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फिदेल कास्त्रो – ‘बेहतर दुनिया संभव है‘

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हमारे जेहन में फिदेल कास्त्रो समाजवादी क्रांति के बदलते हुए स्वरूप की तरह हैं, जिसके मूल में मार्क्सवादी चिंतन धारा है। वे मार्क्स या लेनिन नहीं, उस सदी के नायक हैं, जिस सदी में समाजवादी क्रांति को समाज व्यवस्था में बदलते, उसे टूट कर बिखरते और फिर संभलते देखा है। जिसमें उनकी निर्णायक हिस्सेदारी रही है।

सोवियत संघ के पतन और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों के बिखरते ही, क्यूबा के कम्युनिस्ट क्रांति को परजीवी समझने वाले ‘‘अमेरिकी स्कूल के छात्रों‘‘ ने क्यूबा पर नजरें टिका दीं कि ‘‘अंत करीब है‘‘, मगर उनकी नजरें फैलती सिकुड़ती रहीं और क्यूबा समाजवादी विश्व के लिये संभावनाओं का प्रतीक बन गया। सोवियत संघ का ‘रेड स्क्वॉयर‘ ‘बर्लिन की टूटी दीवारों‘ को लांघता हुआ क्यूबा में पहुंच गया, लातिनी अमेरिकी देशों में समाजवादी महाद्वीपीय एकजुटता का आधार बन गया।

अमेरिकी साम्राज्यवाद की तमाम गिरी हुई हरकतों के बाद भी क्यूबा का समाजवाद ‘21वीं सदी के समाजवाद की अवधारणां‘ में बदला। फिदेल कास्त्रो के बारे में हमारी सोच शताब्दी भर लम्बी है। उन्होंने अमेरिकी हत्यारों की सैंकड़ों साजिशों के बीच, लगभग शताब्दी भर लम्बी जिंदगी जी। उनका निधन विराम नहीं। समाजवादी क्रांति और समाजवादी व्यवस्था का ऐसा पड़ाव है, जहां आम क्यूबावासी, लातिनी अमेरिका की आम जनता और तीसरी दुनिया की आवाम ही नहीं, दुनिया की आधी से अधिक आबादी खड़ी है, जो नवउदारवादी -मुक्त बाजार व्यवस्था- के विरूद्ध है। जो वित्तीय पूंजी की तानाशाही के वैश्विक शोषण, दमन, आतंक और युद्ध उन्माद से पीड़ित है।

जिसके विरूद्ध फिदेल कास्त्रो ने न सिर्फ लम्बी लड़ाई लड़ी, बल्कि क्यूबा में समाजवादी व्यवस्था को स्थायित्व दिया और विश्व समाजवादी संघर्ष को नयी दिशा दी। विचारों के स्तर पर दुनिया को विकल्पहीन बनाने की पूंजीवादी-साम्राज्यवादी नीतियों और साजिशों के विरूद्ध ‘बहुध्रुवी विश्व‘ और ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ की नयी सोच दी। जिसके सामने गंभीर सवाल और संकट है। उन्होंने इस बात को खुले तौर पर स्वीकार किया था, कि ‘‘नवउदारवादी वैश्वीकरण की समस्यायें बहुत ही जटिल हैं‘‘, जिसने पूंजीवाद को ‘आर्थिक आतंकवाद‘ में बदल दिया है। फासीवाद से भी बुरी व्यवस्था हमारे सामने है। ‘‘आज दुनिया दो राहे पर खड़ी है- या तो बेहतर बनो या खत्म हो जाओ।‘‘

हम सदमे में नहीं हैं। इस यकीन के साथ हैं, कि ‘‘बेहतर दुनिया संभव है।‘‘ पूंजीवाद खुद अपनी करतूतों का शिकार हो चुका है।

-आलोकवर्द्धन

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