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देशभक्ति और राष्ट्रवाद की बढ़ती मांग

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‘देशभक्ति’ और ‘राष्ट्रवाद’ की मांग अक्सर वे सरकारें करती हैं, जिनके पास अपनी पसंद का कपड़ा होता है, उन्हें पहनाने के लिये।

जब से केन्द्र में मोदी की सरकार बनी है, तब से खास किस्म की देशभक्ति और खास किस्म के राष्ट्रवाद की मांग आम जनता से बढ़ी है। उसके लिये यह समझना मुश्किल हो रहा है कि वह कैसा देशभक्त है? कैसा राष्ट्रवादी है?

नये किस्म की देशभक्ति और नये किस्म के राष्ट्रवाद का जिक्र जरूरी है, जिसे प्रतीकों और प्रदर्शनों के हवाले कर दिया गया है, कि आप कसमें खाते रहें, सरकारों को बताते रहें। सरकारें तय करेंगी कि कौन कितना बड़ा देशभक्त और कैसा राष्ट्रवादी है। हमारे लिये समझना मुश्किल है, कि हम देशभक्त हैं या देशद्रोही हैं? राष्ट्रवादी हैं, या राष्ट्र विरोधी हैं? क्योंकि इन दोनों के बीच वास्तव में हम कहीं नहीं हैं। हमारे सामने एक देश है, देश की सीमायें हैं, देश की सेना है और देश की सरकार है, सरकार का एक मुखिया है, वह सबसे बड़ा देशभक्त, सबसे बड़ा राष्ट्रवादी है।

वह जायज है या नाजायज है?

उसकी नीतियां सही हैं, या गलत हैं?

वह देश, समाज और जनहित में है या नहीं है?

यदि यह सवाल है, तो आप मुश्किल में हैं। मुश्किलों से बचना है, तो देशभक्ति का प्रदर्शन करें, राष्ट्रवादी होने का सबूत दें। चुप रहें। यह सोचने की जरूरत नहीं कि जो देश हमारा है, उसे सरकार क्यों निजी कम्पनियों और कॉरपोरेशनों के हवाले कर रही है? क्यों वह देश को बाजार बना रही है?

यह जानना जरूरी है, कि जब अर्थव्यवस्था का निजीकरण हो रहा है, जब आम जनता की जिम्मेदारियों से सरकारें हाथ खींच रही हैं, जब लोक कल्याणकारी राज्य को धत्ता बताया जा रहा है, जब देश को बाजार में बैठाया जा रहा है, तब ऐसा करने वाली सरकार हमसे देशभक्ति और राष्ट्रवाद का जिक्र क्यों कर रही है? वह राष्ट्रगान को देशभक्ति और राष्ट्रवाद का प्रतीक क्यों बना रही है? हर हाल में, हर स्थान पर उसका प्रदर्शन क्यों जरूरी है?

सुप्रिम कोर्ट का फरमान है- ‘‘सिनेमाघरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान बजे। दर्शक खड़े हों। परदे पर तिरंगा लहराये। सिनेमाघरों के दरवाजे बंद हों।’’

तर्क है- इससे देशभक्ति बढ़ेगी। राष्ट्रवाद बढ़ेगा।

शायद बढ़े।

हमने वह दौर देखा है, जब फिल्म दिखाने से पहले न्यूज दिखाया जाता था। इंटरवेल के बाद विज्ञापनों के स्लाइड दिखाये जाते थे। और फिल्म जब खत्म होती थी राष्ट्रगान बजात था, परदे पर तिरंगा लहराता था। दर्शक खड़े होते थे, कुछ लोग खिसक लेते थे। जो खिसक लेते थे, उन्हें देशद्रोही नहीं समझा जाता था, वो देशद्रोही थे भी नहीं, बस लापरवाह थे।

‘देशभक्ति’ और ‘राष्ट्रवाद’ के पीछे जब फरमान हो तो समझ लेना चाहिए कि कोई उसका दुरूपयोग कर रहा है, या करने की फिराक में है। मोदी सरकार इस निर्णय से खुश है, भाजपा खुश है, इसलिये मान लेना चाहिए कि संघ भी खुश है। नाराज हम भी नहीं हैं, मगर फिक्रमंद हैं। हमारी फिक्र बस इतनी है कि अर्थव्यवस्था के निजीकरण के दौर में राष्ट्रवाद और देशभक्ति का राष्ट्रीयकरण क्यों? जबकि हम देख रहे हैं, कि सारी दुनिया में आतंकवाद की तरह ही उग्रराष्ट्रवाद और नस्लवाद तेजी से बढ़ रहा है। देश की प्राकृतिक सम्पदा, देशवासियों के शारीरिक एवं मानसिक श्रम का सौदा सरकार उन राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों से सस्ते में कर रही है, जो न राष्ट्रवादी हैं, न देशभक्त, वो सिर्फ बाजारवादी हैं।

सुप्रिम कोर्ट का यह निर्णय भोपाल के श्याम नारायण चौकसी के उस जनहित याचिका का परिणाम है, जिसमें राष्ट्रगान के गलत इस्तेमाल और व्यावसायिक हितों के लिये उपयोग पर रोक लगाने की मांग की गयी थी। क्या अपने को देशभक्त और राष्ट्रवादी समझने वाली सरकारें आर्थिक विकास के नाम पर कारोबार नहीं कर रही हैं? राष्ट्रगान में नीहित भावनाओं पर बहस निषिद्ध है, मगर क्या लोकतंत्र में ‘अधिनायक की जय’ बहस का मुद्दा नहीं है? जनविरोधी सरकारें किस लिये देशभक्ति और राष्ट्रवाद की मांग आम जनता से कर रही हैं?

-आलोकवर्द्धन

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