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युद्ध से घायल अमेरिकी अर्थव्यवस्था

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जाने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने आंकवाद के विरूद्ध जारी युद्ध के लिये 11.6 बिलियन डॉलर का प्रस्ताव रखा है। जबकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर लगभग 20 ट्रिलियन डॉलर का ऐसा कर्ज है, जिसकी भरपायी करने की स्थिति में वह नहीं है।

ब्राउन यूनिव्हरसिटी के एक रिपोर्ट के अनुसार- वाशिंगटन के 11 सितम्बर 2001 (9/11) के बाद से अब तक युद्ध पर लगभग 5 ट्रिलियन डॉलर खर्च कर चुका है। यह युद्ध वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ रहा है। यह उस अतंकवाद के खिलाफ युद्ध है, जिसे अमेरिकी सरकार ने अपने हितों के लिये, हंथियार में बदलने का काम किया। आतंकवादी यूरोप सहित उसके हथियार, यूरोपीय देश सहित उसके ही प्रशिक्षण और यूरोपीय एवं अरब देशों सहित उसके ही आर्थिक सहयोग से लड़ते हैं। जिनके लिये और जिनके विरूद्ध वह कूटनीतिक लड़ाई लड़ता है। आतंकवाद के खिलाफ युद्ध यूरो-अमेरिकी साम्राज्य के वर्चस्व को बनाये रखने के लिये युद्ध के अलावा और कुछ नहीं है, जिसमें दुनिया के ज्यादातर आतंकी संगठन अमेरिका के सहयोगी हैं।

ब्राउन यूनिव्हरसिटी की यह रिपोर्ट 9/11 के 15 साल होने के मौके पर जारी किया गया।

अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप के 15 साल बाद भी 10,000 अमेरिकी सैन्य टुकड़ियां तैनात हैं।

इराक में अमेरिकी सैनिकों की संख्या लगभग 6000 है।

सीरिया में सैंकड़ों ‘स्पेशल ऑपरेशेनल फोर्स‘ अल कायदा से जुड़े आतंकी संगठनों के साथ मिल कर राष्ट्रपति बशर-अल-असद सरकार का तख्तापलट करने में लगी है।

अमेरिका के लिये यह बताना मुश्किल है, कि वह आतंकवाद के खिलाफ किससे लड़ रहा है?

‘अरब स्प्रिंग‘ से पहले तक वह उस ‘अल-कायदा‘ के खिलाफ हमलावर था, जिसके साथ अभी वह सीरिया में है और लीबिया में भी वह साथ था। अब वह ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड सीरिया‘ (आईएस) के खिलाफ है। और अमेरिका खुले तौर पर जिस आतंकी संगठन के खिलाफ होता है, उस आतंकी गुट एवं संगठन का विस्तार तेजी से होता है। अल-कायदा के साथ जो हुआ इस्लामिक स्टेट के साथ हो रहा है। जहां भी अमेरिकी हित है, इस्लामिक स्टेट वहां है। वह इराक में है, लीबिया और सीरिया में है, जहां आतंकवाद के खिलाफ जारी ऐसा अमेरिकी युद्ध है, जिसमें अमेरिका के अलावा किसी का हित नहीं। जिसमें हजारो-हजार लोगों की जानें जा चुकी हैं, लाखों-लाख लोगो ने पलायान किया है, उस क्षेत्र के करोड़ों लोगों की जिंदगी को दांव पर लगा दिया गया है।

अकेले इराक में ही 2003 के अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के बाद 1 मिलियन से अधिक लोगों ने अपनी जान गवाई। इराक-अफगानिस्तान में 7000 अमेरिकी सैनिक मारे गये और लगभग इतने ही निजी सेना के सैनिक और 52,000 लोग घायल हुए। इस युद्ध ने हजारों मानसिक रोगियों को जन्म दिया 2015 के अंत तक 1600 से ज्यादा उन अमेरिकी सैनिकों को अपने शरीर के घायल अंगों को कटवाना पड़ा, जो इराक और अफगानिस्तान युद्ध में हिस्सा लिये थे।

साल 2014 तक 3,27,000 अवकास प्राप्त अमेरिकी सैनिकों के ‘ट्रॉमैटिक ब्रेन इंजरी‘ का जांच के दौरान पता चला। युद्ध क्षेत्र में 2.7 मिलियन सैनिकां की तैनाती की गयी थी, जिनमें से 7,00,000 सैनिक (30 प्रतिशत से ज्यादा) सैनिक अब विकलांग हैं।

रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख विशेष रूप से किया गया है, कि अवकाश प्राप्त सैनिकों का विभाग अमेरिका में सबसे तेजी से बढ़ने वाला विभाग है, जहां काम करने वालों की संख्या दो गुणा -3,60,000 हो गयी है, जिसे आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है।

ब्राउन यूनिव्हरसिटी के रिपोर्ट में कहा गया है, कि आतंकवाद के खिलाफ जारी युद्ध में खर्च किये गये 5 ट्रिलियन डॉलर के खर्च में कांग्रेस के द्वारा तथाकथित ‘ओवरसि कॉटीजेन्सी ऑपरेशन‘ -ओ.सी.ओ- के लिये सीधे तौर पर दिये गये 1.7 ट्रिलियन डॉलर को भी जोड़ दिया जाये, जो कि पेंटागन का 2001 से 2016 के बीच का कुल बजट था, तो 6.8 ट्रिलियन डॉलर हो जायेगा।

यह सच अपने आप में महत्वपूर्ण है, कि लगभग 20 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज में डूबी अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर 6.8 ट्रिलियन डॉलर का खर्च आतंकवाद के खिलाफ जारी युद्ध का है, जो लगातार बढ़ रहा है। जिसके कारगर होने के बारे में अमेरिकी सरकार भी आश्वस्त नहीं है। लेकिन वह अपने वर्चस्व को बनाये रखने की नीतियों में बदलाव करने की स्थिति में भी नहीं है। ओबामा ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भारी कर्ज दिया, यदि डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति बनते हैं, तो यह खर्च घटने के बजाये बढ़ेगा, यह साफ-साफ नजर आ रहा है, भले ही वो हिलेरी क्लिंटन से कम युद्ध उन्मादी हो, मगर अमेरिकी व्यवस्था उस मुकाम पर है, जहां युद्ध के बिना वह टिक नहीं सकती। युद्ध अमेरिकी वर्चस्व का आधार बन गया है।

-आलोकवर्द्धन, अनुकृति

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