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सोच और सम्बद्धता, अब बाजार में है

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‘‘मगर यह तो दोगलापन है।‘‘ उन्होंने तल्खी से कहा। चेहरे पर भाव ऐसा था, जैसे इससे घिनौनी कोई चीज नहीं।

‘‘हां, है तो।‘‘

मैंने सीधे तौर पर अपनी स्वीकृति दी। मेरे जेहन में सवालों से घिरा तर्क था।

‘‘लेकिन, यह दोगलापन स्वाभाविक है। आप चाहें तो मान सकते हैं, कि यह संक्रमणकालीन समाज की अपनी विवशता है। ऐसी विसंगति है, जिससे बचा नहीं जा सकता।‘‘

उनके नजरों की नाराजगी ऐसी थी, कि कहना पड़ा- ‘‘समाज जब बदलने की प्रक्रिया से गुजर रहा होगा है, तब इसे आप गाली नहीं बना सकते, जो आप बना रहे हैं।‘‘

मेरी बातों से उनकी तल्खी और बढ़ गयी।

उन्होंने सीधा सा सवाल किया- ‘‘क्या बनने और बिगड़ने के बीच ऐसा कुछ भी नहीं होता, जिस पर हम यकीन कर सकें?‘‘

उन्होंने यह भी कहा- ‘‘कम से कम दोगलापन पर तो हम यकीन नहीं कर सकते।‘‘

‘‘नहीं, हम यकीन नहीं कर सकते, यकीन करना भी नहीं चाहिये। इसके बाद भी सच यह है, कि हमें अपनी सोच पर यकीन करना ही होगा। अपने समाज, वर्ग, वर्गगत एकजुटता और सामाजिक संघर्षों पर यकीन करना ही होगा। उन ताकतों पर यकीन करना होगा, जो समाज के विकास को सही दिशा देने के हिमायती हैं।‘‘

मुझे लगा, कि मेरी बातें धीरे-धीरे बकवास की ओर बढ़ रही हैं, जबकि बातें हमें सीधी और साफ करनी चाहिये। इसलिये समाज व्यवस्था की विसंगतियों और संक्रमणकालीन समाज की अनिवार्यताओं को लेकर, मैंने सीधा सा सवाल किया-

‘‘क्या यह संभव है, कि समाज एकसाथ, एकमुस्त रातों-रात बदल जाये? लोगों की सोच, जीने का तरीका, उनकी आदतें, उनकी भावनायें बदल जायें? तमाम आर्थिक एवं सामाजिक सम्बंध एकसाथ बदल जायें?‘‘ …..‘‘जहां तक मेरी समझ है, क्रांति एक दिन में नहीं होती।‘‘

अपनी ओर से यह भी कहना जरूरी हुआ कि, मेरे पास तो ऐसी कोई पद्धति नहीं है। यदि आपके पास हो तो बतायें?‘‘

पद्धति उनके पास भी नहीं थी।

बताने के लिये कुछ भी नहीं था।

किंतु, बुद्धिजीवी होने के अपने फायदे हैं- बहस नहीं थमती। बातें बंद नहीं होतीं। सवालों से घेरना और खयालों को जाहिर करना बंद नहीं होता।

यह बहस लम्बी खिंच गयी, जिसकी शुरूआत हुई थी, इस बात से कि लेखकों और बुद्धिजीवियों में यह प्रवृति सबसे ज्यादा है। वे जो लिखते हैं, उनका जीवन वैसा नहीं होता। उनकी सोच उनके अपने सामाजिक जीवन का साथ नहीं देती। निजी जीवन में वो सुविधाभोगी होते हैं। चाटुकार, मतलबी होते हैं। वे जिस वर्ग की बात करते हैं, उस वर्ग के नहीं होते।

‘‘किस वर्ग की बात करते हैं, और किस वर्ग के नहीं होते?‘‘

‘‘समाज के शोषित और कमजोर वर्ग की।‘‘

‘दोगलापन‘ की उनकी गाली प्रगतिशील, जनवादी मार्क्सवादी रचनाकारों के लिये तय हो गयी।

मतलब?

