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फिदेल कास्त्रो के लिये

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एक दबी ख्वाहिश थी,
कॉमरेड फिदेल आपसे मिलने की
मिल-बैठ कर बातें करने की
यह पूछने की
कि 21वीं सदी के समाजवाद को
मार्क्सवाद की
किन संभावनाओं से हम जोड़ें?
क्रांति की
किस सोच के साथ खड़े हों
हम लेनिन के सामने?
जबकि शैतान
सारी दुनिया पर कब्जा जमा रहा है
और गुजर रहे हैं हम अंधी सुरंगों से।

आपके
न होने की खबरों से
हमें रू-ब-रू होना पड़ा
यह मानना पड़ा
कि शताब्दी भर लम्बी जिंदगी के बाद भी
अधूरी रही मिलने की ख्वाहिशें,
यह अलग बात है
कि सोच की जमीन पर
आज भी मिलते हैं हम
और आगे भी मिलेंगे साथ चलते हुए,
एक-दूसरे पर
छापामारों की तरह यकीन करते
और पैनी नजर रखते हुए,
चे की तरह जीते
और चे की तरह मरते हुए
कि बीज की बंधी मुट्ठी में दरख्त है।

वह आदमी
जिसने कहा-
‘क्यूबा में ऐसा कोई नहीं
जिसकी यादों में फिदेल कास्त्रो नहीं’
आज वह हमारे दिल के करीब
उन लोगों में शुमार हैं
जिनकी ख्वाहिशें पूरी हुई क्रांति को
समाज व्यवस्था में बदलने की,
बाजारवादी खिलौने
और अमेरिकी हत्यारों के खिलाफ
खड़ा होने की।
जबकि, न जाने कितनी बार
मौत करीब से गुजरी
बनती तस्वीरों पर गर्म सांसें छोड़ती हुई।

वह लड़की
जिसकी तस्वीर देख कर
कहती है तीसरी दुनिया के देश की एक लड़की
कि ‘फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा को क्या बनाया
हम देख सकते हैं’।
हमने देखा
पितामह के लिये नम
उसकी आंखों में झांक कर
जिनमें सपने और पड़ाव ही नहीं
थी फिक्र भी।
उसके चेहरे पर
कांपती हुई एक सदी थी गुजरती हुई।
हमने देखा
क्यूबा हमारे बच्चों में है।

कि हवाना
अंकल सैम की अंगुलियों में फंसा
सुलगता सिगार नहीं,
जहां स्मृतियों में ढ़लते फिदेल विश्वास हैं
कि जो जनता
संभाल सकती है क्रांति के लिये हथियार
वह मतपत्रों का बोझ भी संभाल लेगी।
संभव है-
‘विकास के जरिये समाजवाद’
शर्त-
विचारों से लैस होने की है।
फिदेल पहचान हैं क्यूबा की
और क्यूबा हमारे जेहन में है।

-आलोकवर्द्धन

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