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अवशेषों में बदलता अमेरिकी लोकतंत्र

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हम अभी-अभी चुने गये अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की बात नहीं करेंगे जिनके खिलाफ अमेरिका में प्रदर्शन हो रहे हैं। उन्हें व्हाईट हाउस तक पहुंचने से रोकने की कोशिशें हो रही है। कुछ ऐसा हो रहा है, जो अमेरिकी लोकतंत्र के इतिहास में इससे पहले कभी नहीं हुआ।

अमेरिकी लोकतंत्र की राजनीतिक संरचना अवशेषों में बदलती हुई नजर आ रही है। जो सतह के नीचे था, वह सतह के ऊपर आ रहा है, कि अमेरिकी लोकतंत्र पूंजीवाद का धोखा है। जिसमें देश की आम जनता न तो सरकार बनाती है, ना ही सरकारें आम जनता के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं। वो वित्तीय ताकतों के हितों का जरिया है। देश की आम जनता के हाथों में न तो अपनी सरकार बनाने का वास्तविक अधिकार है, ना ही ऐसा कोई लोकतांत्रिक तरीका है, कि वो पूरी व्यवस्था को बदल सके। यदि ऐसा होता तो न तो रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकी पंसद हैं, ना ही डेमोक्रेट हिलेरी क्लिंटन के पास जन समर्थन है। लगभग आधी आबादी राष्ट्रपति चुनाव से हताश रही है, और उन्होंने इस बात को छुपाया भी नहीं। उन्होंने खुल कर कहा कि वो दोनों में से किसी को पसंद नहीं करते। उन्हें नस्लवादी ट्रम्प और युद्ध-उन्मादी क्लिंटन मंजूर नहीं।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव- 2016 में 46.9 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान नहीं किया, 25.6 प्रतिशत मत डेमोक्रेटिक पार्टी की हिलेरी क्लिंटन को मिला, 25.5 प्रतिशत मत रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रम्प को मिला।

लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति की चुनावी प्रक्रिया ऐसी है, कि वह उन 50 प्रतिशत असहमत लोगों को जगह नहीं देती। जो निर्णायक मत रखते हैं, उनके लिये अपना राष्ट्रपति चुनने का विकल्प ही नहीं है। उन्हें वित्तीय ताकतों द्वारा तय किये गये किसी डेमोक्रेट या रिपब्लिकन को ही चुनना है। जिनके बारे में दशकों पहले से खबर है, कि वो दो अलग-अलग बोतलों में एक ही शराब है। जिसे वॉलस्ट्रीट बनाता है। सदियों से अपनी श्रेष्ठता के धोखे में रहे आम अमेरिकी को भी लगने लगा है, कि 20 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज में डूबी अमेरिकी अर्थव्यवस्था और पूंजीवादी नकली लोकतंत्र खोखला हो चुका है, उसके लिये इस समाज व्यवस्था में सम्मानित कुछ भी नहीं। अमेरिकी साम्राज्य युद्ध और आतंक का घृणित प्रदर्शन है।

आज अमेरिकी साम्राज्य के दो धुरी हैं -वॉल स्ट्रीट और पेंटागन। एक पर निजी कम्पनियों, दैत्याकार कॉरपोरेशनों, बैंकों और निजी वित्तीय पूंजी का वर्चस्व है, और दूसरे पर पेंटागन की जर्बदस्त पकड़ है। यदि अमेरिकी सेना, दुनिया भर में फैले हजार से अधिक सैन्य अड्डे, हंथियारों का जखीरे को अमेरिकी साम्राज्य की बुनियाद से हटा दिया जाये तो, वह एक दिन भी टिकने के लायक नहीं है। उसकी गुप्तचर इकाईयां राजनीतिक हत्याओं और आतंकी साजिशें का अड्डा है। संगठित गिरोह है। जिन पर सरकार का वास्तविक नियंत्रण नहीं है। यहां तक कि अमेरिकी बजट से प्रप्त धनराशि के खर्च का हिंसाब देने में भी उसके ऊपर वास्तविक नियंत्रण नहीं है।

अमेरिकी लोकतंत्र इतना कमजोर पड़ चुका है, कि व्हाईट हाउस और कांग्रेस भले ही, ऊपर से राजसत्ता की धुरी नजर आते हैं, मगर वह वास्तविक नहीं है। राष्ट्रपति चुनाव के जितने भी ताम-झाम हैं, वह अपने ही देश की आम जनता को धोखे में रखने का प्रावधान है। मतगणना के आधार पर नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को अपने ही राजनीतिक दल -रिपब्लिकन पार्टी- का समर्थन हासिल नहीं है, और उनके खिलाफ प्रदर्शनों की शुरूआत हो गयी है। अमेरिका नस्लवादी ताकतों की गिरफ्त में है। हिलेरी क्लिंटन के पास भी जन समर्थन नहीं है। वो विवादों से -ई-मेल- घिरी हैं। उनके लिये जेल के द्वार खुले हैं। आशंका इस बात की है, कि ट्रम्प की बढ़त, कांटे की टक्कर और निर्वाचन, कुछ और नहीं, बल्कि एक ‘डील‘ है। सच यह है, कि न तो रिपब्लिकन के पास जनसमर्थन है, ना ही डेमोक्रेट्स के पास जनाधार है। इस नजरिये से राष्ट्रपति चुनाव एक राजनीतिक बकवास है। डेमोक्रेटिक पार्टी के बाद रिपब्लिकन पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी को सत्ता सौंपने का ऐसा खेल है, जिसका मकसद वित्तीय पूंजी की तानाशाही को बनाये रखना है।

‘‘ऑकोपायी वॉटस्ट्रीट मोमेंट‘‘ के बाद से अमेरिका में स्थितियां तेजी से बदली हैं। अमेरिकी आर्थिक संकट और वैश्विक मंदी के दौर ने कुछ ऐसी स्थितियां बना दी, कि व्हाईट हाउस, कांग्रेस और वॉलस्ट्रीट के प्रति लोगों का गुस्सा बढ़ता चला गया और उनके सामने विकल्प के रूप में गैर-पूंजीवादी एवं समाजवादी जनसमर्थक सरकारों का खयाल आ गया। जिसे रोकने के लिये अमेरिका फिर से नस्लवादी हो रहा है। लगभग ढाई सौ साल बाद अमेरिका गृहयुद्ध की ओर बढ़ रहा है। अनुमान और आंकलन के आधार पर कहा जा सकता है, कि अमेरिकी वर्चस्व का अंत करीब है। संयुक्त राज्य अमेरिका के सामने अस्तित्व का संकट है। यह संकट पूंजीवादी साम्राज्यवाद की अपनी उपज है। तीसरी दुनिया के देशों में अमेरिकी सरकार जो करती रही है, अब वह अमेरिका में होने के लिये तैयार है जिसे रोकने के लिये एक बड़े युद्ध की तैयारी भी अमेरिका कर चुका है।

-आलोकवर्द्धन, अनुकृति

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