगर पढ़ा-लिखा आदमी अब खास नहीं।

जो खास है, वह अनपढ़ों की सरकार है।

जो खास है, वह कवायत करती सेना है।

जो खास है, वह उछल-कूद करते खिलाड़ी हैं।

और बचे-खुचे जो खास हैं, वो नकली लोगों की जमात हैं।

हम न सरकार हैं, न सेना हैं, न खिलाड़ी हैं और ना ही अपने को छोड़ कर पात्रों को जीने वाले अभिनेता हैं। हम इन्हीं को देखने और झेलनेवाले पढ़े-लिखे लोग हैं। अंधों में काना राजा हैं।

राजा का पद खाली नहीं है।

स्वर्ग सिधार गये अशोक सिंघल की बात करें तो ‘हिन्दू राजा’ नरेन्द्र मोदी हैं, और नकर वासी लोगों की बात करें तो देश की चुनी हुई सरकार भी नरेन्द्र मोदी हैं।

मतलब? जगह नहीं है। 56 इंच के सीने में 20 साल के सपने हैं। हौसला है।

लालू जी ने बिहार की छाती पर 20 साल मूंग दलने की बातें की थी, वो मूंग दल चुके। जी भरा नहीं तो घूम-फिर कर फिर से मूंग दलने के लिये बिहार की छाती पर पहुंच गये।

मोदी जी क्या करेंगे? पता नहीं। पीएम हैं, इसलिये सीएम से कुछ बड़ा ही करेंगे। अभी तो उन्होंने शुरूआत की है। इसलिये जो भी हो रहा है कहते हैं- पहली बार हो रहा है।

अच्छे दिन, पहली बार आये?

आर्थिक विकास पहली बार हुआ?

भारत को दुनिया में सम्मान पहली बार मिला?

लोगों में देशभक्ति पहली बार आयी है?

पहली बार थोक के भाव से देशद्रोहियों की शिनाख्त हुई है?

और पहली बार सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक की?

कह सकते हैं कि भारत पहली बार भारत बना?

देश को नेता पहली बार मिला है!?

नरेन्द्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने, जिन्होंने भारत को बाजार का ब्राण्ड बनाया। पहली बार ‘फाॅर सेल’ का टैग हम पर लगा। पहली बार सवा सौ करोड़ लोगों की बिक्री हो रही है। ऐसी बिक्री जिसमें बेचने और खरीदने वाले की तो मौज है मगर बिकने वाले की खैर नहीं। हम बिकने वाले हैं। पढ़ा-लिखा आदमी ऐसा ही होता है, न घर का न घाट का। धोबी का कुत्ता हम हैं या नहीं? यह आप ही तय करें।

भक्ति, प्रेम, निःस्वार्थ सेवा और पेट पर लात! ओफ्फ…भगवान…खुदा…या गाॅड, पढ़-लिख कर हम कहां फंस गये?

-आलोकवर्द्धन

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