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प्रधानमंत्री जी रोना रो रहे हैं

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प्रधानमंत्री जी की बात करें तो वो रोना रो रहे हैं। समझ में नहीं आ रहा है, कि क्या करें?

सच तो बोल नहीं सकते, झूठ बोलें तो कितना बोलें? कहां-कहां बोलें और किससे बोलें?

मुरादाबाद परिवर्तन महारैली में उन्होंने जो कहा, बड़ी अच्छी मिसाल है कि ‘‘मैं दिमाग खपा रहा हूं।’’

जानते हैं वो दिमाग कहां खपा रहे हैं?

चलिये, उन्हीं की मानें तो वो दिमाग खपा रहे हैं कि ‘जनधन खाते में अवैध धन जमा करने वालों को जेल भेजा जाये और जिसके खाते में जो अवैध धन जमा है, उसे गरीबों को दे दिया जाये।’

अच्छा तिकड़म है।

मोदी जी चुनावी रंग जमा रहे हैं।

हमको सपने दिखा रहे हैं- अवैध धन को अवैध तरीके से हासिल करने का और जिनके पास अवैध धन है, उनको राह दिखा रहे हैं।

‘नोटबंदी’ की अफरा-तफरी में, अपने पैसों के लिये देश की आम जनता बैंकों के सामने कतार में खड़ी रही और प्रधानमंत्री जी ने 6 हजार करोड़ का लोन ‘स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया’ से अडानी जी को थमा दिया।

अडानी जी को मजा आ गया। और भी तमाम ‘जी’ को नोटबंदी का मजा आया ही आया होगा, क्योंकि उन्हें इस खेल की खबर पहले से थी। आफत में जान हमारी फंसी।

यदि काला धन हमारा है, तो तमाम ‘जी’ को दिया गया पैसा किसका है प्रधानमंत्री जी?

कहां है 15 लाख वह रूपया, जिसे आपने हमारे खाते में जमा करने का वायदा किया था?

बैंकों में जमा अपना पैसा तो मिल नहीं रहा, आप फुलझड़ी जला रहे हैं, दिमाग खपा रहे हैं।

वैसे सुन कर अच्छा लगा कि ‘…’ है। …यदि है, तो जान लें, उसे ठिकाने लगाने का समय भी करीब आता जा रहा है। जो जनता बटन दबा कर सरकार चुनती है, वही जनता बटन दबा कर उसे ठिकाने भी लगा देती है।

आप कहते हैं- ‘‘मैं तो फकीर हूं, मेरा क्या बिगाड़ोगे? झोले लेकर चला जाऊंगा।’’

बड़ी अच्छी है आपकी फकीरी, ढ़ाई साल में लगभग 70 करोड़ का कपड़ा पहन कर आपने उतार दिया। अरबों ठिकाने लगा दिया। देश को बाजार और बाजार को सिर पर बैठा दिया। पहली बार पता चला कि चाय बेचने वाला फकीर होता है। प्रधानमंत्री फकीर होता है। ‘जी’ का चहेता फकीर होता है। आप तो कमाल हैं, कभी 125 करोड़ लोगों का मुखिया बन जाते हैं, कभी 125 करोड़ लोगों को अपना नेता बताते हैं।

महंगाई पर लगाम लगाने की आपकी सोच ‘बेसलेस’ है। आप कहते हैं- ‘‘पहले नोट छपते थे, महंगाई बढ़ती थी। अब नोट कम छपेंगे, ‘कैशलेस’ व्यवस्था खड़ी होगी।’’ तो क्या नोट कम छपने से महंगाई घट जायेगी?

‘पेटीएम’ किसका है प्रधानमंत्री जी?

निजी कम्पनियों को मुनाफा और कैसे पहुंचायेंगे?

क्या ऑनलाईन पेमेंट से 100 रूपये का सामान 90 रूपये में मिलता है?

फकीर साहब भिखारी के पास ‘स्वाइप मशीन’ नहीं है। अमेरिका में 60 प्रतिशत लोग कैशलेस ट्रांजेक्शन करते हैं और भारत में मात्र 2 प्रतिशत लोग ही ऐसा कर पाते हैं।

किसके लिये यह कैशलेस व्यवस्था है?

संघ को लग रहा है कि नोटबंदी का दांव उल्टा पड़ रहा है। वह भी आपकी तरह दिमाग खपा रहा है, कि ‘आम जनता के सिर पर सवार राष्ट्रवाद का बुखार उतर न जाये।’ उतर गया तो गाड़ी पटरी से उतर जायेगी। बिहार विधानसभा चुनाव से शुरू हुई दुर्घटना उत्तर प्रदेश में ‘265 प्लस’ की हवा निकाल देगी। असम में जहां आपने सरकार बना लिया, वहां की जनता भाजपा प्रचारकों को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर पीट रही है। संघ की समझ है, ‘नोट छापो। जल्दी से जल्दी बांटो। नोट की किल्लत मतपत्रों की बारिश सोख लेगी।’ कैशलेस ट्रांजेक्शन ठेला-खोमचा, दिहाड़ी मजदूरों में नहीं चलेगा। गांव-गिरांव और छोटे व्यापार में नहीं चलेगा। खाते में पैसा और खाली हाथ की किल्लत नहीं चलेगी। चलने को बकवास बहुत चल गया, बिना पैसे के बकवास अब नहीं चलेगी। अपराधों की फेहरिश्त बदल कर आप कहते हैं- ‘कुछ लोग मुझे अपराधी मानते हैं।’

मौसम विभाग का आंकलन है- मतपत्रों का अकाल पड़ने को है। बाजार में सन्नाटा है।

अम्बानी-अडानी हंस रहे हैं, फिर आप क्यो रो रहे हैं?

प्रधानमंत्री जी एक नेक सलाह- ‘रोना रोने से कुछ नहीं होगा। हम जानते हैं नोटबंदी सनक नहीं, सुनियोजित षड़यंत्र है।’

-आलोकवर्द्धन

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