शोषित एवं कमजोर वर्ग के रचनाकार को ही, शोषित और कमजोर वर्ग की बात करनी चाहिये।

मतलब?

हर वर्ग को अपनी बात करनी चाहिये।

ऐसा उन्होंने कहा नहीं, लेकिन उनकी बातों का मतलब यही निकला। उन्होंने आज के कई प्रगतिशील, जनवादी एवं मार्क्सवादी रचनाकारों की ऐसी तस्वीरें दिखायी जिसे देश कर यही लगा कि ‘‘उनका जीवन उनके अपने ही लेखन के खिलाफ है। वो जिस वर्ग की बात लिखते हैं, उस वर्ग को जीते नहीं।‘‘ इस लिये ‘दोगला‘ हैं। ‘दोगलापन‘ शायद यही है।

मैंने कहा- ‘‘जिस दोगलापन की बात आप कर रहे हैं, वह हममें भी है।‘‘

यह बात उन्हें बुरी लगी।

लगनी भी चाहिये थी।

मैंने सवाल किया- ‘‘सारी शर्तें मार्क्सवादी रचनाकारों के लिये ही क्यों हैं?‘‘

सवाल के जवाब में उन्होंने सवाल किया- ‘‘मतलब, आप दोहरे चरित्र को अपनी मंजूरी दे रहे हैं?‘‘

मुझे अच्छा लगा, कि ‘दोगलापन‘ को उन्होंने ‘दोहरा चारित्र‘ तो बनाया।

‘‘नहीं! मैं उस संक्रमणकालीन समाज की बात कर रहा हूं, जिसमें रचनाकार भी रहता है। जो अपनी, अपने वर्ग की और उनकी भी बातें करता है, जिन्हें वह मानसिक रूप से जीता है। शायद तालस्ताय से गोर्की बनने की यही प्रक्रिया है। जिन्हें आप ‘दोगला‘ नहीं कह सकते।‘‘

सोचने की बारी उनकी थी, और अच्छा लगा कि उन्होंने सोचा।

हमें अपना आंकलन -चाबूक लेकर ही सही- समाज के साथ करना चाहिये। यदि कडुवाहट है, तो है। बाजार ने समाज को बदल दिया है। लेखन की शर्त बस एक है, हमें अपनों के बीच होना चाहिये। दोगलापन चरित्र भी है और दिशा भी।

बहस को जहां रूकनी थी, वहीं रूक गयी। बाजार में विनिमय नहीं खरीदी-बिक्री है, मुनाफा है। सोच और सम्बद्धता भी अब बाजार में है। यदि हम मान लें कि अपने वर्ग की बातें करना लेखकीय ईमानदारी है, तो हमें यह भी मानना होगा कि इस देश में 70 प्रतिशत से अधिक लोगों की बात करने वाला कोई नहीं होगा। महानगरों में जिंदगी भले ही 21वीं सदी से गुजरती हुई मिल जाये, गांव और कस्बों में सदियां न जाने कब से ठहरी हुई है, यदि चलती भी है, तो वैसे नहीं कि वो अपनों के बीच पहुंच सकें, बल्कि वैसे कि दूरियां बढ़ती चली जाये। वास्तव में यह हमला प्रगतिशील, जनवादी या मार्क्सवादी रचनाकारों पर नहीं, बल्कि 70 प्रतिशत से अधिक उस आबादी पर है, जो लिखना-पढ़ना नहीं जानती, और थोड़ा बहुत जानती भी है तो अपनी बात रखना नहीं जानती। जिनके लिये समाज परिवर्तन और जनक्रांति मजाक नहीं, आप उन्हें लिखने दें। वो वास्तविक जीवन जीये न जीयें, मानसिक जीवन तो जीने दें। जीते-जीते जीने का तरीका भी बदल जायेगा। और नहीं बदले तो, ‘दोगलापन‘ उनके जेहन पर उतर आयेगा, उनकी सूरतें भी बदल जायेंगी।

-आलोकवर्द्धन

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