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विलेन ‘शेर खां‘ क्यों है?

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रोज-ब-रोज की जिंदगी में कुछ बातें ऐसी होती हैं, जो फैलाती तो गंदगी हैं, मगर पता नहीं चलता। खिड़की खुली है, तो बाहर के नजारे को भी कमरे में जगह मिलेगी ही। शोर-शराबा होगा, आवाजें घुसेंगी। धूल-धुआं का आना भी होगा। और हम खिड़की-दरवाजे बंद करके जी नहीं सकते। ऐसी बेवकूफी करनी भी नहीं चाहिये।

जहर हमारी सांसों में घुला है।

काम और आराम के पलों में घुला है।

मनोरंजन मे घुला है।

आज टीवी के किसी चैनल पर ‘जंगल बुक‘ देखा। एनिमेशन फिल्म है। आधा तीतर आधा बटेर।

मोगली आदमी का बच्चा है, बाकी जो है, वह कठपुतलियों के खेल का विकास है। जहां आदमी का बच्चा तब तक सुरक्षित है, भेंडियों के बीच भी, जब तक शेर खां नहीं है। विलेन ‘शेर खां‘ है।

विलेन ‘शेर खां‘ क्यों है?

जब तक सवाल नहीं था, जवाब की तलब नहीं थी, और जब जवाब की तलब हुई, सवाल हमारी सोच, हमारी भावनायें और हमारी संवेदनाओं पर नस्तर चलाने लगी।

‘शेर खां‘ शेर सिंह भी तो हो सकता था।

मगर, विलेन शेर खां है, शेर सिंह या कोई और नहीं। बाकी जो हैं, या तो भालू की तरह मस्त हैं, या काले चीते की तरह आदम जात को बचाने में लगे हैं, मादा भेड़िया भी, उसे अपना बच्चा समझती है।

जंगल में भी आदमी तब ही रह सकता है, जब ‘शेर खां‘ न हो। शेर खां के खिलाफ लड़ना अच्छी बात है।

गोरे लड़ रहे हैं। काले लड़ रहे हैं।

अमेरिका लड़ रहा है। यूरोप लड़ रहा है।

शेर खां के खिलाफ हिन्दुस्तान भी लड़ रहा है।

सारी दुनिया लड़ रही है। जो ‘जंगल बुक‘ का आतंक है।

रोज-ब-रोज की जिंदगी में जरूरत से ज्यादा घुलता हुआ जहर है। मेरे जेहन में नकाब लगाये ‘फैंटम‘ घूमने लगा, जो डेकाली के जंगल का रक्षक है, और शहर में जब भी आता है, ‘अंकल सैम‘ की तरह हैट लगा कर घूमता है। वह ऊंचा-पूरा गोरा है। काला आदमी सदियों से बुरा है। भला बनने के लिये उसे गोरों की ‘सरपरस्ती‘ चाहिये। बाजार का सरपरस्त डॉलर है। डॉलर पर जॉर्ज वाशिंगटन की छपी हुई सूरत है।

-आलोकवर्द्धन

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