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जन ध्रुवीकरण के लिये जन संघर्ष

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मार्क्सवाद के विरोधी सिर्फ दो ही किस्म के लोग होते हैं

एक – वो जो उसे जानते नहीं

दूसरा – वो जिनका हित उससे प्रभावित होता है।

इसलिये, वो मार्क्सवाद की सूरत ही बिगाड़ देते हैं। उनके पास ऐसे लोगों की पूरी फौज है। सम्मान और प्रचारतंत्र का घातक हथियार है। सरकारें और सरकारों से बड़ा बाजार है। सोच की सूरत बिगाड़ना उन्हें आता है।

बिगड़ी हुई सूरत लिये मार्क्सवाद भारत में वामपंथ के रूप में है। और हम समझते हैं – चलो ठीक है, अंधों में काना ही सही। आज एक आंख से देख रहा है, कल दोनों से देखने लगेगा। वामपंथी राजनीतिक दलों के लिये हमारी स्वीकृति कुछ ऐसी ही है। आप हमें क्षमा करें।

हम मान लेते हैं कि नवउदारवादी मुक्त बाजारपरक वैश्विक अर्थव्यवस्था और पूंजीवादी दिखावटी लोकतंत्र में, किसी भी देश के लिये यह अच्छी खबर हो सकती है, कि वहां वामपंथ है। हमारे लिये वामपंथी राजनीतिक दलों के होने का मतलब आने वाले कल में जनसमर्थक सरकार के होने की संभावनायें है। वैसे संभावनाओं की वजह सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर पूंजीवादी व्यवस्था संकटग्रस्त है। भारत में ‘खुदा ही बचाए’ ऐसी सरकार है।

भारत के वामपंथी राजनीतिक दलों की दो खबरें, नवम्बर में-

  • भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी-लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी, फॉरवर्ड ब्लॉक, आरएसपी (सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर) और एसयूसीआई ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में वो मिल कर चुनाव लड़ेंगे।
  • केन्द्र की मोदी सरकार के ‘काले धन’ की जुमलेबाजी और नोटबंदी के खिलाफ उन्होंने भारत बंद का आव्हान किया।

बंद कारगर है या फ्लॉप? सवाल यह नहीं है। बड़ी बात यह है, कि वो सड़कों पर उतरे। जन समस्याओं के तहत मोदी सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे।

हम यह नहीं कह रहे हैं, कि वो कभी सड़कों पर थे ही नहीं, हम बस इतना कह रहे हैं, कि वो सड़कों पर उतरे, जन समस्याओं के पक्ष में सड़कों पर उतरे। नजर खुलने वाली बात यह है, कि सरकार के खिलाफ तीसरे मोर्चे की बात वो जिन विपक्षी दलों के साथ मिल कर करते रहे हैं, उन्होंने साथ कुछ ऐसे दिया कि ‘साथ टूटे नहीं, और बात बने भी नहीं।’

इस लिये समझदारी की बात बस इतनी हो सकती है, कि वाम मोर्चा को ही आप ‘तीसरा मोर्चा’ बनाएं। जनता तक पहुंच आपकी अपनी होगी। जनता सुनेगी। भारतीय लोकतंत्र में अघोषित रूप से विकल्प के रूप में सरकार बनाने के लिये सिर्फ दो ही मोर्चे हैं। बता दें- एनडीए और यूपीए। दूसरे की सरकार गयी और पहले की सरकार उन्हीं नीतियों के लिये सख्त है, जिसका मतलब राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय ताकतों का हित है, बाजारवादी अर्थव्यवस्था है। यूपीए ने उदारीकरण की शुरूआत की, एनडीए ने उसे निजीकरण में बदल दिया, जिसका सीधा सा मतलब है- हजार के बंद नोट के बाद दो हजार का चालू नोट। नोटबंदी और नया नोट काले धन के खिलाफ कुछ बड़ा करने की नहीं, बड़ा शोर मचाने की नीति है। बड़ों के लिये छोटे लोगों को हलकान करने की नीति है।

आप ही सोचें 94 प्रतिशत काला धन जब मुद्रा की शक्ल में नहीं है तो 6 प्रतिशत मुद्रा की शक्ल में काला धन के लिये अभियान कितनी बड़ी बात है? सरकार आम लोगों को धोखे में डाल चुकी है, मोदी जी जिसके छत्रपति हैं। आप चौंके नहीं, सच यही है। घड़ियाल की आंखों में खुशी के आंसू और हमारी दुश्वारियों की चमक है, जिनसे वामपंथी दलों का वास्ता है। वास्ता होना भी चाहिए।

यह सही है येचुरी साहब कि आप सरकार बनाने के लिये नहीं, खाता खुलवाने के लिये चानाव में उतरें। आज नहीं तो कल समझ आ ही जाएगी, कि ‘पूंजीवादी लोकतंत्र में चुनाव हमारे लिये वर्गसंघर्ष को स्पष्ट करने का जरिया है।’ वर्ग संघर्ष को स्पष्ट करना और जन समस्याओं के समाधान के लिये जन संघर्ष ही जन ध्रुवीकरण का आधार है। भाई, यह व्यवस्था सड़ चुकी है, मगर बिना धकियाये ढ़हेगी नहीं। आम जनता जरूरत से ज्यादा परेशान है।

-आलोकवर्द्धन

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