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आग के कारोबारी

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जिस आग को
सहेज कर रखा कारोबारियों ने
हम अश्वेतों को
काबू में रखने के लिये,
वह आग
अब उनके अपने ही घरों में
बेकाबू हो रही है।

हम जले,
जलते रहे,
आज भी जल रहे हैं।
अपनी बस्ती
अपने लोगों के साथ जल रहे हैं।
वहां जल रहे हैं
जहां आग के कारोबारियों ने
अपनी सरकारें बना ली हैं।

जबकि
कहा था सरकारों ने
जलेगी आग
हमारे घरों के चूल्हों में,
सर्दियों में हमारे हाथ-पांव
हमारे बदन सेंकेगी।
होगी आग हमारी मुट्ठियों में
‘दीया-सलायी’ की डिब्बियों में
तिल्लियों की तरह।

हमने मान लिया
आग हमारी मुट्ठियों में होगी,
दीया-सलायी की डिब्बियों में होगी,
आग हमारे दिलों में बसे
अलाव के
आग की तरह होगी,
होगी हमारे बीच
दोस्तों की तरह।
हम फैलेंगे अंधेरे में उजाले की तरह।

मगर आग
हमारे खेत
हमारे खलिहान
हमारी बस्तियों में फैली,
हमारे घरों
हमारे धर्मग्रंथों में फैली,
देवालय
और इबादतगाहों में फैली,
आग के कारोबारियों ने उसे
बाजार में फैलाया।

हमारे जिस्म,
हमारी रूहों को जलाया,
हमारे शहर
हमारे मुल्क को जलाया।
माचिस की तिल्लियों को बदला
बारूद की टोपी लगाये रंगरूटों में,
कि सरकार
और बाजार की दुनिया में
हम आग से भरे काले लोग हैं।

जिनके लिये
सहेज कर रखी आग
बारूद बन गयी है।
आग से
खेलने वाले कारोबारियों के घरों में
आग बेकाबू हो रही है,
हमें जलाने, मारने के नये दौर की
शुरूआत हो रही है।

-आलोकवर्द्धन

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